Dr. Abhishek Shiva Kumar

Dr. Abhishek Shiva Kumar कविता, ग़ज़ल और साहित्य की सेवा में समर्पित

चेतावनीवर्षों तक तुमने धैर्य मेरा यूंही आजमाया है।इसलिए आज तुम पर बम मैंने बरसाया है।।हम गौतम बुद्ध की धरती हैं मर्यादा ...
10/05/2025

चेतावनी

वर्षों तक तुमने धैर्य मेरा यूंही आजमाया है।
इसलिए आज तुम पर बम मैंने बरसाया है।।

हम गौतम बुद्ध की धरती हैं
मर्यादा के पुरुषोत्तम हैं
सहने के जितने आदि हैं
लड़ने में उतने सक्षम हैं
तुमको अपना समझा मैंने
हर बार तुम्हें है माफ किया
पर तेरे पापों का घड़ा इस बार भर आया है इसलिए आज तुम पर बम मैंने बरसाया है ।।

हम उसे अशोक के वंशज हैं
विजयी होकर भी रो दे जो
हम उसे किसान के कंधे हैं
बंजार में खजाने बो दे जो
जितनी छाती में ममता है
उतनी ही आग है आंखों में
अरे मूढ़ तूने हमको खूं के आंसू रुलाया है इसलिए आज तुम पर बम मैंने बरसाया है ।।

हम सह-अस्तित्व के पोषक हैं
सनातन बसता है हममें
जो आता है अपनाते हैं
ऐसी एक सहजता है हममें
सदियों से सिखलाया हमने
दुनिया को शांति की परिभाषा
तुमने तो अब तक खुद को भी बस बरगलाया है इसलिए आज तुम पर बम मैंने बरसाया है।।

मत ललकारो मत छेड़ो तुम
अस्तित्व बचा नहीं पाओगे
गर जाग गया अंदर का शिवा
तुम जीवन भर पछताओगे
हम उन वीरों की भूमि हैं,
पत्नी जब तिलक लगाती है
देखो पलटाकर पन्ने तुम सर हमने तब कटवाया है
इसलिए आज तुम पर बम मैंने बरसाया है
© डॉ अभिषेक शिवा कुमार

भूख किसी की सगी नहीं होतीजब अभाव सिसकते हुएदौड़ता है ममता के आंगन मेंकुछ आंखें मजबूर हो जाती हैखून के आंसू रोने कोभिनभिन...
08/05/2025

भूख किसी की सगी नहीं होती

जब अभाव सिसकते हुए

दौड़ता है ममता के आंगन में

कुछ आंखें मजबूर हो जाती है

खून के आंसू रोने को

भिनभिनाते हुए मक्खियों से

लोरी सुनते हुए सोने वाले बच्चे

चकित हैं अपने भाग्य पर

मां का स्तन सूख चुका है

यथार्थ के लावा की गरमी से

कोई झूला नहीं वहां

बस सख्त मिट्टी की धमक है

पेट में जलती है भट्टी

दिन रात जो शर्मिंदा करती है

लोहार की धौंकनी को

फेंके हुए बासी भात के दाने

लुभा जाते हैं जिसे

क्या है जीवन उनके लिए

भूख और सांस के बीच जो पुल है

तोड़ना चाहता है उसे समय

मैले कपड़े और देह की गंध

उसके वजूद में है

रोटी क्या है

कहीं कुत्ते को भी

अनायास मिल जाती है

कहीं कोई इंसान

उसकी गंध तक भूल बैठा है

कौन सी मर्यादा

क्या है नैतिकता

भूख से पूछो

ये भेद देती है अंतर्मन

पेट भरना है साहब

अपना भी और अपने बच्चों का भी

तुम बैठो अपने वातानुकुलित कमरों में

विदेशी दरी पर लगे आलीशान सोफे पर

करो देश दुनिया पर बहस

उसे तो चाहिए बस रोटियां

क्योंकि भूख

किसी की सगी नहीं होती

सांसों की गर्मी पर

देह का तवा चढ़ाकर

सेंकनी हैं संघर्ष की रोटियां

ग़रीबी के अभिशाप में

दो घूंट बेबसी की शराब मिलाकर

दर्द का कॉकटेल बनाना है

गालियों, दुत्कार और उपेक्षा

को मिलाकर एक अतरंगी स्वीट डिश

पर क्या ये खिला सकेंगे

उन बच्चों को जो

छोटी सी उम्र में बोरा लेकर

कचड़े के ढेर में अपने सपने चुन रहे

हाय भूख तुम मरते भी तो नहीं

रक्तबीज से भी भयानक हो तुम

कितना भी दूं तुम्हें

कभी नहीं मरते

मरते है इंसान

विषमता की इस बेदी पर

कई झोपडी जली

जाने कितनी मर्यादाएं बिकी

कितने हौसले टूटे

सबको कुछ दूर भुलावा देकर

छला है तूने

अरे करमजली भूख

तू सच मे किसी की सगी नहीं

© डॉ अभिषेक शिवा कुमार

आज सुबह जब उठाआज सुबह जब उठा, आंखों में एक टूटे हुएख़्वाब की चुभन थी ,दिल में कहीं कोईपुराने घाव की जलन थी,तारशे हुए दर्...
06/05/2025

आज सुबह जब उठा

आज सुबह जब उठा,
आंखों में एक टूटे हुए
ख़्वाब की चुभन थी ,
दिल में कहीं कोई
पुराने घाव की जलन थी,
तारशे हुए दर्द की
मजबूत कलाई
बांधे हुए थी
मेरी खामोशी को,
नब्ज़ रात की गलियों में
तन्हा चल चल कर थक सा गया था,
कुछ आवारा से जज्बात
ख्वाहिशों के साथ मिलकर
खेल रहे थे आंख मिचौली का खेल,
घूरता हुआ छत दिखा रहा था
आईना मेरी बदहवासी को
टूटे हुए ख़्वाब का टुकड़ा
अब भी चुभ रहा था
मानो कोई कांच हो,
जो पैवस्त हो गया हो
मेरे अरमानों के सीने में।
जुबां सहमी, पलक सिसकते
अंगड़ाइयां डरी हुई थी
अचानक तकिए ने चीखकर कहा
मुझे तुम्हारे आंखों का मोती
अब नहीं चाहिए,
नहीं कोई कीमत इसकी
भावना के किसी बाज़ार में
तुम यूं ना जी सकोगे इस संसार में
मैं घबराकर उठ बैठा
कुछ सांसों से और ऋण लेकर
समेटा खुद को और फिर
अपने जज्बातों की केंचुली उतार फेंकी
एक बार फिर नंगा हुआ
अपने मन के आइने में
इसके पहले कि
ये पहचान धुंधली हो जाए,
मुझे खुद को ढूंढना होगा
चल पड़ा फिर एक और दिन के
बोझिल सफ़र पर
उन आंखों के साथ जहां
अब भी कुछ चुभ रहा था
शायद फिर कोई ख्वाब
आंखों में टूट गया था
© डॉ अभिषेक शिवा कुमार

28/03/2025

यह कविता डॉक्टर धर्मवीर भारती के काव्य नाटक अंधा युग से ली गई है जिसमें अश्वत्थामा का विलाप है

ज़रा आराम तो दे अपनी पलकों को झुका के मुझे एक जाम तो देबरसों की थकन है, ज़रा आराम तो देतेरी जुल्फों के तले दूर हो जब मेर...
28/03/2025

ज़रा आराम तो दे

अपनी पलकों को झुका के मुझे एक जाम तो दे
बरसों की थकन है, ज़रा आराम तो दे

तेरी जुल्फों के तले दूर हो जब मेरा अंधेरा
तेरी सांसों की महक ढूंढ के लाए जो सवेरा
तेरे जिस्म की गरमी जो हर राह भुला दे
तेरे होठों की छुअन नब्ज़ में अमृत ही घुला दे
अपनी धड़कन में बसा कर मुझे एक नाम तो दे
बरसों की थकन है, ज़रा आराम तो दे

कुछ ओस की बूंदे पीऊं तेरे होठों पे रखकर
देखूं कभी तेरी रूह का स्वाद मैं चखकर
तुझमें समाकर जिस्म के पार हो जाऊं
एक तुझमें ही मैं सब संसार पा जाऊं
भर दे उजाला मुझमें अपनी एक शाम तो दे
बरसों की थकन है, ज़रा आराम तो दे

इतना तोड़ा है ज़माने ने, मैं बेनूर हो गया हूँ
इतनी ठोकरें खाई,बिखर कर चूर हो गया हूँ
तार तेरे आंचल का ही घाव मेरे सिल सकता है
एक तेरी निगाह से ये वीराना खिल सकता है
मेरी बेताबियों को अब सनम कुछ काम तो दे
बरसों की थकन है, ज़रा आराम तो दे
© डॉ अभिषेक शिवा कुमार

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