Dr. Rajeev Raj

Dr. Rajeev Raj तपती मन की धरती पर बादल बन छाना है
कसम ?
(2)

“चाहे कोई दार्शनिक बने, सन्त बने या साधु बने, अगर वह लोगों को अंधेरे का डर दिखाता है तो जरूर वो अपनी कंपनी का टॉर्च बेचन...
22/08/2026

“चाहे कोई दार्शनिक बने, सन्त बने या साधु बने, अगर वह लोगों को अंधेरे का डर दिखाता है तो जरूर वो अपनी कंपनी का टॉर्च बेचना चाहता है”
ऐसे तीखे व्यंगों के माध्यम से समाज को आईना दिखाने वाले हरिशंकर परसाई (22 अगस्त, 1924 - 10 अगस्त, 1995) हिंदी साहित्य के महान व्यंग्यकार थे, जिन्होंने अपनी तीक्ष्ण लेखनी से समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार और पाखंड पर करारा प्रहार किया। उनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्य -
१. हरिशंकर परसाई ने अपने जीवन के शुरुआती दौर में कुछ समय के लिए अध्यापन कार्य किया। एक रोचक तथ्य यह है कि उस समय उनके छात्रों में मशहूर गायक और अभिनेता किशोर कुमार भी शामिल थे।
२. ⁠सन् 1982 में परसाई जी को उनकी कृति “विकलांग श्रद्धा का दौर” के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। यह हिंदी व्यंग्य साहित्य के लिए पहला बड़ा सम्मान था।
३. ⁠परसाई जी न केवल समाज पर व्यंग्य करते थे, बल्कि खुद पर भी हँसना जानते थे। उनकी एक रचना में उन्होंने लिखा, “मैं मरूँ तो मेरी नाक पर सौ का नोट रखकर देखना, शायद उठ जाऊँ।” यह पंक्ति उनकी हास्यप्रियता और आत्म-विश्लेषण की क्षमता को दर्शाती है।
आज उनके जन्म दिन पर उन्हें याद करते हुए श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।






22/08/2026

सूरज की पहली पाती
#कविसम्मेलन #साहित्य

20/08/2026

हिरनी जैसे चंचल
#साहित्य

वैश्विक बाज़ार को आकर्षित करने वाली आर्थिक उदारीकरण नीति के साथ शिक्षा के क्षेत्र में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्व...
20/08/2026

वैश्विक बाज़ार को आकर्षित करने वाली आर्थिक उदारीकरण नीति के साथ शिक्षा के क्षेत्र में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) और जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना करने वाले और 1986 में नई शिक्षा नीति के लिए कभी न भुलाए जाने वाले भारत वर्ष के युवा प्रधानमन्त्री राजीव गांधी को सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्रांति की नींव रखने के लिए भी याद किया जाएगा।
भारत में कंप्यूटर क्रांति का जनक, भारत रत्न राजीव गांधी की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि 💐💐






19/08/2026

राधिका

“दिन जो पखेरू होते पिंजड़े में मैं रख लेता” बचपन में जब इस गीत को सुना करता था तब इन शब्दों के भावार्थ तक पहुँचना सम्भव ...
16/08/2026

“दिन जो पखेरू होते पिंजड़े में मैं रख लेता” बचपन में जब इस गीत को सुना करता था तब इन शब्दों के भावार्थ तक पहुँचना सम्भव ही नहीं था बस सुनते थे और गाते थे। अब जब जीवन के सफ़र के तमाम पल ऐसे हैं जिनकी सुखानुभूति तो शेष है पर वे कब पलक झपकते गुज़र गए, पता ही नहीं चला। तब लगता है कि काश !समय को किसी पिंजड़े में क़ैद किया जा सकता।
वो दिन अभी भी मेरी स्मृतियों में है जब मेरी एफबी पोस्ट के माध्यम से मेरी यात्रा की जानकारी के आधार पर साक्षी बिटिया लखनऊ के एक स्टेशन पर घर से खाना बनाकर देने आयी थी। बेटी यानी संवेदना, बेटी यानी रिश्तों का सच्चा निर्वाह, बेटी यानी अपनों की परवाह। आज साक्षी देश की मुख्य धारा में स्थापित हो रही लोकप्रिय कवयित्री है लेकिन मुझे वो मासूम सी प्यारी सी साक्षी कभी नहीं भूलेगी जो अकेली स्टेशन चली आयी थी, अपने दादा के लिए खाना देने। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कवि सम्मेलन की दुनिया बहुत कैलकुलेटिव हो चुकी है लेकिन ऐसे कुछ रिश्ते इसका हासिल हैं जो इसको अब भी ख़ूबसूरत बनाये हुए हैं।
ये कितना प्यारा संजोग है कि ये तस्वीर आज अचानक मुझे कुछ खोजते हुए मिली और आज यानी 17 अगस्त को ही उसका जन्म दिन है।
ईश्वर तुम्हें वो सब कुछ दे बेटा जी जिसके आप हक़दार हैं। ऐसे ही हमेशा निर्मल मन रखना।
जन्म दिन शुभ हो। यशस्वी हों।
sakshi

"तू अतरी खूब खूळै छै,पाणी में चाँद घुळै छै,थारी चाल असी मन भावे, ज्यूँ थाली में मूँग रळै छै।"अब आपके सानिध्य का सौभाग्य ...
16/08/2026

"तू अतरी खूब खूळै छै,
पाणी में चाँद घुळै छै,
थारी चाल असी मन भावे,
ज्यूँ थाली में मूँग रळै छै।"
अब आपके सानिध्य का सौभाग्य कभी नहीं मिलेगा 🥺
गीत ऋषि दुर्गादान सिंह जी अब सदैव के लिए स्मृतियों के हो गए।
ईश्वर उन्हें अपनी गोद में स्थान दे।
🕉️ शांति

16/08/2026

रिश्तों का एक प्यारा गीत

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