22/08/2026
“चाहे कोई दार्शनिक बने, सन्त बने या साधु बने, अगर वह लोगों को अंधेरे का डर दिखाता है तो जरूर वो अपनी कंपनी का टॉर्च बेचना चाहता है”
ऐसे तीखे व्यंगों के माध्यम से समाज को आईना दिखाने वाले हरिशंकर परसाई (22 अगस्त, 1924 - 10 अगस्त, 1995) हिंदी साहित्य के महान व्यंग्यकार थे, जिन्होंने अपनी तीक्ष्ण लेखनी से समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार और पाखंड पर करारा प्रहार किया। उनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्य -
१. हरिशंकर परसाई ने अपने जीवन के शुरुआती दौर में कुछ समय के लिए अध्यापन कार्य किया। एक रोचक तथ्य यह है कि उस समय उनके छात्रों में मशहूर गायक और अभिनेता किशोर कुमार भी शामिल थे।
२. सन् 1982 में परसाई जी को उनकी कृति “विकलांग श्रद्धा का दौर” के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। यह हिंदी व्यंग्य साहित्य के लिए पहला बड़ा सम्मान था।
३. परसाई जी न केवल समाज पर व्यंग्य करते थे, बल्कि खुद पर भी हँसना जानते थे। उनकी एक रचना में उन्होंने लिखा, “मैं मरूँ तो मेरी नाक पर सौ का नोट रखकर देखना, शायद उठ जाऊँ।” यह पंक्ति उनकी हास्यप्रियता और आत्म-विश्लेषण की क्षमता को दर्शाती है।
आज उनके जन्म दिन पर उन्हें याद करते हुए श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।