04/12/2024
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वो नज़र याद है नज़ारा भी
तेरी आँखें तेरा इशारा भी
ज़ेहन में नफरतें भी कायम हैं
लब पे इन्सानियत का नारा भी
बीन कब तक बजाएगा पगले
खोल दे सांप का पिटारा भी
इश्क़ के जिस मक़ाम पर मैं हूँ
तू गवारा है ना गवारा भी
काश गंगा में मिल गई होती
आदमी की विचार धारा भी
साल का आख़िरी महीना है
आख़िरी साल है हमारा भी
इक न इक दिन तुम्हें भी जाना है
ज़िंदगी नाम है तुम्हारा भी
आदित्य सिंह आदि