10/05/2025
चेतावनी
वर्षों तक तुमने धैर्य मेरा यूंही आजमाया है।
इसलिए आज तुम पर बम मैंने बरसाया है।।
हम गौतम बुद्ध की धरती हैं
मर्यादा के पुरुषोत्तम हैं
सहने के जितने आदि हैं
लड़ने में उतने सक्षम हैं
तुमको अपना समझा मैंने
हर बार तुम्हें है माफ किया
पर तेरे पापों का घड़ा इस बार भर आया है इसलिए आज तुम पर बम मैंने बरसाया है ।।
हम उसे अशोक के वंशज हैं
विजयी होकर भी रो दे जो
हम उसे किसान के कंधे हैं
बंजार में खजाने बो दे जो
जितनी छाती में ममता है
उतनी ही आग है आंखों में
अरे मूढ़ तूने हमको खूं के आंसू रुलाया है इसलिए आज तुम पर बम मैंने बरसाया है ।।
हम सह-अस्तित्व के पोषक हैं
सनातन बसता है हममें
जो आता है अपनाते हैं
ऐसी एक सहजता है हममें
सदियों से सिखलाया हमने
दुनिया को शांति की परिभाषा
तुमने तो अब तक खुद को भी बस बरगलाया है इसलिए आज तुम पर बम मैंने बरसाया है।।
मत ललकारो मत छेड़ो तुम
अस्तित्व बचा नहीं पाओगे
गर जाग गया अंदर का शिवा
तुम जीवन भर पछताओगे
हम उन वीरों की भूमि हैं,
पत्नी जब तिलक लगाती है
देखो पलटाकर पन्ने तुम सर हमने तब कटवाया है
इसलिए आज तुम पर बम मैंने बरसाया है
© डॉ अभिषेक शिवा कुमार