24/08/2024
ग़ज़ल -
हराम का ये मज़ाक कर के, किसी ने फिरकी ली है हमारी, क़सम ख़ुदा की
हैं चार धर्मों के चार वानर, सफ़ेद दाढ़ी में हैं मदारी, क़सम ख़ुदा की
गर उसकी मर्ज़ी बिन इस जहाँ में, न एक पत्ता भी हिलता है तो, है इसका मतलब
बलात्कारों के बारे में थी, ख़ुदा को पहले से जानकारी, क़सम ख़ुदा की
बुजुर्ग सारे गए जहाँ तीर्थयात्रा पे, ख़ुदा वहाँ गर सही में होता
न बस वो खाई में गिरती, होते अभी सलामत सभी सवारी, क़सम ख़ुदा की
नहीं हम इसमें हैं मानते पर, क़सम न माँ की भी खाते झूठी, कि कुछ हुआ तो
ख़ुदा अमर है सुना है जब से, हुई है पतली गली हमारी, क़सम ख़ुदा की
चुका दिए कर्ज़ थे जिन्होंने, बना दिए वो गए फ़रिश्ते, न नीचे उतरे
हम इस जहाँ में उतर के यारों, चुका रहे हैं उसे उधारी, क़सम ख़ुदा की
~ विभू राज