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25/02/2022

जन्म : 19 फरवरी 1630मृत्यु : 3 अप्रैल 1680 भारत के वीर सपूतों में से एक श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में सभी लो...
19/02/2022

जन्म : 19 फरवरी 1630
मृत्यु : 3 अप्रैल 1680

भारत के वीर सपूतों में से एक श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में सभी लोग जानते हैं। बहुत से लोग इन्हें हिन्दू हृदय सम्राट कहते हैं तो कुछ लोग इन्हें मराठा गौरव कहते हैं, जबकि वे भारतीय गणराज्य के महानायक थे। छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म सन्‌ 19 फरवरी 1630 में मराठा परिवार में हुआ। कुछ लोग 1627 में उनका जन्म बताते हैं। उनका पूरा नाम शिवाजी भोंसले था।

धार्मिक संस्कारों का निर्माण : उनका बचपन उनकी माता जिजाऊ के मार्गदर्शन में बीता। माता जीजाबाई धार्मिक स्वभाव वाली होते हुए भी गुण-स्वभाव और व्यवहार में वीरंगना नारी थीं। इसी कारण उन्होंने बालक शिवा का पालन-पोषण रामायण, महाभारत तथा अन्य भारतीय वीरात्माओं की उज्ज्वल कहानियां सुना और शिक्षा देकर किया था। दादा कोणदेव के संरक्षण में उन्हें सभी तरह की सामयिक युद्ध आदि विधाओं में भी निपुण बनाया था। धर्म, संस्कृति और राजनीति की भी उचित शिक्षा दिलवाई थी। उस युग में परम संत रामदेव के संपर्क में आने से शिवाजी पूर्णतया राष्ट्रप्रेमी, कर्त्तव्यपरायण एवं कर्मठ योद्धा बन गए।


पत्नी और पुत्र : छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन् 14 मई 1640 में सइबाई निम्बालकर के साथ लाल महल, पुना में हुआ था। उनके पुत्र का नाम सम्भाजी था। सम्भाजी (14 मई, 1657– मृत्यु: 11 मार्च, 1689) शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र और उत्तराधिकारी थे, जिसने 1680 से 1689 ई. तक राज्य किया। शम्भुजी में अपने पिता की कर्मठता और दृढ़ संकल्प का अभाव था। सम्भाजी की पत्नी का नाम येसुबाई था। उनके पुत्र और उत्तराधिकारी राजाराम थे।

मुगलों से टक्कर : शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति से चिंतित हो कर मुगल बादशाह औरंगजेब ने दक्षिण में नियुक्त अपने सूबेदार को उन पर चढ़ाई करने का आदेश दिया। लेकिन सुबेदार को मुंह की खानी पड़ी। शिवाजी से लड़ाई के दौरान उसने अपना पुत्र खो दिया और खुद उसकी अंगुलियां कट गई। उसे मैदान छोड़कर भागना पड़ा। इस घटना के बाद औरंगजेब ने अपने सबसे प्रभावशाली सेनापति मिर्जा राजा जयसिंह के नेतृत्व में लगभग 1,00,000 सैनिकों की फौज भेजी।

शिवाजी के राज्य की सीमा : शिवाजी की पूर्वी सीमा उत्तर में बागलना को छूती थी और फिर दक्षिण की ओर नासिक एवं पूना जिलों के बीच से होती हुई एक अनिश्चित सीमा रेखा के साथ समस्त सतारा और कोल्हापुर के जिले के अधिकांश भाग को अपने में समेट लेती थी। पश्चिमी कर्नाटक के क्षेत्र बाद में सम्मिलित हुए। स्वराज का यह क्षेत्र तीन मुख्य भागों में विभाजित था

शिवाजी की सेना : शिवाजी ने अपनी एक स्थायी सेना बनाई थी। शिवाजी की मृत्यु के समय उनकी सेना में 30-40 हजार नियमित और स्थायी रूप से नियुक्त घुड़सवार, एक लाख पदाति और 1260 हाथी थे। उनके तोपखानों के संबंध में ठीक-ठीक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

घुड़सवार सेना दो श्रेणियों में विभाजित थी:- बारगीर व घुड़सवार सैनिक थे जिन्हें राज्य की ओर से घोड़े और शस्त्र दिए जाते थे सिल्हदार जिन्हें व्यवस्था आप करनी पड़ती थी। घुड़सवार सेना की सबसे छोटी इकाई में 25 जवान होते थे, जिनके ऊपर एक हवलदार होता था। पांच हवलदारों का एक जुमला होता था। जिसके ऊपर एक जुमलादार होता था। दस जुमलादारों की एक हजारी होती थी और पांच हजारियों के ऊपर एक पंजहजारी होता था। वह सरनोबत के अंतर्गत आता था। प्रत्येक 25 टुकड़ियों के लिए राज्य की ओर से एक नाविक और भिश्ती दिया जाता था।


धोखे से जब शिवाजी को मारना चाहा : शिवाजी के बढ़ते प्रताप से आतंकित बीजापुर के शासक आदिलशाह जब शिवाजी को बंदी न बना सके तो उन्होंने शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ्तार किया। पता चलने पर शिवाजी आगबबूला हो गए। उन्होंने नीति और साहस का सहारा लेकर छापामारी कर जल्द ही अपने पिता को इस कैद से आजाद कराया।

  True history....
19/02/2022



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पानी के स्थान पर घी के उपयोग से मंदिर का निर्माण सुनने में अजीब लगता है ना। जैसे कोई हवाई बात कर रहा हो। तो रुकिए हजूर आ...
19/02/2022

पानी के स्थान पर घी के उपयोग से मंदिर का निर्माण सुनने में अजीब लगता है ना। जैसे कोई हवाई बात कर रहा हो। तो रुकिए हजूर आज हम आपको ऐसे ही मंदिर के बारे में बताते हैं, जिसकी नींव का निर्माण एक या दो किलो नहीं बल्कि चालीस हजार किलोग्राम घी से किया गया है।

जमीन से करीब 108 फीट ऊंचे इस जैन मंदिर में पांचवें तीर्थकर भगवान सुमतिनाथ जी मूल वेदी पर विराजमान हैं। यह पूरा मंदिर तीन मंजिलों में बंटा है। इस मंदिर को लाल बलुआ पत्थरों और संगमरमर से बनाया गया है। मंदिर के भीतर की सजावट बहुत सुंदर है। इसमें मथेरण व उस्ता कला का शानदार काम किया गया है। इति​हासकार डॉ. शिव कुमार भनोत के अनुसार इस मंदिर के अंदर के भित्ति चित्र और मूर्तियां भी बहुत दिलचस्प हैं। मंदिर के फर्श, छत, खम्बे और दीवारें मूर्तियों और चित्रकारी से सुसज्जित हैं। मंदिर राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक की श्रेणी में है। मंदिर के 500 वर्ष पूर्ण होने पर डाक विभाग द्वारा विशेष आवरण एवं विरुपण जारी किया गया था।

मंदिर को देखने के आने वाले विदेशी पर्यटक सेम कहते हैं कि ये मंदिर अपने आप में अनोखा है। स्थानीय कलाकारों द्वारा की चित्रकारी व स्थापत्य कला की मूर्तिया आकर्षित करती है। इसके निर्माण में 40 हजार किलोग्राम घी का उपयोग करना इसे विशेष बनाता है। ये मेरा सौभाग्य जो इसको देखने आया।

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