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दोस्त होते तुम तो तुमको भूलना मुमकिन भी था,एक दुश्मन को भला हम भूल जाते किस तरह ।दिल में जो नक्से वफ़ा तुम छोड़कर यूँ चल...
29/03/2026

दोस्त होते तुम तो तुमको भूलना मुमकिन भी था,
एक दुश्मन को भला हम भूल जाते किस तरह ।

दिल में जो नक्से वफ़ा तुम छोड़कर यूँ चल दिये,
उन लकीरों को भला हम यूँ मिटाते किस तरह ।

तुम थे आदत की तरह ,साँसो में घुलकर बस गये,
खुद से खुद को इस कदर हम दूर करते किस तरह ।

जिंदगी बस नाम है एक ख़्वाब की ताबीर का,
ख़्वाब ही टूटे तो फिर ख़ुद को बचाते किस तरह ।
✍️तनुजा राय

28/03/2026

25/03/2026

हर मोड़ पर लगता था जुदा कुछ भी नहीं था
या इश्क़ था या हुस्न था या कुछ भी नहीं था।

दरिया में उतर कर ये समझ आई हकीकत
लहरों के सिवा कोई सदा कुछ भी नहीं था।

हम ढूंढते फिरते रहे तुझको ही जहाँ में,
हर ज़र्रे में तू था — ये पता कुछ भी नहीं था।

लहरों में, हवाओं में, फ़िज़ाओं में तू ही तू,
देखा जो ग़ौर से तो जुदा कुछ भी नहीं था।
✍️तनुजा राय

स्वार्थ की सीढ़ी चढ़े जो, वो शिखर पाते नहीं हैं,भीख में मिलती हुई वो साधना अच्छी नहीं है।दर्द को जो बेच डाले, शब्द की मं...
18/03/2026

स्वार्थ की सीढ़ी चढ़े जो, वो शिखर पाते नहीं हैं,
भीख में मिलती हुई वो साधना अच्छी नहीं है।

दर्द को जो बेच डाले, शब्द की मंडी सजाकर,
ऐसी खोखली सी कोई वेदना अच्छी नहीं है।

जो झुका हो सिर्फ़ पाने की ललक में हर घड़ी
उस झुकन में आत्मा की चेतना अच्छी नहीं है।

धर्म जब प्रपंच हो ,मन में रहे फिर भी अंधेरा,
ऐसी पूजा, ऐसी कोई वंदना अच्छी नहीं है।
✍️तनुजा राय

17/03/2026

मैं अपने भीतर एक घर बुनती हूँ ।

इक बात है ऐ दिलनशीं याद नहीं हैकब हम थे हसीं तुम थे जवाँ याद नहीं है।दो चार क़दम जब कि तेरे साथ चले थेक़दमों के तले थी य...
14/03/2026

इक बात है ऐ दिलनशीं याद नहीं है
कब हम थे हसीं तुम थे जवाँ याद नहीं है।

दो चार क़दम जब कि तेरे साथ चले थे
क़दमों के तले थी ये ज़मीं,याद नहीं है।

वो लम्हा कि जब नूर-ए-नज़र हम पे गिरा था
दिल में जगी जो दिलकशी वो याद नहीं है।

हम लोग कभी दास्तान-ए-इश्क़ थे शायद
अब आँख में क्यूँ है ये नमी याद नहीं है।

महफ़िल में तेरी आज भी आते हैं अदब से
पहले सी मगर दिल की लगी याद नहीं है

अब नाम भी अपना हमें लगता है अजनबी
हम कौन थे ऐ दिलनशीं याद नहीं है।
✍️तनुजा राय

घर बनाया जिस्म का, पर रूह ये बेज़ार थी,हर नए कमरे की ख़ातिर दिल पे इक दीवार थी।गिन रही थी बे-किनार ,थकती न थी ये आरज़ू,स...
26/02/2026

घर बनाया जिस्म का, पर रूह ये बेज़ार थी,
हर नए कमरे की ख़ातिर दिल पे इक दीवार थी।

गिन रही थी बे-किनार ,थकती न थी ये आरज़ू,
साँस छोटी हो रही थी, चाह बेशुमार थी।

फर्श के नीचे दबा इक दरिया था ख़ामोश-सा,
नाम से आज़ाद होना जिसकी बस पुकार थी।

आँधियाँ आईं तो जाना — ये क़हर हरगिज़ न था,
रब की बस दस्तक थी, परतों पर दरार थी।

एक कमरा कम किया तो एक दुनिया खुल गई,
घर तो छोटा रह गया, पर रूह में विस्तार थी।
✍️तनुजा राय

रात ढली तो ख़्वाब सभीआँखों से यूँ गिरते थे,चुपके-चुपके दर्द हमारेतकियों में ही रहते थे।इतने बड़े हो के भी हमबच्चों जैसा ...
25/02/2026

रात ढली तो ख़्वाब सभी
आँखों से यूँ गिरते थे,
चुपके-चुपके दर्द हमारे
तकियों में ही रहते थे।

इतने बड़े हो के भी हम
बच्चों जैसा रोते थे,
भीड़ बहुत थी दुनिया भर की
फिर भी तन्हा रहते थे।

दिल के कोने भी अक्सर हमसे
चुपके-चुपके कहते थे,
हँसते थे महफ़िल के आगे
पीछे आकर रोते थे।

ख़्वाब सजाते आँखों में हम
सच से लेकिन डरते थे,
अपने होने की ख़ातिर जाने
कितने रिश्ते खोते थे।

सबको अपनी बात सुनाते
खुद से लेकिन चुप रहते थे,
आईना जब सामने आया
हम खुद से ही डरते थे।

हम भी अपने दिल की धड़कन
सबसे छुपकर कहते थे,
लोग हमें मज़बूत समझते
हम भीतर से टूटे थे।
✍️तनुजा राय

एक दीपक था —जिसे कोनों में रखा गया था।कहा गया —यहीं ठीक है तुम्हारी जगह।दीपक मुस्कुराया।उसे पता था —रोशनी को सीमाएँ समझ ...
18/02/2026

एक दीपक था —
जिसे कोनों में रखा गया था।
कहा गया —
यहीं ठीक है तुम्हारी जगह।

दीपक मुस्कुराया।
उसे पता था —
रोशनी को सीमाएँ समझ नहीं आतीं।

हवा आई —
उसे बुझाने।
दीपक काँपा नहीं,
बस लौ को थोड़ा और सीधा कर लिया।

दीवारें ऊँची थीं,
खिड़कियाँ छोटी।
पर रोशनी ने रास्ता ढूँढ लिया —
दरारों से।

एक नदी थी —
जिसे बाँधों ने रोक रखा था।
उसे समझाया गया —
“बहना संयम से…”

नदी ने चुपचाप पत्थरों को चूमा,
फिर रास्ता मोड़ लिया।
समंदर तक पहुँचने के लिए
शोर ज़रूरी नहीं होता।

एक बीज था —
जिसे मिट्टी ने दबा दिया।
अँधेरा था, भार था।
पर उसी दबाव में
जड़ें गहरी हुईं।

और एक सुबह
धरती फटकर नहीं,
धीरे-धीरे खुली —
और बीज वृक्ष बन चुका था।

अब वो दीपक
कोने में नहीं है।
वो नदी
रुकी नहीं है।
वो वृक्ष
झुका नहीं है।

क्योंकि रोशनी,
पानी और जड़ —
तीनों जानते हैं
जो भीतर से जाग जाए,
उसे रोकना
संभव नहीं होता।
अब दीपक
आँधी से नहीं डरता।
नदी
रास्तों से नहीं डरती।
वृक्ष
छाँव देने से नहीं डरता।

क्योंकि स्वाभिमान, आवाज़ और पहचान —
तीनों जब जाग जाते हैं,
तो इतिहास बदलते हैं
शोर से नहीं…
अडिग अस्तित्व से।
✍️तनुजा राय
गुरुग्राम
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