02/03/2026
# # # **होली : रंग, परंपरा और स्वास्थ्य का समन्वित महापर्व**
*स्वाति सिंह साहिबा, महेश्वर (म.प्र.)*
होली भारत का एक प्रमुख और जीवंत त्योहार है, जो केवल रंगों और उल्लास का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, बुराई पर अच्छाई की विजय और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश भी देता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व भारत ही नहीं, नेपाल सहित अनेक देशों में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। फाल्गुन में पड़ने के कारण इसे ‘फगवा’ तथा ‘रंगोत्सव’ भी कहा जाता है।
होली का आरंभ होलिका दहन से होता है। यह परंपरा बुरे विचारों, द्वेष, अहंकार और नकारात्मकता के दहन का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में बुराई को अग्नि में भस्म करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है—चाहे वह रावण दहन हो, होलिका दहन हो या जीवन के अंतिम संस्कार की अग्नि। होलिका दहन केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का प्रतीक है। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों को त्यागकर जीवन को श्रेष्ठ और सकारात्मक बनाएं।
मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ क्षेत्र में होली से जुड़ी अनेक विशिष्ट परंपराएँ प्रचलित हैं। यहाँ ‘हार-कंगन’ नामक विशेष मिष्ठान बनाया जाता है, जो आकार में आभूषणों के समान होता है। इसे होलिका को अर्पित करने की परंपरा है। यह मिष्ठान केवल स्वाद का प्रतीक नहीं, बल्कि आयुर्वेदिक गुणों से युक्त माना जाता है। लोकमान्यता है कि इसका सेवन गर्मी और लू से बचाव में सहायक होता है।
होलिका दहन में सेमल वृक्ष की टहनी स्थापित करने की परंपरा भी उल्लेखनीय है। माघ पूर्णिमा को चयनित की जाने वाली यह टहनी आयुर्वेद में औषधीय महत्व रखती है। गोबर के उपले और शुद्ध घी से प्रज्वलित अग्नि को वातावरण शुद्ध करने वाला माना गया है। नई फसल की बालियों को अग्नि में अर्पित करना समृद्धि और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक है।
होलिका दहन के दूसरे दिन रंगों की होली खेली जाती है। इस दिन समाज के सभी वर्ग आपसी भेदभाव और मनमुटाव भुलाकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और गले मिलते हैं। आदिवासी भील समुदाय में घर-घर जाकर ‘फगवा’ मांगने की परंपरा सामाजिक सहयोग और सांस्कृतिक एकता का सशक्त उदाहरण है। वे नृत्य-गान करते हैं और लोग उन्हें अन्न, मिठाई या धन प्रदान करते हैं।
होली का उत्सव केवल दो दिनों तक सीमित नहीं रहता। इसके बाद भाई दूज, रंग पंचमी और शीतला सप्तमी जैसे पर्व भी मनाए जाते हैं। शीतला सप्तमी पर महिलाएँ एक दिन पूर्व तैयार भोजन ग्रहण कर माँ शीतला की पूजा करती हैं, जिससे परिवार में स्वास्थ्य और समृद्धि बनी रहे। इस प्रकार यह पर्व सात दिनों तक चलने वाला सांस्कृतिक उत्सव बन जाता है।
होलिका दहन में श्रीफल (नारियल) अर्पित करने और उसकी राख को शुभ मानने की परंपरा भी प्रचलित है। मान्यता है कि अग्नि में पकने के बाद श्रीफल के औषधीय गुण बढ़ जाते हैं। होलिका की राख में नीम की पत्तियाँ सेंककर सेवन करने की परंपरा को त्वचा और पाचन संबंधी रोगों में लाभकारी माना गया है।
वास्तव में, होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह जीवन के आध्यात्मिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी आयामों को समेटे हुए एक समग्र उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि विविधता ही जीवन की सुंदरता है और प्रेम ही सबसे बड़ा रंग है। आइए, इस होली हम भी अपने अंतर्मन की नकारात्मकताओं को जलाकर सद्भाव, समरसता और आनंद के रंगों से अपने जीवन को आलोकित करें। 🌸🌈