12/05/2026
بہار میں اردو کے ساتھ یہ کھلی ناانصافی کیوں؟
بہار حکومت نے 208 نئے ڈگری کالجوں کے لیے جو تازہ نوٹیفیکیشن جاری کیا ہے، اس میں 16 مضامین کے لیے 6656 اسسٹنٹ پروفیسر کی اسامیاں نکالی گئی ہیں۔ اس میں ہندی ہے، انگریزی ہے، تاریخ ہے، سائنس کے تمام شعبے ہیں۔لیکن حیرت، افسوس اور تشویش کی بات یہ ہے کہ اردو اسسٹینٹ پروفیسر کے لیے ایک بھی پوسٹ نہیں رکھی گئی۔
یہ سوال اب پوری شدت کے ساتھ اٹھ کھڑا ہوا ہے کہ اگر اردو واقعی بہار کی دوسری سرکاری زبان ہے، تو پھر اس کے ساتھ یہ امتیازی سلوک کیوں؟
اردو بہار کی تہذیبی شناخت، علمی روایت اور سماجی تاریخ کا بنیادی حوالہ ہے۔ لاکھوں لوگ اسے اپنی مادری زبان کے طور پر بولتے، پڑھتے اور لکھتے ہیں۔ اسکولوں، کالجوں اور جامعات میں اردو سے وابستہ طلبہ و اساتذہ کی ایک بڑی تعداد موجود ہے۔ پھر آخر نئی تقرریوں میں اردو کو مکمل طور پر خارج کر دینا کس منطق، کس انصاف اور کس آئینی اصول کے تحت درست مانا جائے؟
خاص طور پر دیہی علاقوں میں قائم ہونے والے ان نئے کالجوں میں، جہاں اردو بولنے والی بڑی آبادی رہتی ہے، اردو اساتذہ کی ایک بھی نشست نہ رکھنا صرف انتظامی غفلت نہیں بلکہ تعلیمی بے دخلی (Educational Exclusion) کی ایک سنگین مثال ہے۔ اس فیصلے کا سب سے زیادہ نقصان اُن غریب اور پسماندہ طلبہ کو ہوگا جن کے لیے اردو ہی اظہار، تعلیم اور سماجی ترقی کا بنیادی وسیلہ ہے۔
حکومت کو یہ سمجھنا ہوگا کہ زبانیں صرف ذریعۂ ابلاغ نہیں ہوتیں، بلکہ ایک معاشرے کی تاریخ، شناخت، تہذیب اور اجتماعی حافظہ ہوتی ہیں۔ اردو کو اس طرح نظر انداز کرنا بہار کی گنگا جمنی روایت اور کثیر ثقافتی مزاج کو کمزور کرنے کے مترادف ہے۔
ہم بہار حکومت سے مطالبہ کرتے ہیں کہ وہ فوراً اس فیصلے پر نظرِ ثانی کرے، اردو کے لیے مناسب تعداد میں اسسٹنٹ پروفیسر کی اسامیاں شامل کرے اور یہ واضح کرے کہ آخر اردو کے ساتھ یہ امتیازی رویہ کیوں اختیار کیا گیا۔
ورنہ حکومت کی نیت عیاں ہو جائے گی کہ وہ اردو کو کس طرح تعلیم، روزگار اور پالیسی سازی کے وقت خاموشی سے کوڑے دان میں پھینک دینا چاہتی ہے۔
🖋️ ڈاکٹر خالد مبشر
نئی دہلی.................................
बिहार में उर्दू के साथ यह खुली नाइंसाफी क्यों?
बिहार सरकार ने 208 नए डिग्री कॉलेजों के लिए जो ताज़ा अधिसूचना जारी की है, उसमें 16 विषयों के लिए 6656 असिस्टेंट प्रोफेसर पदों की घोषणा की गई है। इसमें हिंदी है, अंग्रेज़ी है, इतिहास है, विज्ञान के सभी विषय हैं। लेकिन हैरत, अफसोस और चिंता की बात यह है कि उर्दू असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए एक भी पद नहीं रखा गया।
अब यह सवाल पूरी गंभीरता के साथ उठ खड़ा हुआ है कि अगर उर्दू वास्तव में बिहार की दूसरी राजभाषा है, तो उसके साथ यह भेदभावपूर्ण व्यवहार क्यों?
उर्दू बिहार की सांस्कृतिक पहचान, बौद्धिक परंपरा और सामाजिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण आधार है। लाखों लोग इसे अपनी मातृभाषा के रूप में बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उर्दू से जुड़े विद्यार्थियों और शिक्षकों की एक बड़ी संख्या मौजूद है। फिर आखिर नई नियुक्तियों में उर्दू को पूरी तरह बाहर कर देना किस तर्क, किस न्याय और किस संवैधानिक सिद्धांत के तहत उचित माना जाए?
विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित होने वाले इन नए कॉलेजों में, जहाँ उर्दू बोलने वाली बड़ी आबादी रहती है, उर्दू शिक्षकों का एक भी पद न रखना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि शैक्षिक बहिष्करण (Educational Exclusion) का एक गंभीर उदाहरण है। इस निर्णय का सबसे अधिक नुकसान उन गरीब और वंचित विद्यार्थियों को होगा जिनके लिए उर्दू ही अभिव्यक्ति, शिक्षा और सामाजिक प्रगति का मुख्य माध्यम है।
सरकार को यह समझना होगा कि भाषाएँ केवल संचार का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि किसी समाज के इतिहास, पहचान, संस्कृति और सामूहिक स्मृति की वाहक होती हैं। उर्दू की इस प्रकार उपेक्षा करना बिहार की गंगा-जमुनी तहज़ीब और बहुसांस्कृतिक स्वभाव को कमजोर करने के समान है।
हम बिहार सरकार से मांग करते हैं कि वह तुरंत इस निर्णय पर पुनर्विचार करे, उर्दू के लिए उचित संख्या में असिस्टेंट प्रोफेसर पद शामिल करे और यह स्पष्ट करे कि आखिर उर्दू के साथ यह भेदभावपूर्ण रवैया क्यों अपनाया गया।
वरना सरकार की मंशा साफ़ हो जाएगी कि वह उर्दू को शिक्षा, रोजगार और नीति-निर्माण के क्षेत्रों से चुपचाप बाहर करना चाहती है।
🖋️ डॉ. खा़लिद मुबश्शिर
नई दिल्ली
Khalid Mubashshir