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 #किस्सागोई-5.39: राजकुमारी संगीता द्वारा अनाम योद्धा की  #पहचान  #सुनो_कहानी   अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द्र से वरदान...
07/09/2026

#किस्सागोई-5.39: राजकुमारी संगीता द्वारा अनाम योद्धा की #पहचान
#सुनो_कहानी

अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द्र से वरदान में मिले अमरफल को सेठ मथुरामल ने #मारवाड़ नरेश को दे दिया। मारवाड़ नरेश ने भी समस्त प्रजा के #कल्याण के लिए उस अमरफल को अपने शाही उद्यान में बो दिया। बार बार चोरी होने वाले उस अमरफल को राजकुमार विजय ने अपनी चतुराई से बचा लिया। अमरफल की सुरक्षा से प्रसन्न महाराज ने छोटे राजकुमार को राज्य का #युवराज बनाने का निर्णय ले लिया। दोनों बड़े राजकुमार अपमानित होकर राज्य छोड़कर चले तो राजकुमार #विजय भी उनके साथ चला गया। तीनों राजकुमार मिथिला नरेश रुद्रसिंह के राज्य में पहुंचकर बूढ़ी भटियारिन की सराय में ठहर गये। मिथिला की राजकुमारी के स्वयंवर की कठिन #चुनौती को पूर्ण करने की कोशिश में दो वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गये। छोटे राजकुमार विजय ने अमरदेव की सहायता से रंगभूमि में बैठी राजकुमारी संगीता को तीन बार सफलतापूर्वक #बांसुरी स्पर्श करवाकर स्वयंवर की शर्त पूरी कर दी। मगर स्वयंवर की शर्त पूरी करने वाला यह योद्धा दो दिन तक सामूहिक भोज के बाद भी सार्वजनिक रूप से सामने आने से बचता रहा।अब आगे पढ़िये....

सारी जानकारी मिलने के बाद राजकर्मचारी राजकुमार विजय के भाइयों को रंगमैदान में ढूंढने लगे। राजकुमार संजय और अजय को साथ लेकर चारों सैनिक एक बार फिर बूढ़ी भटियारिन की सराय में पहुंचे और एक बार फिर राजकुमार विजय को भोज के लिए चलने के लिए कहा। राजकुमार विजय ने अपने भाइयों की अनुमति की बात की तो दोनों बड़े भाइयों ने राजकुमार विजय से कहा, "विजय, हमने तो तुम्हें सुबह ही अपने साथ चलने के लिए कहा था मगर तुमने ही सराय से बाहर जाने से मना कर दिया था। चलो, अब तो तुम्हारे ऊपर सराय से बाहर जाने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। फिर देखो, ये #मिथिला राज्य के चार सैनिक भी तुम्हें लेने आए हैं।"

विजय ने कहा, "भैय्या, मैं तो अब इस सराय से बाहर जाना ही नहीं चाहता। पता नहीं, ये लोग मेरे पीछे क्यों पड़े हैं। न मुझे कहीं जाना और न ही मुझे कुछ खाना है। आप इनसे कह दो कि रंगमैदान में आने वाले अन्य नागरिकों पर ध्यान दें, मुझे ले जाने की जिद छोड़ दें। मैं कहीं नहीं जाऊंगा।"

राजकुमार संजय ने सैनिकों से कहा, "देख लिया आपने? बहुत जिद्दी है हमारा छोटा भाई। जो तय कर लिया सो कर लिया। आप इसे यहीं छोड़ दो और वापस लौट जाओ, यह कहीं नहीं जाना चाहता।"

सैनिकों ने उन्हें साफ साफ बता दिया कि महाराज की आज्ञा है कि कोई भी नगर निवासी या #प्रवासी रंगमैदान में आने से रह न जाए। वह कितना भी बीमार, कमजोर या बूढ़ा हो, स्त्री, पुरुष या फिर बच्चा ही क्यों न हो, सबको रंगमैदान में आना ही होगा और राजकुमारी संगीता के सामने से गुजरना ही होगा। यदि कोई अपनी मनमर्जी से नहीं आता तो हमें जबरदस्ती उसे उठाकर ले जाना पड़ेगा।

इस पर छोटे राजकुमार विजय ने कहा, "अगर ऐसी बात है और मुझे रंगमैदान में जाना ही पड़ेगा तो मैं ऐसे नहीं जाऊंगा। मेरे लिए #शाही सवारी लाओ, मैं उसमें बैठ कर ही रंगमैदान में जाऊंगा। महाराज मुझे रंगमैदान में देखना चाहते हैं तो खुद सवारी भेजें। नहीं तो, मैं नहीं जाता कहीं भी। चाहे जितनी जबरदस्ती कर लो।"

विजय के दोनों बड़े भाई घबरा गये। विजय ने यह क्या कह दिया? यदि महाराज रुद्रसिंह नाराज हो गए तो हम सबको सजा भी मिल सकती है। वे चुपचाप उन चारों सैनिकों की ओर देखने लगे। पता नहीं अब ये चारों विजय के साथ क्या करेंगे?

महाराज रुद्रसिंह के सैनिक भी पशोपेश में पड़ गए। प्रवासी रंगमैदान जाने से मना नहीं कर रहा था, बस उसे रंगमैदान जाने के लिए शाही सवारी चाहिए। ऐसे में वे उसके साथ जबरदस्ती भी नहीं कर सकते थे। उन्होंने तुरन्त अपने अधिकारियों को सूचित किया और अधिकारियों ने मिथिला नरेश को इसके बारे में बताया। सारी बातें सुनकर #महाराज रुद्रसिंह क्रोधित होने की बजाय जोर जोर से हंसने लगे। उन्होंने महामंत्री से शाही सवारी सजाकर उस प्रवासी को रंगमैदान में ले जाकर राजकुमारी संगीता के सामने से गुजारने के लिए कहा। स्पष्ट #आदेश थे कि प्रवासी के साथ पूरे आदर का व्यवहार किया जाये और उसे बेहतरीन भोजन करवाया जाये। क्या पता, यह प्रवासी ही वह योद्धा हो जिसकी हमें अनेक दिनों से तलाश है?

शाही सवारी बूढ़ी भटियारिन की सराय में पहुंची तो विजय के दोनों भाई हैरान रह गए। वे दोनों तो रंगमैदान में अजनबियों की तरह अपने घोड़ों पर गये थे और भीड़भाड़ में चुपचाप भोजन करके राजकुमारी संगीता के सामने से निकल आये। मगर यह विजय तो पूरे शाही सम्मान के साथ रंगमैदान में जायेगा और अपनी पसन्द के शाही #पकवान खायेगा। न चाहते हुए भी दोनों भाइयों को विजय से #जलन सी होने लगी।

विजय अपने सामान्य कपड़ों में ही शाही सवारी में बैठ गया। शाही सवारी चल पड़ी तो दोनों बड़े राजकुमार भी उसकी सवारी के साथ अपने घोड़ों पर चले। अब वे देखना चाहते थे कि राजकुमार विजय के साथ राजकर्मचारी और सैनिक कैसा व्यवहार करते हैं?

रंगमैदान में भोज के लिए आये हुए लोगों ने दो घुड़सवारों के साथ एक शाही सवारी को रंगमैदान आते देखा तो उन्होंने समझा कि महाराज रुद्रसिंह स्वयं रंगमैदान में आ गए हैं। सारे राजकर्मचारी और सैनिक सतर्क होकर शाही सवारी की प्रतीक्षा करने लगे।

सवारी पास में आई तो सभी चौंक गए। सवारी में तो बिल्कुल साधारण कपड़ों में एक #नौजवान बैठा था। सैनिक पूरे सम्मान के साथ उस नौजवान को लेकर रंगमैदान में पहले से सजी हुई एक सुन्दर मेज के पास पहुंचे। वहां शाही कुर्सी पर बिठाकर उस नौजवान को उसकी पसन्द पूछ पूछकर भरपेट भोजन करवाया गया।

रंगमैदान में सभी लोग खुसुर पुसुर कर रहे थे। सब अपने अपने अनुमान लगा रहे थे कि आखिर यह नौजवान है कौन, जिसे इतने आदर सम्मान के साथ रंगमैदान में लाकर शाही भोजन करवाया गया है। कुछ लोग कह रहे थे कि महाराज ने उस #अनाम योद्धा को पहचान लिया है और यह नौजवान वही है जिसने तीन बार राजकुमारी संगीता को बांसुरी से स्पर्श करवाकर स्वयंवर की शर्त पूरी की है। जबकि कुछ लोगों को इस बात में सन्देह था कि यह साधारण सा नौजवान मिथिला नरेश का #दामाद बन सकता है।

फिर एक मीठा पान खिलाकर उस नौजवान को पूरे सम्मान के साथ राजकुमारी संगीता के पास ले जाया गया। वह नौजवान वहां जाने से झिझक रहा था मगर राजकर्मचारियों के बार बार कहने पर उसे राजकुमारी संगीता के सामने जाना ही पड़ा।

राजकुमारी संगीता अपने सामने से हजारों लोगों को गुजरते हुए देख रही थी। यह क्रम उसके साथ पिछले तीन दिनों से दोहराया जा रहा था और अब तो उसे #निराशा सी भी होने लगी थी। बड़ी अनिच्छा से वह हर आगन्तुक को देखती और अपना मुंह फेर लेती। राजकुमारी संगीता झरोखे में इस प्रकार बैठी थी कि वह आने वाले हर व्यक्ति को देख सकती थी मगर उन्हें कोई नहीं देख सकता था।

जिस समय राजकुमार विजय को राजकुमारी संगीता के सामने लाया गया, वह वहां बैठे बैठे ऊब गई थी और उसे इस सबसे #उचाट सी होने लगी थी। इसलिये पहले तो उसने विजय को ढंग से देखा नहीं, मगर जब उसने विजय को कुछ लंगड़ाकर धीरे धीरे चलते देखा तो यह नौजवान कुछ पहचाना सा लगा। अब उसने उसे ध्यान से देखा और पहचान गई कि यही वह योद्धा है जिसने उसे तीन बार बाँसुरी से स्पर्श करवाकर यह असम्भव सा स्वयंवर जीत लिया था। अपनी पहचान को पुख्ता करने के लिए उसने अपनी एक सहेली के कानों में कुछ कहा। वह लड़की झरोखे से उतरकर विजय के सामने आई और उसने उसके बायें पैर का जूता निकालने को कहा।

पहले तो राजकुमार विजय ने जूता निकालने में आनाकानी की, मगर फिर उसने जूता उतारते हुए उस लड़की से हँसकर पूछ ही लिया, "राजकुमारी जी को बाँसुरी से अधिक #चोट तो नहीं लगी?" नौजवान की बात, उसकी हँसी और बायें पैर के अंगूठे में लगी चोट ने #निर्णय कर दिया और राजकुमारी के संकेत से सैनिकों ने उसे घेर लिया। राजकुमारी धीरे धीरे विजय के पास आई और उसके गले में #वरमाला डालकर उसके चरण छू लिये।

यह देखकर विजय के दोनों बड़े भाई, बूढ़ी भटियारिन और विजय को सराय से लाने वाले सभी सैनिक #हैरान रह गए। ऐसा कैसे हो सकता है??

©चन्द्र-लक्ष्मी

🌷 क्या मिथिला नरेश राजकुमारी संगीता का शुभ #विवाह राजकुमार विजय के साथ करने के लिए तैयार हो गये?? आखिर दोनों बड़े राजकुमारों का #अर्धनग्न अवस्था में निष्कासन का #रहस्य क्या था???

🌷इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने के लिये पढ़ते रहिये हमारी कहानी की अगली किश्तें और अपने मित्रों को भी किस्सागोई से जुड़ने के लिये प्रेरित कीजिये।

🌷और हाँ, कहानी की यह किश्त आपको कैसी लगी? हमें अपने लाईक, कमेंट, Star और शेयर के माध्यम से जरूर बताइये। यदि आप हमसे कुछ कहना चाहते हों तो हमें ईमेल या कीजिये।
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 #किस्सागोई-5.38: राजकुमार विजय का सामूहिक भोज में जाने से इन्कार    #सुनो_कहानी   अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द्र से  #...
04/09/2026

#किस्सागोई-5.38: राजकुमार विजय का सामूहिक भोज में जाने से इन्कार
#सुनो_कहानी

अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द्र से #वरदान में मिले अमरफल को सेठ मथुरामल ने मारवाड़ नरेश को दे दिया। मारवाड़ नरेश ने भी समस्त प्रजा के #कल्याण के लिए उस अमरफल को अपने शाही उद्यान में बो दिया। बार बार चोरी होने वाले उस अमरफल को राजकुमार विजय ने अपनी चतुराई से बचा लिया। अमरफल की सुरक्षा से प्रसन्न महाराज ने छोटे राजकुमार को राज्य का #युवराज बनाने का निर्णय ले लिया। दोनों बड़े राजकुमार अपमानित होकर राज्य छोड़कर चले तो राजकुमार विजय भी उनके साथ चला गया। तीनों राजकुमार मिथिला नरेश रुद्रसिंह के राज्य में पहुंचकर बूढ़ी भटियारिन की सराय में ठहर गये। मिथिला की राजकुमारी के स्वयंवर की कठिन #चुनौती को पूर्ण करने की कोशिश में दो वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गये। छोटे राजकुमार विजय ने अमरदेव की सहायता से रंगभूमि में बैठी राजकुमारी संगीता को तीन बार सफलतापूर्वक #बांसुरी स्पर्श करवाकर स्वयंवर की शर्त पूरी कर दी। मगर स्वयंवर की शर्त पूरी करने वाला यह योद्धा दो दिन तक सामूहिक भोज के बाद भी सार्वजनिक रूप से सामने आने से बचता रहा।अब आगे पढ़िये....

दूसरे दिन के भोज के बाद भी स्वयंवर विजेता योद्धा की पहचान न हो पाने से राजा रुद्रसिंह की #निराशा का अन्त नहीं था। आज भी महाराज ने अपने दरबारियों और राजगुरु से बातचीत की। दरबारियों का मानना था कि आज नगरवासियों की संख्या कल से अधिक थी। इसका अर्थ यह है कि अभी भी नगर में कुछ लोग ऐसे हैं जो इस भोज में शामिल नहीं हुए हैं। उन्हीं लोगों में वह वीर भी है जो स्वयंवर जीतने के बाद भी अज्ञात कारणों से सामने आने से बच रहा है। कल एक बार फिर भोज का आयोजन करके शामिल न होने वाले व्यक्तियों और उनके परिजनों के लिए #सजा की घोषणा करने से कोई भी व्यक्ति इस भोज में शामिल होने से बच नहीं सकेगा और राजकुमारी संगीता भी स्वयंवर की चुनौती पूर्ण करने वाले योद्धा की पहचान कर सकेंगी। सजा वाली बात पर राजगुरु सहमत नहीं थे, मगर कोई अन्य उपाय न होने के कारण उन्होंने इसके लिए अपनी सहमति दे दी।


अगले दिन फिर से रंगमैदान में सामूहिक भोज का ऐलान हुआ। इस बार मुनादी में साफ साफ घोषणा कर दी गई कि आज के भोज में प्रत्येक नगरवासी और नगर में रहने वाले सभी प्रवासियों को भी आना जरूरी है। यदि नगर में रहने वाला कोई व्यक्ति आज सामूहिक भोज में शामिल नहीं होता है तो उस व्यक्ति और उसके परिवारजनों को कड़ी सजा मिलेगी।

आज तो रंगमैदान में भीड़ देखने लायक थी। दोपहर होने से पहले ही भोज में शामिल होने वाले व्यक्तियों की लम्बी लम्बी लाइनें लग गई थी। यह देखकर #महाराज, दरबारी और राज्य कर्मचारी आश्वस्त हो गये थे कि आज तो चुनौती पूर्ण करने वाले योद्धा की #पहचान हो ही जायेगी। दोनों बड़े राजकुमार भी इस भोज में शामिल होने के लिए निकलने लगे तो बेचारी बूढ़ी #भटियारिन भी भोज में शामिल होने के लिए निकल पड़ी। संजय और अजय ने छोटे राजकुमार विजय से भी राजाज्ञा का जिक्र करते हुए साथ चलने की बात कही। मगर राजकुमार विजय ने साफ साफ मना कर दिया कि मैं अब तक सराय से बाहर नहीं गया तो अब भी नहीं जाऊंगा। लाना चाहो, तो मेरे लिए यहीं सराय में ही #भोजन ले आना, नहीं तो कोई बात नहीं, आज दोपहर को मैं भूखा ही रह लूंगा। लाचार दोनों बड़े राजकुमार और बूढ़ी भटियारिन सामूहिक भोज में चले गए।
#चन्द्र_लक्ष्मी

यहां रंगमैदान में राजकर्मचारियों ने आज एक विशेष व्यवस्था बना रखी थी। रंगमैदान में भोज के लिए आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से पूछा जा रहा था कि उनके घर में कोई व्यक्ति भोज में आने से रह तो नहीं गया। साथ में उसे चेतावनी भी दी जाती थी कि यदि बाद में उनके परिवार में से किसी के भोज में शामिल न होने की जानकारी मिली तो परिवार के प्रत्येक व्यक्ति को महाराज के क्रोध व सजा का सामना करना पड़ेगा। इस कारण, यदि किसी के परिवार में से कोई भी किसी भी कारण से भोज में शामिल होने में असमर्थ हो तो राजकर्मचारियों को साफ साफ बता दिया जाता था। राजकर्मचारियों में से चार कर्मचारी उसके साथ उसके घर जाते थे और घोड़ागाड़ी में बैठाकर या लिटाकर उस व्यक्ति को रंगमैदान में लाकर राजकुमारी संगीता के सामने से गुजारा जाता था। इस प्रकार नगर का कोई भी #निवासी व #प्रवासी इस भोज में शामिल होने से नहीं बच सकता था।

दोनों बड़े राजकुमार संजय और अजय तो चुपचाप रंगमैदान में प्रवेश कर गये मगर जब बूढ़ी भटियारिन रंगमैदान में प्रवेश करने लगी तो उससे भी वही प्रश्न पूछा गया तो वह घबरा गई और डर के मारे बूढ़ी भटियारिन ने साफ साफ बता दिया कि उसकी सराय में तीन #परदेशी ठहरे हुए हैं। उनमें से दो परदेशी तो इस रंगमैदान में पिछले तीन दिनों से लगातार आ रहे हैं जबकि उनका तीसरा भाई सराय में ही रहता है। उसके दोनों बड़े भाई उसे सराय से बाहर कहीं जाने ही नहीं देते। इसलिए आज भी वह इस भोज में नहीं आया है। मैंने आपको इसलिए बता दिया ताकि बाद में मेरे ऊपर कोई इल्ज़ाम न लगे।

राजकर्मचारियों को पता चलते ही तुरन्त उन्होंने चार सैनिकों को बूढ़ी भटियारिन के साथ उसकी सराय पर भेज दिया ताकि वे उसे भोज में लाकर राजकुमारी संगीता के सामने पेश कर सकें। जब वे सराय में पहुंचे तो राजकुमार विजय अपने बिस्तर पर पड़ा आराम कर रहा था। राजकर्मचारियों को देखकर वह अपने बिस्तर से उठ खड़ा हुआ और राजकर्मचारियों को हाथ जोड़कर #प्रणाम किया। सैनिकों ने उसे भोज में चलने के लिए कहा तो उसने अपने भाइयों की आज्ञा का हवाला देते हुए राजसी भोज में जाने से साफ इन्कार कर दिया। उसका कहना था कि जब तक उसके भाई स्वयं आकर उसे अनुमति नहीं देंगे व भोज में नहीं जायेगा।

उसकी इस बात को सुनकर चारों सैनिक बूढ़ी भटियारिन के साथ रंगमैदान में वापस चले आए और उन्होंने अपने अधिकारियों को सारी बात बता दी।

©चन्द्र-लक्ष्मी

🌷 मिथिला नरेश को राजकुमारी संगीता के कठिन स्वयंवर को जीतने वाले का कैसे पता चला? क्या राजकुमारी संगीता का शुभ #विवाह राजकुमार विजय के साथ हो पाया?? आखिर दोनों बड़े राजकुमारों का #अर्धनग्न अवस्था में निष्कासन का #रहस्य क्या था???

🌷इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने के लिये पढ़ते रहिये हमारी कहानी की अगली किश्तें और अपने मित्रों को भी किस्सागोई से जुड़ने के लिये प्रेरित कीजिये।

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 #किस्सागोई-5.37: सामूहिक भोज में  #स्वयंवर विजेता योद्धा की पहचान का प्रयास #सुनो_कहानी   अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द...
02/09/2026

#किस्सागोई-5.37: सामूहिक भोज में #स्वयंवर विजेता योद्धा की पहचान का प्रयास
#सुनो_कहानी

अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द्र से #वरदान में मिले अमरफल को सेठ मथुरामल ने #मारवाड़ नरेश को दे दिया। मारवाड़ नरेश ने भी समस्त प्रजा के कल्याण के लिए उस अमरफल को अपने शाही उद्यान में बो दिया। बार बार चोरी होने वाले उस अमरफल को राजकुमार विजय ने अपनी चतुराई से बचा लिया। अमरफल की सुरक्षा से प्रसन्न महाराज ने छोटे राजकुमार को राज्य का #युवराज बनाने का निर्णय ले लिया। दोनों बड़े राजकुमार अपमानित होकर राज्य छोड़कर चले तो राजकुमार #विजय भी उनके साथ चला गया। तीनों राजकुमार मिथिला नरेश रुद्रसिंह के राज्य में पहुंचकर बूढ़ी भटियारिन की #सराय में ठहर गये। मिथिला की राजकुमारी के स्वयंवर की कठिन चुनौती को पूर्ण करने की कोशिश में दो वीर योद्धा #वीरगति को प्राप्त हो गये। छोटे राजकुमार विजय ने अमरदेव की सहायता से रंगभूमि में बैठी राजकुमारी संगीता को तीन बार सफलतापूर्वक #बांसुरी स्पर्श करवाकर स्वयंवर की शर्त पूरी कर दी। अब आगे पढ़िये....


तीन दिन तक स्वयंवर की कठिन चुनौती पूर्ण करने वाले योद्धा की पहचान के लिए प्रयास चलते रहे मगर उनका कोई सकारात्मक #परिणाम नहीं निकला। परेशान होकर राजा रुद्रसिंह ने अपने दरबारियों और राजगुरु के साथ गुप्त #मन्त्रणा की। सबका मानना था कि उस वीर योद्धा को निकटता से केवल राजकुमारी संगीता ने ही देखा था, इसलिये उसकी पहचान भी वही कर सकती हैं, दूसरा कोई नहीं। मगर #यक्षप्रश्न यह था कि वह योद्धा तो दरबार में आने के लिए ही राजी नहीं था तो फिर उसकी पहचान हो तो कैसे?

राजगुरु केशवदत्त ने सुझाव दिया कि नगर की सीमाएं बन्द करके एक बड़े मैदान में सभी नगरवासियों को सामूहिक भोज पर आमंत्रित किया जाये। भोजन के बाद सभी पुरुषों को एक झरोखे में बैठी राजकुमारी के सामने से गुजारा जाये। राजकुमारी संगीता निश्चय ही उस योद्धा को पहचान लेंगी। फिर पूरी पड़ताल के बाद उससे उसका #विवाह कर दिया जाये। यह विचार राजा रुद्रसिंह और उनके सभी दरबारियों को पसन्द आ गया।

अगले दिन अलस्सुबह ही पूरे राज्य में मुनादी होने लगी कि पूरे नगर के सभी प्रजाजनों का सामूहिक भोज आज दोपहर रंगमैदान में होगा, इसलिये कोई भी स्त्री या पुरूष आज न तो अपने व्यापार, रोजगार या नौकरी पर जायेगा और न ही अपने घर में भोजन करेगा। मिथिला नरेश के इस आदेश का सभी प्रजाजन अवश्य पालन करें।

इस घोषणा को सुनकर प्रजाजनों में खुशी की लहर दौड़ गई। आज दोपहर में रंगमैदान का नजारा बड़ा दिलचस्प था। सभी बाल, युवा व वृद्ध स्त्री पुरूष प्रजाजन सुन्दर वस्त्रों में सुसज्जित होकर भोजन करने के लिए रंगमैदान पहुंचे। आज तो राजा रुद्रसिंह की ओर से अच्छे अच्छे पकवान व मिठाइयां खाने को मिलेंगी।

रंगमैदान में सेवकों ने बहुत सुन्दर #व्यवस्था बनाई हुई थी। लोग एक द्वार से अन्दर प्रवेश करते और भोजन करने के बाद दूसरे द्वार से स्त्रियां और बच्चे निकल रहे थे, जबकि एक तीसरे द्वार से युवकों और व्यस्कों को गुजारा जा रहा था। इसी द्वार पर एक झरोखे में राजकुमारी संगीता भी #वरमाला के साथ बैठी हुई थी जो संकेत से अपनी सहेलियों को बता रही थी कि आने वाला पुरुष वह वीर योद्धा है या नहीं। उनके आसपास कुछ सैनिक भी सादे वस्त्रों में लगाए गए थे जो राजकुमारी के एक संकेत मात्र पर किसी को भी पकड़ सकते थे।

नगर के सभी स्त्री पुरुषों, बालकों व वृद्धों का भोजन सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। दोनों बड़े राजकुमार भी इस भोज में शामिल हुए। उन्होंने राजकुमार विजय को भी साथ चलने को कहा, मगर उसने उन्हीं की बातें सामने रखकर सराय से बाहर जाने से मना कर दिया। सभी पुरुषों को राजकुमारी संगीता के सामने से गुजारा गया, मगर राजकुमारी संगीता के अनुसार इनमें से कोई भी व्यक्ति वह योद्धा नहीं था। राजकुमारी संगीता भी अपनी सहेलियों के साथ वहां बैठे बैठे थक गई थी। शाही पहरे में राजकुमारी संगीता को #राजमहल ले जाया गया।

स्वयंवर की चुनौती पूर्ण करने वाले योद्धा के आज भी न मिलने से राजा रुद्रसिंह बहुत परेशान हो गए। उन्होंने फिर से अपने दरबारियों और राजगुरु से मन्त्रणा की। उन सबकी समझ में भी नहीं आ रहा था कि वह वीर योद्धा कहाँ छुप गया था। महामन्त्री वीरसिंह का मानना था कि नगर के कुछ लोग अभी भी इस भोज में शामिल नहीं हुए हैं। इसलिये कल फिर से इसी प्रकार दोपहर भोज का आयोजन किया जाये और भोजन के बाद सभी को एक #चांदी का सिक्का भी दिया जाये। चांदी के सिक्के के लोभ में आज न आने वाले लोग भी कल के भोज में अवश्य शामिल होंगे। महाराज रुद्रसिंह को यह सुझाव भी पसन्द आया।

अगले दिन फिर से भोज का आयोजन हुआ। आज इसमें शामिल होने वाले सभी स्त्री पुरुषों को एक एक चांदी का सिक्का भी दिया जाने लगा। भोज में शामिल होने वाले सभी पुरुषों को आज भी राजकुमारी संगीता के सामने से गुजारा गया। आज भी भोज समाप्त हो गया मगर उस वीर योद्धा की पहचान नहीं हो पाई। अब तो राजा रुद्रसिंह की #निराशा की कोई सीमा नहीं थी।

©चन्द्र-लक्ष्मी

🌷 मिथिला नरेश को राजकुमारी संगीता के कठिन स्वयंवर को जीतने वाले का कैसे पता चला? क्या राजकुमारी संगीता का शुभ विवाह राजकुमार विजय के साथ हो पाया?? आखिर दोनों बड़े राजकुमारों का #अर्धनग्न अवस्था में निष्कासन का #रहस्य क्या था???

🌷इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने के लिये पढ़ते रहिये हमारी कहानी की अगली किश्तें और अपने मित्रों को भी किस्सागोई से जुड़ने के लिये प्रेरित कीजिये।

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 #किस्सागोई-5.36: स्वयंवर जीतने वाले अनाम योद्धा की खोज    #सुनो_कहानी अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द्र से वरदान में मिले...
31/08/2026

#किस्सागोई-5.36: स्वयंवर जीतने वाले अनाम योद्धा की खोज
#सुनो_कहानी

अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द्र से वरदान में मिले अमरफल को सेठ मथुरामल ने #मारवाड़ नरेश को दे दिया। मारवाड़ नरेश ने भी समस्त प्रजा के #कल्याण के लिए उस अमरफल को अपने शाही उद्यान में बो दिया। बार बार चोरी होने वाले उस अमरफल को राजकुमार विजय ने अपनी चतुराई से बचा लिया। अमरफल की सुरक्षा से प्रसन्न महाराज ने छोटे राजकुमार को राज्य का #युवराज बनाने का निर्णय ले लिया। दोनों बड़े राजकुमार अपमानित होकर राज्य छोड़कर चले तो राजकुमार #विजय भी उनके साथ चला गया। तीनों राजकुमार #मिथिला नरेश रुद्रसिंह के राज्य में पहुंचकर बूढ़ी भटियारिन की सराय में ठहर गये। मिथिला की राजकुमारी के स्वयंवर की कठिन चुनौती को पूर्ण करने की कोशिश में दो वीर योद्धा #वीरगति को प्राप्त हो गये। छोटे राजकुमार विजय ने अमरदेव की सहायता से रंगभूमि में बैठी राजकुमारी संगीता को तीन बार सफलतापूर्वक #बांसुरी स्पर्श करवाकर स्वयंवर की शर्त पूरी कर दी। अब आगे पढ़िये....


मिथिला की राजकुमारी संगीता का स्वयंवर तो पूर्ण हो गया था मगर उस चुनौती को पूरा करने वाले वीर योद्धा के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी। वह आखिर था कौन और कहां से आया था और स्वयंवर जीतने के बाद फिर से कहां जाकर छिप गया था? उसका सामने आना अभी बाकी था। उसकी पहचान के बिना तो स्वयंवर की शर्त पूरा होना भी बेकार ही था।

अगले दिन मिथिला #नरेश रुद्रसिंह का राजदरबार लगा तो लोगों को पूरी उम्मीद थी कि स्वयंवर की लगभग असम्भव सी #चुनौती को पूर्ण करने वाला योद्धा निश्चय ही आज राजदरबार में उपस्थित होकर अपनी #पहचान उजागर करेगा। दरबार में सारे मन्त्री, #दरबारी, गणमान्य व्यक्ति और यहाँ तक कि सामान्य जन भी भरे हुए थे। सारी प्रजा यह जानने को उत्सुक थी कि राजकुमारी संगीता से विवाह के लिए इतनी कठिन चुनौती को पूर्ण करने वाला योद्धा आखिर है कौन? वह इसी राज्य का निवासी है या किसी अन्य राज्य से आया हुआ प्रतियोगी? उसका रंगरूप कैसा है, कदकाठी कैसी है? इस बात को जानने के लिए दरबार में भीड़ इतनी थी कि रक्षकों को देर से आने वाले आगन्तुक लोगों को दरबार के बाहर ही रोकना पड़ रहा था।

दरबार शुरू होने पर महामन्त्री वीरसिंह ने सभी उपस्थित लोगों के सामने #घोषणा की कि राजकुमारी संगीता का स्वयंवर सफलतापूर्वक संपन्न हो गया है। उन्होंने सफल प्रतियोगी के #साहस और कौशल की भूरि भूरि प्रशंसा की और महाराजा रुद्रसिंह को स्वयंवर की सफलता की बधाई दी। अब तो लोगों को यकीन हो गया कि #महामन्त्री वीरसिंह को सफल प्रतियोगी के बारे में पूरी जानकारी है और बस कुछ ही पल में वे उसे राजदरबार में सबके सामने उपस्थित कर देंगे और फिर राज्य में विवाह के उत्सव आरम्भ हो जायेंगे।

मगर सारी घोषणाओं के बाद स्वयं महामन्त्री वीरसिंह ने दरबार में उपस्थित सभी प्रजाजनों से निवेदन किया कि अभी तक किसी भी योद्धा ने स्वयंवर में स्वयं की सफलता का दावा नहीं किया है इसलिए यदि उस योद्धा के बारे में किसी के पास कोई भी #जानकारी हो तो कृपया दरबार को बताने का प्रयास करें। यह सुनकर प्रजाजन एक बार फिर निराश हो गये।

फिर भी सभी को विश्वास था कि सुबह नहीं तो दोपहर या शाम तक वह योद्धा राजदरबार में जरूर आयेगा, वरना इतनी भयंकर चुनौती में भाग लेने का कोई अर्थ ही नहीं था। इसलिये सभी लोग भूख प्यास के बावजूद दरबार में डटे रहे। स्वयं महाराज और महामन्त्री के कहने के बाद भी लोग राजदरबार से बाहर जाने को तैयार नहीं थे।

शाम होने को आई मगर तब भी कोई योद्धा राजदरबार में अपनी सफलता के बारे में बताने के लिए नहीं आया। दरबार में जुटे लोग भी क्या बताते, दरअसल #प्रतियोगिता के दौरान किसी ने भी उसका चेहरा नहीं देखा था। देखते भी कैसे, एक तो योद्धा ने अपने शरीर और चेहरे को अपनी पौशाक व कवचादि से पूरी तरह ढक रखा था, दूसरे, दूर से तो चेहरा वैसे भी देखने में नहीं आता। अब भला उसकी पहचान हो तो कैसे हो? और वह योद्धा इतना #शर्मीला था कि वह स्वयं राजदरबार में आने से झिझक रहा था।

अगले दिन के दरबार में कुछ लोगों ने इस मौके को भुनाने का प्रयास किया। वे अपनी योद्धा की पौशाक में राजदरबार में आये और स्वयं को स्वयंवर के विजेता के रूप में पेश कर दिया। मगर #असमंजस की स्थिति तो तब उत्पन्न हो गई जब अचानक तीन योद्धा स्वयं को स्वयंवर का विजेता बताने लगे। पिछले दिन दरबार में न आने का कारण उन्होंने अत्यधिक भीड़भाड़ को बताया जो कि पिछले दिन की वास्तविकता भी थी। अब महाराज रुद्रसिंह के सामने बड़ी विकट स्थिति उत्पन्न हो गई। आखिर वे किसे स्वयंवर का विजेता स्वीकार करके उसके साथ अपनी राजकुमारी संगीता का शुभ विवाह सम्पन्न करें?

महाराज रुद्रसिंह और महामन्त्री वीरसिंह ने उस योद्धा को रंगभूमि में चुनौती पूर्ण करते तो देखा था मगर इतनी दूर से देखने के कारण वे भी उसके चेहरे व रंगरूप को नहीं जानते थे। मगर #राजकुमारी #संगीता ने दोनों दिन उस योद्धा का चेहरा बहुत करीब से बिल्कुल स्पष्ट देखा था इसलिये उसे उस वीर योद्धा के बारे में किसी प्रकार का भी कोई सन्देह नहीं था। इसलिये उन तीनों को राजकुमारी संगीता के सामने से गुजारा गया। उन्हें देखते ही राजकुमारी संगीता की त्यौरियां चढ़ गई और उसने स्पष्ट रूप से महाराज को बता दिया कि इनमें से कोई भी व्यक्ति वह वीर योद्धा नहीं है जिसने स्वयंवर की चुनौती पूर्ण की है।

महाराज रुद्रसिंह को भी बड़ा क्रोध आया। भरे दरबार में कड़ककर उन्होंने उन तीनों से सच्चाई स्वीकार करने को कहा। दो युवक तो महाराज के क्रोध से डरकर कांपने लगे और उन्होंने मिथिला नरेश से क्षमा मांगते हुए #सच्चाई स्वीकार कर ली। कुछ क्षण तक तीसरा युवक डटा रहा, मगर पैर में लगी चोट के बारे में पूछने पर उसने अपना दाहिना पांव आगे कर दिया जिसकी सबसे छोटी ऊंगली में मामूली चोट लगी हुई थी। स्वयंवर के #रक्षक सैनिकों ने स्पष्ट बताया था कि उस वीर योद्धा के बायें पैर के अंगूठे में एक सैनिक की तलवार से घाव हुआ था और उसमें से कुछ रक्त रंगभूमि में भी गिरा था।

यह सच्चाई सामने आने पर तीसरा युवक थरथर कांपने लगा और अन्ततः उसने भी सच्चाई स्वीकार कर ली। तीनों युवकों को महाराज रुद्रसिंह को धोखा देने के प्रयास में #कारागार में बन्दी बना लिया गया और राजदरबार आज भी उस वीर योद्धा की पहचान के बिना ही समाप्त हो गया।

©चन्द्र-लक्ष्मी

🌷 मिथिला नरेश को राजकुमारी संगीता के कठिन स्वयंवर को जीतने वाले का कैसे पता चला? क्या राजकुमारी संगीता का शुभ विवाह राजकुमार विजय के साथ हो पाया?? आखिर दोनों बड़े राजकुमारों का #अर्धनग्न अवस्था में निष्कासन का #रहस्य क्या था???

🌷इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने के लिये पढ़ते रहिये हमारी कहानी की अगली किश्तें और अपने मित्रों को भी किस्सागोई से जुड़ने के लिये प्रेरित कीजिये।

🌷और हाँ, कहानी की यह किश्त आपको कैसी लगी? हमें अपने लाईक, कमेंट, और शेयर के माध्यम से जरूर बताइये। यदि आप हमसे कुछ कहना चाहते हों तो हमें ईमेल या Whatsapp कीजिये।
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 #किस्सागोई-5.36: स्वयंवर जीतने वाले अनाम योद्धा की खोज    #सुनो_कहानी अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द्र से वरदान में मिले...
31/08/2026

#किस्सागोई-5.36: स्वयंवर जीतने वाले अनाम योद्धा की खोज
#सुनो_कहानी

अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द्र से वरदान में मिले अमरफल को सेठ मथुरामल ने #मारवाड़ नरेश को दे दिया। मारवाड़ नरेश ने भी समस्त प्रजा के #कल्याण के लिए उस अमरफल को अपने शाही उद्यान में बो दिया। बार बार चोरी होने वाले उस अमरफल को राजकुमार विजय ने अपनी चतुराई से बचा लिया। अमरफल की सुरक्षा से प्रसन्न महाराज ने छोटे राजकुमार को राज्य का #युवराज बनाने का निर्णय ले लिया। दोनों बड़े राजकुमार अपमानित होकर राज्य छोड़कर चले तो राजकुमार #विजय भी उनके साथ चला गया। तीनों राजकुमार #मिथिला नरेश रुद्रसिंह के राज्य में पहुंचकर बूढ़ी भटियारिन की सराय में ठहर गये। मिथिला की राजकुमारी के स्वयंवर की कठिन चुनौती को पूर्ण करने की कोशिश में दो वीर योद्धा #वीरगति को प्राप्त हो गये। छोटे राजकुमार विजय ने अमरदेव की सहायता से रंगभूमि में बैठी राजकुमारी संगीता को तीन बार सफलतापूर्वक #बांसुरी स्पर्श करवाकर स्वयंवर की शर्त पूरी कर दी। अब आगे पढ़िये....


मिथिला की राजकुमारी संगीता का स्वयंवर तो पूर्ण हो गया था मगर उस चुनौती को पूरा करने वाले वीर योद्धा के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी। वह आखिर था कौन और कहां से आया था और स्वयंवर जीतने के बाद फिर से कहां जाकर छिप गया था? उसका सामने आना अभी बाकी था। उसकी पहचान के बिना तो स्वयंवर की शर्त पूरा होना भी बेकार ही था।

अगले दिन मिथिला #नरेश रुद्रसिंह का राजदरबार लगा तो लोगों को पूरी उम्मीद थी कि स्वयंवर की लगभग असम्भव सी #चुनौती को पूर्ण करने वाला योद्धा निश्चय ही आज राजदरबार में उपस्थित होकर अपनी #पहचान उजागर करेगा। दरबार में सारे मन्त्री, #दरबारी, गणमान्य व्यक्ति और यहाँ तक कि सामान्य जन भी भरे हुए थे। सारी प्रजा यह जानने को उत्सुक थी कि राजकुमारी संगीता से विवाह के लिए इतनी कठिन चुनौती को पूर्ण करने वाला योद्धा आखिर है कौन? वह इसी राज्य का निवासी है या किसी अन्य राज्य से आया हुआ प्रतियोगी? उसका रंगरूप कैसा है, कदकाठी कैसी है? इस बात को जानने के लिए दरबार में भीड़ इतनी थी कि रक्षकों को देर से आने वाले आगन्तुक लोगों को दरबार के बाहर ही रोकना पड़ रहा था।

दरबार शुरू होने पर महामन्त्री वीरसिंह ने सभी उपस्थित लोगों के सामने #घोषणा की कि राजकुमारी संगीता का स्वयंवर सफलतापूर्वक संपन्न हो गया है। उन्होंने सफल प्रतियोगी के #साहस और कौशल की भूरि भूरि प्रशंसा की और महाराजा रुद्रसिंह को स्वयंवर की सफलता की बधाई दी। अब तो लोगों को यकीन हो गया कि #महामन्त्री वीरसिंह को सफल प्रतियोगी के बारे में पूरी जानकारी है और बस कुछ ही पल में वे उसे राजदरबार में सबके सामने उपस्थित कर देंगे और फिर राज्य में विवाह के उत्सव आरम्भ हो जायेंगे।

मगर सारी घोषणाओं के बाद स्वयं महामन्त्री वीरसिंह ने दरबार में उपस्थित सभी प्रजाजनों से निवेदन किया कि अभी तक किसी भी योद्धा ने स्वयंवर में स्वयं की सफलता का दावा नहीं किया है इसलिए यदि उस योद्धा के बारे में किसी के पास कोई भी #जानकारी हो तो कृपया दरबार को बताने का प्रयास करें। यह सुनकर प्रजाजन एक बार फिर निराश हो गये।

फिर भी सभी को विश्वास था कि सुबह नहीं तो दोपहर या शाम तक वह योद्धा राजदरबार में जरूर आयेगा, वरना इतनी भयंकर चुनौती में भाग लेने का कोई अर्थ ही नहीं था। इसलिये सभी लोग भूख प्यास के बावजूद दरबार में डटे रहे। स्वयं महाराज और महामन्त्री के कहने के बाद भी लोग राजदरबार से बाहर जाने को तैयार नहीं थे।

शाम होने को आई मगर तब भी कोई योद्धा राजदरबार में अपनी सफलता के बारे में बताने के लिए नहीं आया। दरबार में जुटे लोग भी क्या बताते, दरअसल #प्रतियोगिता के दौरान किसी ने भी उसका चेहरा नहीं देखा था। देखते भी कैसे, एक तो योद्धा ने अपने शरीर और चेहरे को अपनी पौशाक व कवचादि से पूरी तरह ढक रखा था, दूसरे, दूर से तो चेहरा वैसे भी देखने में नहीं आता। अब भला उसकी पहचान हो तो कैसे हो? और वह योद्धा इतना #शर्मीला था कि वह स्वयं राजदरबार में आने से झिझक रहा था।

अगले दिन के दरबार में कुछ लोगों ने इस मौके को भुनाने का प्रयास किया। वे अपनी योद्धा की पौशाक में राजदरबार में आये और स्वयं को स्वयंवर के विजेता के रूप में पेश कर दिया। मगर #असमंजस की स्थिति तो तब उत्पन्न हो गई जब अचानक तीन योद्धा स्वयं को स्वयंवर का विजेता बताने लगे। पिछले दिन दरबार में न आने का कारण उन्होंने अत्यधिक भीड़भाड़ को बताया जो कि पिछले दिन की वास्तविकता भी थी। अब महाराज रुद्रसिंह के सामने बड़ी विकट स्थिति उत्पन्न हो गई। आखिर वे किसे स्वयंवर का विजेता स्वीकार करके उसके साथ अपनी राजकुमारी संगीता का शुभ विवाह सम्पन्न करें?

महाराज रुद्रसिंह और महामन्त्री वीरसिंह ने उस योद्धा को रंगभूमि में चुनौती पूर्ण करते तो देखा था मगर इतनी दूर से देखने के कारण वे भी उसके चेहरे व रंगरूप को नहीं जानते थे। मगर #राजकुमारी #संगीता ने दोनों दिन उस योद्धा का चेहरा बहुत करीब से बिल्कुल स्पष्ट देखा था इसलिये उसे उस वीर योद्धा के बारे में किसी प्रकार का भी कोई सन्देह नहीं था। इसलिये उन तीनों को राजकुमारी संगीता के सामने से गुजारा गया। उन्हें देखते ही राजकुमारी संगीता की त्यौरियां चढ़ गई और उसने स्पष्ट रूप से महाराज को बता दिया कि इनमें से कोई भी व्यक्ति वह वीर योद्धा नहीं है जिसने स्वयंवर की चुनौती पूर्ण की है।

महाराज रुद्रसिंह को भी बड़ा क्रोध आया। भरे दरबार में कड़ककर उन्होंने उन तीनों से सच्चाई स्वीकार करने को कहा। दो युवक तो महाराज के क्रोध से डरकर कांपने लगे और उन्होंने मिथिला नरेश से क्षमा मांगते हुए #सच्चाई स्वीकार कर ली। कुछ क्षण तक तीसरा युवक डटा रहा, मगर पैर में लगी चोट के बारे में पूछने पर उसने अपना दाहिना पांव आगे कर दिया जिसकी सबसे छोटी ऊंगली में मामूली चोट लगी हुई थी। स्वयंवर के #रक्षक सैनिकों ने स्पष्ट बताया था कि उस वीर योद्धा के बायें पैर के अंगूठे में एक सैनिक की तलवार से घाव हुआ था और उसमें से कुछ रक्त रंगभूमि में भी गिरा था।

यह सच्चाई सामने आने पर तीसरा युवक थरथर कांपने लगा और अन्ततः उसने भी सच्चाई स्वीकार कर ली। तीनों युवकों को महाराज रुद्रसिंह को धोखा देने के प्रयास में #कारागार में बन्दी बना लिया गया और राजदरबार आज भी उस वीर योद्धा की पहचान के बिना ही समाप्त हो गया।

©चन्द्र-लक्ष्मी

🌷 मिथिला नरेश को राजकुमारी संगीता के कठिन स्वयंवर को जीतने वाले का कैसे पता चला? क्या राजकुमारी संगीता का शुभ विवाह राजकुमार विजय के साथ हो पाया?? आखिर दोनों बड़े राजकुमारों का #अर्धनग्न अवस्था में निष्कासन का #रहस्य क्या था???

🌷इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने के लिये पढ़ते रहिये हमारी कहानी की अगली किश्तें और अपने मित्रों को भी किस्सागोई से जुड़ने के लिये प्रेरित कीजिये।

🌷और हाँ, कहानी की यह किश्त आपको कैसी लगी? हमें अपने लाईक, कमेंट, और शेयर के माध्यम से जरूर बताइये। यदि आप हमसे कुछ कहना चाहते हों तो हमें ईमेल या Whatsapp कीजिये।
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 #किस्सागोई-5.35: स्वयंवर पूर्ण होने की  #घोषणा      अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द्र से वरदान में मिले अमरफल को सेठ मथुर...
28/08/2026

#किस्सागोई-5.35: स्वयंवर पूर्ण होने की #घोषणा


अब तक आपने पढ़ा कि देवराज इन्द्र से वरदान में मिले अमरफल को सेठ मथुरामल ने मारवाड़ नरेश को दे दिया। #मारवाड़ नरेश ने भी समस्त प्रजा के कल्याण के लिए उस अमरफल को अपने शाही उद्यान में बो दिया। बार बार चोरी होने वाले उस अमरफल को राजकुमार विजय ने अपनी चतुराई से बचा लिया। अमरफल की सुरक्षा से प्रसन्न महाराज ने छोटे राजकुमार को राज्य का #युवराज बनाने का निर्णय ले लिया। दोनों बड़े राजकुमार अपमानित होकर राज्य छोड़कर चले तो राजकुमार विजय भी उनके साथ चला गया। तीनों राजकुमार मिथिला नरेश रुद्रसिंह के राज्य में पहुंचकर बूढ़ी भटियारिन की सराय में ठहर गये। मिथिला की राजकुमारी के स्वयंवर की कठिन चुनौती को पूर्ण करने की कोशिश में दो वीर योद्धा #वीरगति को प्राप्त हो गये। छोटे राजकुमार विजय ने अमरदेव की सहायता से रंगभूमि में बैठी #राजकुमारी #संगीता को तीन बार सफलतापूर्वक बांसुरी स्पर्श करवाकर स्वयंवर की शर्त पूरी कर दी। अब आगे पढ़िये....

जिस समय दोनों बड़े राजकुमार सराय में पहुंचे, उसी समय राजकुमार #विजय की नींद खुल गई थी, मगर वह जानबूझकर अपने बिस्तर में ही पड़ा रहा। इस बीच उसने अपने भाइयों के साथ भटियारिन की सारी बातचीत भी सुन ली थी। जब उसके भाई उसके बिस्तर के पास पहुंचे तो वह जानबूझकर हल्के हल्के कराहने लगा। उसकी कराहट सुनकर #संजय ने अजय से कहा कि आज विजय को चोट लगी है तो आज घोड़ों की सेवा #अजय को ही करनी पड़ेगी। अजय ने कुछ #विरोध जताने का प्रयास किया तो संजय ने आँखें तरेरकर उसे चुपचाप अपने आदेश का पालन करने को कहा।

भुनभुनाता हुआ अजय दोनों घोड़ों को घुड़साल में बांधकर, उन्हें पानी पिलाने लगा और उनके आगे घास डालने लगा। इस बीच संजय ने अपने छोटे भाई विजय से पूछा, "विजय, कहाँ चोट लगी और तुम्हें चोट कैसे लग गई?"

बूढ़ी भटियारिन की पूरी कहानी विजय ने भी दोहरा दी और कहने लगा, "भैया, मैं अच्छा तुम दोनों के साथ आया। तुमने तो मुझे सराय में कैद करके ही रख दिया। तुम दोनों ने भटियारिन #चाची को इतना डरा रखा है कि वह तो मुझे नित्यकर्म के लिए भी सराय से बाहर नहीं जाने देती। नित्यकर्म के समय भी उनकी निगाह मेरे ऊपर रहती है जिससे मुझे बड़ी शर्म आती है। भला ऐसा भी क्या, मैं कोई छोटा बच्चा हूँ जो सराय से बाहर गया तो खो जाऊँगा?"

संजय ने प्रेम से छोटे भाई का सिर सहलाते हुए कहा, "देख भाई, तुम पिताजी के बहुत लाड़ले हो और हमें भी बहुत प्रिय हो। अगर तुम्हें कुछ हो गया तो हम अपने आपको माफ नहीं कर पायेंगे। कहीं तुम्हें कुछ हो न जाये, इसीलिये तो हम तुम्हें सराय से बाहर नहीं जाने देते थे मगर देखो, तुमने तो अपनी बेचैनी में सराय के अन्दर ही चोट खा ली। चलो, आज से तुम्हारे सराय से बाहर जाने पर कोई पाबन्दी नहीं रहेगी। तुम जहाँ चाहे, वहाँ घूमो, मगर देखो, सराय से बहुत दूर मत जाना। कहीं तुम रास्ता भटक गए तो हम तुम्हें कहाँ ढूढ़ेगे?"

छोटे राजकुमार ने बड़े भाई का हाथ पकड़कर कहा, "नहीं, भैया। अब मैं समझ गया और अगर आप दोनों नहीं चाहते कि मैं सराय से बाहर जाऊँ तो मैं बिल्कुल भी बाहर नहीं जाऊँगा। अब चाहे, #राजा के #सिपाही भी मुझे बुलाने क्यों न आयें, मैं कहीं नहीं जाऊँगा।"

उसने आगे कहा, "मगर भैया, मुझे #रंगभूमि की खबरें तो बताओ, आज रंगभूमि में क्या क्या हुआ? क्या कल उछलकूद करने वाला योद्धा आज रंगभूमि में आया? या कोई और योद्धा इस स्वयंवर को जीत पाया?"

संजय ने स्वयंवर की सारी बातें विजय को बताई, जिस प्रकार अनाम योद्धा ने सुबह दूसरी बार और दोपहर बाद तीसरी बार रंगभूमि में प्रवेश करके राजकुमारी संगीता को #बाँसुरी स्पर्श करवाकर सुरक्षित बाहर निकलने में #सफलता प्राप्त कर ली। उसने यह भी बताया कि तीसरी बार इस #अनाम योद्धा के बायें पैर में एक सैनिक की तलवार से चोट आई है। साथ ही यह भी कि अभी तक यह योद्धा अनाम ही है, क्योंकि उसने आगे आकर अपनी सफलता और अपनी पहचान के बारे में कुछ भी नहीं कहा है।

इसी समय सराय के बाहर एक #मुनादी सुनाई दी। जिसमें मिथिला नरेश की ओर से स्वयंवर के पूर्ण होने की सूचना दी गई थी। साथ ही स्वयंवर की शर्त पूर्ण करने वाले से कहा गया था कि वह कल सुबह राजदरबार में आकर अपना #परिचय दे, जिससे उसका विवाह राजकुमारी संगीता से करवाकर उसे आधे राज्य का #स्वामी घोषित किया जा सके।

यह सुनकर विजय ने संजय से पूछा, "यदि उस अनाम योद्धा की अनुपस्थिति में कोई अन्य व्यक्ति इस स्वयंवर को जीतने वाला बनकर मिथिला नरेश के सामने चला जाये तो क्या होगा? ऐसा इसलिए क्योंकि अभी तक उस योद्धा का चेहरा किसी ने भी नहीं देखा है। क्या महाराज उस व्यक्ति को अपना #दामाद स्वीकार कर लेंगे? और यदि ऐसे व्यक्ति एक से अधिक हुए तब क्या होगा? ऐसी स्थिति में स्वयंवर के विजेता का निर्णय कैसे होगा?"

संजय ने कहा, "ऐसा भी नहीं है कि किसी ने उस योद्धा को देखा ही नहीं है। राजकुमारी संगीता ने उस योद्धा को तीन बार देखा है, ऐसे में उसके भूलने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है। राजकुमारी के रक्षकों के अनुसार, तीसरी बार तो योद्धा ने राजकुमारी संगीता को अपना चेहरा और आँखें अच्छी तरह दिखाई थी, जिसे कोई भूल ही नहीं सकता।"

"हुं, यह बात भी सही है। राजकुमारी को उसका वीर पति मिलना ही चाहिए। चलो, वैसे भी मुझे क्या? कोई भी हो, हम लोगों को क्या फर्क पड़ने वाला है? हम तो ठहरे #परदेशी, कुछ समय यहाँ रहेंगे फिर कहीं और चल देंगे।" छोटे राजकुमार ने अनिच्छा सी जाहिर करते हुए कहा।

©चन्द्र-लक्ष्मी

🌷 मिथिला नरेश को राजकुमारी संगीता के कठिन स्वयंवर को जीतने वाले का कैसे पता चला? क्या राजकुमारी संगीता का शुभ विवाह राजकुमार विजय के साथ हो पाया?? आखिर दोनों बड़े राजकुमारों का #अर्धनग्न अवस्था में निष्कासन का #रहस्य क्या था???

🌷इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने के लिये पढ़ते रहिये हमारी कहानी की अगली किश्तें और अपने मित्रों को भी किस्सागोई से जुड़ने के लिये प्रेरित कीजिये।

🌷और हाँ, कहानी की यह #किश्त आपको कैसी लगी? हमें अपने लाईक, कमेंट, और शेयर के माध्यम से जरूर बताइये। यदि आप हमसे कुछ कहना चाहते हों तो हमें ईमेल या कीजिये।
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