Vibhu Raj

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24/08/2024

ग़ज़ल -

हराम का ये मज़ाक कर के, किसी ने फिरकी ली है हमारी, क़सम ख़ुदा की
हैं चार धर्मों के चार वानर, सफ़ेद दाढ़ी में हैं मदारी, क़सम ख़ुदा की

गर उसकी मर्ज़ी बिन इस जहाँ में, न एक पत्ता भी हिलता है तो, है इसका मतलब
बलात्कारों के बारे में थी, ख़ुदा को पहले से जानकारी, क़सम ख़ुदा की

बुजुर्ग सारे गए जहाँ तीर्थयात्रा पे, ख़ुदा वहाँ गर सही में होता
न बस वो खाई में गिरती, होते अभी सलामत सभी सवारी, क़सम ख़ुदा की

नहीं हम इसमें हैं मानते पर, क़सम न माँ की भी खाते झूठी, कि कुछ हुआ तो
ख़ुदा अमर है सुना है जब से, हुई है पतली गली हमारी, क़सम ख़ुदा की

चुका दिए कर्ज़ थे जिन्होंने, बना दिए वो गए फ़रिश्ते, न नीचे उतरे
हम इस जहाँ में उतर के यारों, चुका रहे हैं उसे उधारी, क़सम ख़ुदा की

~ विभू राज

22/08/2024

Ghazal-

उसी ने तोड़ा है मेरे दिल को, मगर मैं उससे खफ़ा नहीं क्यों, पता नहीं क्यों
तमाम अच्छाइयाँ थी उसमें, मगर मुझे वो जचा नहीं क्यों, पता नहीं क्यों

दिली तमन्ना थी एक मेरी, कि उससे इस दोस्ती को मैं आशिक़ी में बदलूँ
नहीं कहा पर जब उसने मुझ को, तो मैंने पूछा बता नहीं क्यों, पता नहीं क्यों

यकीं मुहब्बत से उठ चुका है, मेरे तो इक्कीस साल में सारे दोस्तों का
इसी हूँ पीढ़ी का मैं भी लेकिन, मुझे लगी ये हवा नहीं क्यों, पता नहीं क्यों

हज़ारों सालों से हिज़्र का मसअला यही है, न भूख लगती न प्यास लगती
हम आय इक्कीसवीं सदी में, अभी भी इसकी दवा नहीं, क्यों पता नहीं क्यों

बहस किसी से हुई नहीं है, न मेरे सर पे किसी का कर्ज़ा, न कोई रंजिश
उदास मन आज क्यों है मेरा, वजह भी इसकी पता नहीं क्यों, पता नहीं क्यों

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