12/01/2026
यह एक पुरानी व्यवस्था का आधुनिक चेहरा मात्र है।
पहले के दौर में भी यही हुआ करता था—जो लोग सत्ता की चाटुकारिता करते थे, वे ब्रिटिश और मुगल शासकों के सामने सिर झुकाकर उनके आशीर्वाद से बड़े-बड़े जमींदार, रियासतदार और सम्मानित पदवी प्राप्त कर लेते थे। उनकी वफादारी के बदले उन्हें जमीनें, खिताब और सुरक्षा मिलती थी। वहीं जो विरोध करते थे—चाहे वह स्वतंत्रता की पुकार हो या अन्याय के खिलाफ आवाज—उनका अंजाम बेहद दर्दनाक होता था: फांसी की सजा, काल-कोठरी में बंदी बनाकर मार डाला जाना, उनकी रियासतें छीन ली जातीं, या उन्हें पूरी तरह तबाह कर दिया जाता था।
आज के समय में भी वही कहानी दोहराई जा रही है, बस तरीके और नाम बदल गए हैं। जो लोग सत्ता के सामने सिर झुकाते हैं, "हाँ में हाँ" मिलाते हैं, वे मंत्री, विधायक, सांसद बन जाते हैं—सुख-सुविधाएँ, पद और शक्ति उनके कदम चूमती है।
लेकिन जो सच्चाई बोलने की हिम्मत करते हैं, जो अन्याय का विरोध करते हैं, उनके साथ आज भी वही सलूक होता है—केवल औजार बदल गए हैं:
ED, CBI, इनकम टैक्स जैसी एजेंसियों के छापे पड़ते हैं,
फर्जी मुकदमों का जाल बिछाया जाता है,
घर पर बुलडोजर चलाया जाता है,
खेती-बाड़ी, जमीन-जायदाद जब्त कर ली जाती है,
खाते-खतौनी सील कर दिए जाते हैं,
और यदि विरोध जारी रहा तो NSA लगा कर वर्षों तक जेल की कोठरी में बंद कर दिया जाता है।
यह सत्ता की चाटुकारिता बनाम साहसिक विरोध की सदियों पुरानी लड़ाई है—बस काल बदल गया है, शोषण का ढांचा वही है। जो झुक जाता है, उसे सोना मिलता है; जो खड़ा रहता है, उसे कुचल दिया जाता है।
इतिहास हमें बार-बार याद दिलाता है कि सच्चाई और न्याय की राह कभी आसान नहीं होती, अखिलेश यादव फौजी ✍️✍️