अहसास

अहसास कुछ_अपनी_कुछ_जग_की

 #ये_ज़िंदगी......मंजिल का लालच देकरउम्र भर सफ़र में लगाए रखती है ।
06/07/2026

#ये_ज़िंदगी......
मंजिल का लालच देकर
उम्र भर सफ़र में लगाए रखती है ।

11/06/2026

2 मिनिट का काम है, मौसम विभाग के किसी सरकारी बाबू को पकड़ो और पूछ लो कि कब से बारिश शुरू होगी, मॉनसून कब तक आ जाएगा, लेकिन मीडिया वाले अपनी चुल मिटाने 2 कौड़ी की राइमिंग न कर लें तबतक उन्हें शांति ही नही

कहाँ अटके हैं बादल, किस गली में है काजल, क्यों रूठा है आंचल, क्यों सूखा है चप्पल, आखिर किसने रोका है रिमझिम का रास्ता, क्यों पसीने ने जनता से जोड़ा है गहरा नाता.

क्या आसमान ने धरती को ब्लॉक कर दिया है, क्या बादलों ने पानी का स्टॉक कर लिया है, क्या उमस ने फिर से खेल किया है, क्या धूप ने जनता को पेल दिया है, आखिर क्यों नहीं बरस रहा है मेघ, आखिर किसके हाथ में है यह रेन का ब्रेक

जी हाँ बड़ा सवाल, क्या मॉनसून हुआ मिसकॉल, क्या बादल गए कंट्रोल से आउट, क्या सावन ने जनता को दिया डाउट, क्या बारिश ने कर दिया सीन, क्या इस बार भी बाल्टी रहेगी क्लीन.

कब तक तपेगी टंकी, कब तक जलेगी गंजी, कब तक खौलेंगे नल, कब तक सूखेगा पल पल, कब तक छत पर पड़ेगा बिछौना, कब तक कूलर करेगा रोना, कब तक पंखा बोलेगा भाई मुझसे न होगा, कब तक आदमी नहाकर भी लगेगा जैसे अभी नहाना बाकी होगा.

आखिर क्यों ठहरा है बादल, क्यों बहका है पागल, क्यों अटका है मौसम का पैगाम, क्यों गर्मी कर रही है खुल्लमखुल्ला अत्याचार तमाम.

क्यों चुप हैं मेघ महाराज, क्यों सूखा पड़ा है अंदाज़, क्यों धूप के चेहरे पर है तानाशाही का नूर, क्यों आदमी के रोम रोम से निकल रहा है भाप का दस्तूर.

आखिर किस दिशा में भागी बदरिया, किसने छीन ली बूंदों की चुनरिया, कौन पी गया फुहारों का घड़ा, क्यों आसमान अब भी खड़ा का खड़ा.

आखिर क्यों उमस ने पहना है लहंगा, क्यों पसीना हो गया है महंगा, क्यों बनियान ने दिया इस्तीफा, क्यों तौलिया कर रहा है चीख चीखकर खुलासा.

आखिर चुप क्यों है मौसम विभाग, क्यों नहीं खोलता बादलों की फाइल, कब जारी होगा बारिश का प्रोफाइल, कहाँ छिपा है बूंदों का मोबाइल.

एंड आई एम लाइक ये धेह पिटी का काव्यपाठ तेरा हो जाए खत्म तो एक कॉल मौसम विभाग में कर ले बहन और सीधा सीधा पूछ ले!

हम  मन्कूहा लोगों की कुछ "दास्तान-ए-इश्क़" अप्रकाशित ही रह जाती हैं। सार्वजनिक मुलाकात में हमारी कोई एक दूसरे से पहचान न...
31/05/2026

हम मन्कूहा लोगों की कुछ "दास्तान-ए-इश्क़" अप्रकाशित ही रह जाती हैं। सार्वजनिक मुलाकात में हमारी कोई एक दूसरे से पहचान नहीं होती है। ऐसा लगता है की प्रेम करना गुनाह और प्रेमी होना चोर होने जैसा है। लोक लाज की चादर में लजाए हुए प्रेमी रोज ख्यालों के महल बनाते हैं और रोज तोड़ देते हैं। जो बना लिए होते हैं वह भी और जो नहीं बना पाए होते हैं वह भी। यह रोज मरते हैं, और फिर जिंदा होते हैं। और इसीलिए उनकी मौत का पता भी नहीं चलता है, ऐसे लोगों की समाधि की कोई तस्मीया होती ही नहीं है, और ना ही इन अज्ञात समाधियों की कोई पहचान होती है । प्रेम की यह अकेली स्वीकार्यता, सुलगन, प्रेम का अदृश्य साथ जब किसी दृश्य को धारण करता है। तो कभी राधा और कभी कृष्णा बनकर समाज में एक खुशबू की तरह फैल जाता है। और इस महक को पहचानने वाले लोग सिर्फ अनुमान लगाते हैं। सिर्फ अनुमान लगाते......।

मन्कूहा–शादीशुदा

तस्मीया–नामकरण

25/05/2026
लड़ना तो पड़ेगा ही इस दुनिया मेंदुनिया से नहीं तो अपनेआप से ......
07/05/2026

लड़ना तो पड़ेगा ही इस दुनिया में
दुनिया से नहीं तो अपनेआप से ......

कर्म करो और सब केशव को सौंप दो...आखिर ये जग तो सब तुमसे ले ही लेगा...
25/04/2026

कर्म करो और सब केशव को सौंप दो...
आखिर ये जग तो सब तुमसे ले ही लेगा...

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