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(सही ग़लत जो लगे प्रतिक्रिया अवश्य दें, ये विमर्श बहुत आवश्यक है)चुनावी माहौल और बिखरते रिश्ते: चुनाव आते-जाते रहेंगे, ल...
23/09/2026

(सही ग़लत जो लगे प्रतिक्रिया अवश्य दें, ये विमर्श बहुत आवश्यक है)

चुनावी माहौल और बिखरते रिश्ते:

चुनाव आते-जाते रहेंगे, लेकिन रिश्ते और परिवार हमेशा हमारे साथ रहते हैं। आज देश और राज्यों में चुनावी सरगर्मियां तेज होने लगी हैं। राजनीतिक पार्टियां अपनी रणनीतियां बना रही हैं, सोशल मीडिया पर बहसों का दौर शुरू हो चुका है, और चाय की टपरियों से लेकर घर के ड्राइंग रूम तक राजनीतिक चर्चाएं गरमाने लगी हैं। ऐसे में एक आम नागरिक होने के नाते यह बेहद जरूरी है कि हम एक गंभीर आत्ममंथन करें। क्या हम किसी राजनीतिक दल का मोहरा या हथियार बनकर अपने ही भाई, दोस्त या पड़ोसी से उलझ तो नहीं रहे हैं? राजनीतिक दलों का एजेंडा और आपकी भावनाएं लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी पसंद की विचारधारा चुनने और अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब हमारी राजनीतिक पसंद हमारे निजी रिश्तों पर हावी होने लगती है, तो समाज बिखरने लगता है। राजनीतिक दल और उनके नेता अपनी रैलियों, भाषणों और विज्ञापनों के जरिए अक्सर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जहां 'हम बनाम वो' (Us vs Them) की स्थिति पैदा हो जाती है। अक्सर आम नागरिक इन भावनाओं के आवेग में बह जाते हैं। सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को नीचा दिखाना, पारिवारिक व्हाट्सएप ग्रुप्स में तीखी बहस करना और वर्षों पुराने दोस्तों से सिर्फ इसलिए मुंह मोड़ लेना क्योंकि उनकी राजनीतिक विचारधारा अलग है—यह किसी भी स्वस्थ समाज के लिए घातक है।
रिश्तों की 'हत्या' करने से बचें-
नेताओं और राजनीतिक दलों के हित बदलते रहते हैं। जो नेता आज एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं, वे चुनाव के बाद गठबंधन करके एक ही मंच पर मुस्कुराते हुए नजर आ सकते हैं। लेकिन राजनीतिक मतभेद के कारण आपने अपने भाई या मित्र के साथ बातचीत का जो सिलसिला बंद किया है, उसकी दरार को भरना इतना आसान नहीं होता। पार्टियों के लिए आप केवल एक 'वोट' या उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले 'मोहरे' मात्र हो सकते हैं। लेकिन आपके परिवार, आपके दोस्तों और आपके समाज के लिए आप एक सहारा हैं। जब आपके जीवन में कोई संकट आएगा, तो कोई राजनीतिक दल या उसका बड़ा नेता आपके साथ खड़ा नहीं होगा, बल्कि वही अपने और पड़ोसी आपके काम आएंगे जिनसे आप राजनीति के चक्कर में संबंध खराब कर चुके हैं।
रिश्तों को प्राथमिकता दें:
याद रखें कि चुनाव का यह दौर कुछ हफ्तों या महीनों का है, लेकिन आपके रिश्ते जीवनभर के हैं।निष्कर्षआइए, इस चुनावी माहौल में खुद को किसी का हथियार न बनने दें। अपनी चेतना और विवेक को जागृत रखें। वोट देना हमारा अधिकार और कर्तव्य है, इसे पूरी समझदारी से निभाएं। लेकिन इस प्रक्रिया में अपने भीतर की इंसानियत, सौहार्द और रिश्तों की गर्माहट को मत खोने दीजिए। नेताओं के भाषणों के लिए अपनों से मत उलझिए और समाज में 'रिश्तों की हत्या' होने से बचाइए।
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