20/03/2026
बदलते मौसमों ने जहाँ एक ओर लोगों को तपती गर्मी से थोड़ी राहत दी है, वहीं शहरों का मिज़ाज भी कुछ खुशनुमा सा हो गया है। ठंडी हवाएँ, बादलों की हल्की छांव और बारिश की फुहारें शहरी जीवन में एक सुकून भर देती हैं। लोग इस मौसम का आनंद लेते हैं, चाय की चुस्कियों के साथ बारिश को निहारते हैं और इसे प्रकृति का उपहार मानते हैं।
लेकिन यही मौसम किसानों के लिए अक्सर चिंता और बेचैनी लेकर आता है। उनके लिए बरसात केवल पानी की बूंदें नहीं होतीं, बल्कि हर एक बूंद उनके महीनों के कठिन परिश्रम और संजोई हुई उम्मीदों पर प्रहार जैसी होती है। इस समय चैता की फसल—जैसे चना, मसूर, खेसारी और सरसों—लगभग पककर तैयार हो चुकी होती है और किसान उसे घर लाने की तैयारी में होते हैं। यही वह समय होता है जब उनकी मेहनत रंग लाने वाली होती है, जब उनके सपने साकार होने के करीब होते हैं।
परंतु अचानक होने वाली बारिश इन सारी उम्मीदों पर पानी फेर देती है। खेतों में खड़ी फसल भीगकर खराब हो जाती है, दाने झड़ने लगते हैं और कई बार पूरी उपज बर्बाद हो जाती है। एक किसान के लिए यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि उसके आत्मविश्वास और हौसले पर भी गहरी चोट होती है।
फिर भी, किसान अपने धैर्य और विश्वास के सहारे आगे बढ़ता है। वह जानता है कि प्रकृति के आगे किसी का बस नहीं चलता। इसलिए वह मन को समझाकर यही कहता है—जो होना है, वह तो होकर ही रहेगा—और फिर से नई उम्मीदों के साथ अगली फसल की तैयारी में जुट जाता है।