Ashoke Shree

Ashoke Shree सर्व ओर विजय ही विजय है।

शोर मंदिर भारत के तमिलनाडु राज्य में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं स्थापत्य स्मारक है। यह मंदिर चेन्नई से लगभग...
12/05/2026

शोर मंदिर भारत के तमिलनाडु राज्य में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं स्थापत्य स्मारक है। यह मंदिर चेन्नई से लगभग 60 किलोमीटर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी के तट पर बसे प्राचीन नगर महाबलीपुरम (मामल्लापुरम) में स्थित है। आठवीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित यह मंदिर दक्षिण भारत की प्रारंभिक द्रविड़ स्थापत्य परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

इस मंदिर का निर्माण नरसिंहवर्मन द्वितीय (राजसिंह) के शासनकाल में पल्लव वंश द्वारा कराया गया था। उस समय महाबलीपुरम एक समृद्ध समुद्री बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र था, जहाँ से दक्षिण-पूर्व एशिया तक व्यापारिक संपर्क स्थापित थे।

शोर मंदिर ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित एक संरचनात्मक मंदिर (Structural Temple) है। यह उन प्रारंभिक मंदिरों में गिना जाता है जिन्हें चट्टानों को काटकर नहीं, बल्कि तराशे गए पत्थरों के खंडों को जोड़कर बनाया गया था। मंदिर की वास्तुकला द्रविड़ शैली पर आधारित है, जिसमें पिरामिडाकार शिखर, नक्काशीदार दीवारें और सुगठित मंडप विशेष आकर्षण हैं।

मंदिर परिसर में मुख्यतः दो शिव मंदिर और एक विष्णु मंदिर स्थित हैं। एक गर्भगृह भगवान शिव को समर्पित है, जबकि दूसरे में भगवान विष्णु की शयन मुद्रा में प्रतिमा स्थापित है। समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण मंदिर की संरचना पर प्राकृतिक प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं, फिर भी इसकी भव्यता आज भी दर्शकों को आकर्षित करती है।

शोर मंदिर, महाबलीपुरम स्मारक समूह का प्रमुख हिस्सा है। इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने वर्ष 1984 में इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया।

प्रसिद्ध यात्री मार्को पोलो ने अपनी यात्राओं के दौरान महाबलीपुरम के “सात पैगोडा” का उल्लेख किया था। मान्यता है कि शोर मंदिर उन्हीं सात मंदिरों में से एकमात्र शेष संरचना है, जबकि अन्य मंदिर समय के साथ समुद्र में समा गए। इस कारण शोर मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि भारतीय समुद्री इतिहास और प्राचीन स्थापत्य कला का अद्वितीय प्रतीक भी माना जाता है।

सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में स्थित ‘बाण स्तंभ’ लगभग 1400-1500 वर्ष पुराना माना जाता है। यह प्राचीन भारतीय ज्ञान, खगोल एवं...
11/05/2026

सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में स्थित ‘बाण स्तंभ’ लगभग 1400-1500 वर्ष पुराना माना जाता है। यह प्राचीन भारतीय ज्ञान, खगोल एवं समुद्री भूगोल की अद्भुत समझ का प्रतीक है। इस स्तंभ पर अंकित है- "आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग” अर्थात, इस स्थान से दक्षिण ध्रुव तक समुद्र के मध्य कोई भी भूभाग नहीं है। आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से भी यह तथ्य सत्य माना जाता है।

सोमनाथ मंदिर : पुनर्निर्माण के 75 वर्ष: आस्था, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की गौरवगाथाभारत की सनातन सांस्कृतिक चे...
11/05/2026

सोमनाथ मंदिर : पुनर्निर्माण के 75 वर्ष: आस्था, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की गौरवगाथा
भारत की सनातन सांस्कृतिक चेतना में सोमनाथ मंदिर केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा, आस्था और अदम्य पुनर्जागरण का प्रतीक है। अरब सागर के तट पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग सदियों से भारतीय सभ्यता की दृढ़ता, संघर्ष और पुनर्निर्माण की अमर कहानी कहता आया है। वर्ष 2026 में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूर्ण होना केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान के पुनर्स्थापन का ऐतिहासिक पर्व है।
सोमनाथ को भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। “सोमनाथ” शब्द का अर्थ है, चंद्रमा के स्वामी। पुराणों के अनुसार चंद्रदेव ने अपने श्राप से मुक्ति पाने के लिए इसी स्थान पर भगवान शिव की आराधना की थी। मान्यता है कि चंद्रदेव ने स्वर्ण का मंदिर बनवाया, जिसे बाद में रावण ने रजत, भगवान श्रीकृष्ण ने चंदन तथा आगे विभिन्न राजवंशों ने पत्थरों से निर्मित कराया।
सोमनाथ का उल्लेख ऋग्वेद, स्कंद पुराण, शिव पुराण तथा अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। यह स्थान केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि समुद्री व्यापार, संस्कृति और भारतीय स्थापत्य कला के प्रमुख केंद्र के रूप में भी प्रसिद्ध रहा है।
बार-बार विध्वंस और पुनर्निर्माण की गाथा
इतिहास में सोमनाथ मंदिर अनेक विदेशी आक्रमणों का लक्ष्य बना। विशेष रूप से 1025 ईस्वी में मोहम्मद गजनी द्वारा मंदिर पर आक्रमण और लूट का उल्लेख प्रमुखता से मिलता है। इसके बाद भी विभिन्न कालखंडों में मंदिर को क्षति पहुँचाई गई, किंतु भारतीय जनमानस की श्रद्धा कभी समाप्त नहीं हुई। हर बार मंदिर पुनः खड़ा हुआ और पहले से अधिक भव्य स्वरूप में स्थापित हुआ।
सोमनाथ का इतिहास इस सत्य का प्रतीक है कि भारत की सांस्कृतिक चेतना को मिटाया नहीं जा सकता।
भारत की स्वतंत्रता के बाद देश के लौहपुरुष वल्लभ भाई पटेल ने नवंबर 1947 में सोमनाथ जाकर इसके पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। उनके साथ तत्कालीन राजनेता एवं साहित्यकार केएम मुन्शी भी उपस्थित थे। यह केवल मंदिर निर्माण का निर्णय नहीं था, बल्कि गुलामी के कालखंड में आहत भारतीय अस्मिता के पुनर्जागरण का राष्ट्रीय संकल्प था।
सरदार पटेल का मानना था कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारत की सांस्कृतिक आत्मा के पुनर्स्थापन का प्रतीक बनेगा। उनके प्रयासों से सोमनाथ ट्रस्ट का गठन हुआ और मंदिर निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।
11 मई 1951 : प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक क्षण
11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने नव-निर्मित सोमनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की। यह दिन भारतीय इतिहास में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है।
अपने ऐतिहासिक संबोधन में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि
“सोमनाथ का पुनर्निर्माण इस बात का प्रतीक है कि जो राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखता है, उसे कोई शक्ति पराजित नहीं कर सकती।”
यद्यपि तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में इस निर्णय को लेकर मतभेद भी रहे, किंतु जनमानस ने इसे राष्ट्रीय गौरव के रूप में स्वीकार किया।
चालुक्य शैली की अद्भुत वास्तुकला
वर्तमान सोमनाथ मंदिर का निर्माण प्राचीन चालुक्य शैली में किया गया है। इसकी वास्तुकला भारतीय शिल्प परंपरा का अनुपम उदाहरण है। विशाल शिखर, सूक्ष्म नक्काशी, समुद्र तट से जुड़ा दिव्य वातावरण और मंदिर का भव्य गर्भगृह श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करता है।
मंदिर का प्रमुख शिखर लगभग 155 फीट ऊँचा है और उसके ऊपर स्थापित ध्वज प्रतिदिन अनेक बार बदला जाता है। मंदिर परिसर में स्थित “बाण स्तंभ” विशेष आकर्षण का केंद्र है, जिस पर अंकित है कि इस बिंदु के दक्षिण में अंटार्कटिका तक कोई भूभाग नहीं है।
सोमनाथ क्षेत्र का संबंध भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ा हुआ है। निकट स्थित भालका तीर्थ वह स्थान माना जाता है जहाँ श्रीकृष्ण ने देह त्याग से पूर्व अंतिम समय बिताया था। इसी कारण प्रभास क्षेत्र वैष्णव और शैव दोनों परंपराओं के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है।
75 वर्ष : राष्ट्रीय चेतना का उत्सव
वर्ष 2026 में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूर्ण होना भारतीय संस्कृति, धर्म और राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। यह यात्रा केवल पत्थरों से बने मंदिर की नहीं, बल्कि उस विश्वास की है जिसने आक्रमणों, संघर्षों और समय की चुनौतियों के बावजूद स्वयं को जीवित रखा।
सोमनाथ आज विश्वभर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। आधुनिक सुविधाओं, भव्य परिसर, संग्रहालय, प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम तथा तटीय सौंदर्य ने इसे आध्यात्मिक पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र बना दिया है।
सोमनाथ मंदिर का 75वाँ वर्ष भारत की सांस्कृतिक आत्मा के अमरत्व का प्रतीक है। यह मंदिर हमें स्मरण कराता है कि सभ्यताएँ केवल इमारतों से नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं, श्रद्धा और आत्मबल से जीवित रहती हैं। सोमनाथ की घंटियों में आज भी वही संदेश गूंजता है-“धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना अमर हैं।”

उदयपुर के निकट स्थित नागदा गांव में बने सास-बहू मंदिर, जिन्हें “सहस्त्रबाहु मंदिर” भी कहा जाता है, राजस्थान की प्राचीन स...
10/05/2026

उदयपुर के निकट स्थित नागदा गांव में बने सास-बहू मंदिर, जिन्हें “सहस्त्रबाहु मंदिर” भी कहा जाता है, राजस्थान की प्राचीन स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत उदाहरण हैं। 10वीं शताब्दी में निर्मित ये मंदिर मेवाड़ के प्राचीन इतिहास से जुड़े हुए हैं और अपनी बारीक नक्काशी, भव्य संरचना तथा आध्यात्मिक वातावरण के कारण विशेष पहचान रखते हैं।
इन मंदिरों का निर्माण नागदा के शासक महिपाल द्वारा भगवान विष्णु को समर्पित रूप में करवाया गया था। “सहस्त्रबाहु” शब्द भगवान विष्णु के एक स्वरूप का नाम है, जिसका अर्थ है “हजार भुजाओं वाला”। समय के साथ स्थानीय बोलचाल में यह नाम “सास-बहू” के रूप में प्रसिद्ध हो गया। मंदिर परिसर में दो प्रमुख मंदिर हैं, एक बड़ा और एक छोटा, जिन्हें लोकमान्यता में सास और बहू के मंदिर कहा जाता है।
मंदिरों की स्थापत्य शैली अत्यंत आकर्षक है। पत्थरों पर की गई सूक्ष्म नक्काशी में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, अप्सराएँ, पुष्प आकृतियाँ, पौराणिक कथाओं के दृश्य तथा रामायण और अन्य धार्मिक प्रसंगों का सुंदर चित्रण देखने को मिलता है। मंदिर की सजावटी जालियाँ, अलंकृत स्तंभ और दीवारों पर उकेरी गई कलाकृतियाँ तत्कालीन शिल्पकला की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं।
अरावली पर्वतमाला और शांत प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह स्थान इतिहास, कला और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित यह स्मारक आज भी पर्यटकों, इतिहास प्रेमियों और फोटोग्राफरों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
📍 नागदा, उदयपुर, राजस्थान

बाण स्तंभ, सोमनाथ मंदिर परिसरबाण स्तंभ, सोमनाथ मंदिर परिसर में समुद्र तट के किनारे स्थित एक अत्यंत प्रसिद्ध और ऐतिहासिक ...
09/05/2026

बाण स्तंभ, सोमनाथ मंदिर परिसर
बाण स्तंभ, सोमनाथ मंदिर परिसर में समुद्र तट के किनारे स्थित एक अत्यंत प्रसिद्ध और ऐतिहासिक दिशा संकेतक है, जिसे भारत की प्राचीन समुद्री एवं भूगोल संबंधी ज्ञान परंपरा का अद्भुत प्रतीक माना जाता है। यह स्तंभ अरब सागर की ओर स्थापित है और सदियों से श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है। इस स्तंभ पर संस्कृत में अंकित प्रसिद्ध पंक्ति “आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग” विशेष रूप से लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। इसका अर्थ है कि सोमनाथ के इस समुद्र तट से लेकर दक्षिण ध्रुव (South Pole) तक सीधी दिशा में बीच में कोई भूभाग नहीं है, केवल समुद्र ही समुद्र है। यह कथन भारत के प्राचीन दिशा ज्ञान, समुद्री समझ और भूगोल संबंधी वैज्ञानिक दृष्टि को दर्शाने वाला माना जाता है।
“बाण स्तंभ” नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इसके शीर्ष पर तीर के समान संकेत बना हुआ है, जो दक्षिण दिशा की ओर इंगित करता है। इतिहासकारों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह स्तंभ अत्यंत प्राचीन परंपरा से जुड़ा हुआ है और कई विद्वान इसे लगभग 6वीं शताब्दी या उससे भी पुराने काल का मानते हैं, हालांकि इसकी स्थापना की सटीक तिथि उपलब्ध नहीं है। सोमनाथ मंदिर ने इतिहास में अनेक आक्रमण और पुनर्निर्माण देखे हैं, इसलिए माना जाता है कि वर्तमान स्वरूप में दिखाई देने वाला यह स्तंभ मंदिर के आधुनिक पुनर्स्थापन के दौरान पुनः स्थापित अथवा संरक्षित किया गया।
बाण स्तंभ केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि यह भारतीय सभ्यता की वैज्ञानिक सोच, दिशा निर्धारण क्षमता और समुद्री परंपरा का भी प्रतीक माना जाता है। समुद्र की लहरों के सामने खड़ा यह स्तंभ आज भी श्रद्धा, इतिहास और रहस्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

रानी सती मंदिर, जिसे दादी माँ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के झुंझुनू जिले में स्थित देवी सती को समर्पित एक...
09/05/2026

रानी सती मंदिर, जिसे दादी माँ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के झुंझुनू जिले में स्थित देवी सती को समर्पित एक हिंदू मंदिर है। यह भारत का सबसे बड़ा मंदिर है जो रानी सती को समर्पित है। रानी सती एक राजस्थानी महिला थीं जो 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच रहीं और अपने पति की मृत्यु के बाद उन्होंने सती (आत्मदाह) कर ली थी।

राजस्थान और अन्य जगहों पर कई मंदिर उनकी पूजा और उनके कार्यों की स्मृति में समर्पित हैं। रानी सती को नारायणी देवी और दादीजी के नाम से भी जाना जाता है।

Dadeshwar Mahadev Templeगुजरात के जूनागढ़ जिले के समुद्र तटीय गांव चोरवाड में स्थित दादेश्वर महादेव मंदिर प्राचीन आस्था,...
08/05/2026

Dadeshwar Mahadev Temple
गुजरात के जूनागढ़ जिले के समुद्र तटीय गांव चोरवाड में स्थित दादेश्वर महादेव मंदिर प्राचीन आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति का अद्भुत संगम है। अरब सागर के किनारे बसे इस पवित्र शिव मंदिर के आसपास का शांत वातावरण, समुद्री लहरों की मधुर ध्वनि और प्रकृति की मनमोहक छटा श्रद्धालुओं को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है। यह मंदिर स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दूर से आने वाले भक्तों की गहरी श्रद्धा का केंद्र माना जाता है।
श्रावण मास, महाशिवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा, शांति और भक्ति का विशेष अनुभव होता है। चोरवाड़ का समुद्री तट और यहां का धार्मिक वातावरण इस स्थान को पर्यटन और आस्था दोनों दृष्टियों से विशेष बनाता है।
यही चोरवाड़ गांव देश के महान उद्योगपति धीरूभाई हिराचंद अम्बानी की जन्मभूमि के रूप में भी प्रसिद्ध है। साधारण परिवार से निकलकर विश्वस्तरीय उद्योग साम्राज्य खड़ा करने वाले धीरूभाई अंबानी की प्रेरणादायक जीवन यात्रा ने चोरवाड़ को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इस कारण यह गांव धार्मिक, ऐतिहासिक और प्रेरणादायी महत्व का अद्वितीय केंद्र बन गया है।

बिरहा दा सुल्तान यानि शिव, नीम खाये हुए दशहरी आम के जैसा मधुर शिव, मेरे प्रिय कवि शिव बटालवी को पुण्यतिथि पर बहुत मोहब्ब...
05/05/2026

बिरहा दा सुल्तान यानि शिव, नीम खाये हुए दशहरी आम के जैसा मधुर शिव, मेरे प्रिय कवि शिव बटालवी को पुण्यतिथि पर बहुत मोहब्बत।


नेरूदा अपनी एक कविता में कहते हैं- "प्रेम क्षणिक था, पर उसे भूलने में अक्सर एक लम्बा रास्ता तय करना पड़ता है।"

हम जितना भूलने की कोशिश करते हैं, उतना ही याद करने के चक्रव्यूह में फँसते जाते हैं। जब निर्जन जीवन, और बोझिल वर्तमान से ऊबने लगते हैं। जब अकेलापन असहनीय होने लगता है तो हम स्मृति के पहाड़ की तरफ दौड़ लगाना शुरू करते हैं। धीरे-धीरे पहाड़ को काट कर बीते सुखद पलों का रास्ता तैयार करते है। जीवन उतना भर ही है, जीने के बाद जो स्मृति में शेष बचा रह गया। प्रेमी अक्सर स्मृति में उल्टे पाँव यात्रा करते हैं। बिछड़ने पर, पहले मिलन की गंध की खोज तक जाते हैं। इस बीहड़ में भटकना उन्हें पसन्द है। कभी कभी पीड़ा के कांटों से चुभे हुए खुद को लहूलुहान कर लौटते हैं, तो कभी दोनों हथेलियों में सुख के गंध को हाथों में छुपाए बाहर निकलते हैं।
अमेरिकन लेखक माइक एवेरेट कहते हैं- "अगर एक लेखक तुमसे प्रेम करता है तो तुम कभी नही मर सकते।"

लेखक जीवन में मिले प्रेम के सुंगंध, सुख और दुःख की स्मृति, पीड़ा, शिकायतें, सपने, सपनों का टूट जाना। उन सभी चीजों को शब्द दे देता है जो उसने प्रेम में पाया बिना यह बताए कि वो ऐसा कर रहा है। जो आया है वो लौट जाएगा, यह आने के साथ तय रहता है पर कब और कैसे किसी रहस्य की तरह बने रहते हैं।

प्रेम जब भी आता है बिछड़ने का दुःख साथ लिए आता है। सुख के लिपटने भर के ख़्याल से दुःख आ पहुंचता है। चौखट तक जैसे कोई किसी से अभी ठीक से मिला भी नहीं और उसने कहा- मुझे जाना पड़ेगा।

जीवन में अधूरे मिलन की पीड़ा, जीवन के सफर पर कदमों में चिपकी पड़ी मिलती है। ठीक ऐसे ही अधूरे प्रेम की कहानी थी शिव बटालवी और अनुसूया की। जिनके लिए शिव ने लिखा-

"इक कुड़ी जिदा नाम मुहब्बत
गुम है, गुम है, गुम है
ओ सूरत ओस दी, परियां वर्गी
सीरत दी ओ मरियम लगदी
हस्ती है तां फूल झडदे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी"

जब प्रेम सफल नहीं होता तो वह कहानियों का रूप ले लेता है, या किसी कविता के पंक्तियों के बीच छुप जाता है। अनुसूया, पंजाब के प्रसिद्ध साहित्यकार गुरुबख्श सिंह प्रितलडी की सबसे छोटी बेटी थी। जिससे शिव को प्रेम हुआ। गुरुबख्श सिंह का परिवार रूढ़िवादी नहीं था। उन्होंने बेटी से राय जाननी चाही, पर अनुसूया ने उस वक़्त यह जबाब दिया कि मैं खुद को शिव के पत्नी के रूप में नहीं देखती। पिता ने तब उन्हें पढ़ाई पर ध्यान देने को सलाह दी और वे पढ़ाई के लिए विदेश चली गयी। अनु अपनी पढ़ाई के दौरान उसी कॉलेज के अपने सहपाठी भौतिकी के छात्र raul jesus etevez lapera से प्रेम विवाह कर लेती हैं। दोनों वेनेजुएला चले जाते है, मेरिडा यूनिवर्सिटी में अनुसूया अंग्रेजी के प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाने लगती हैं।

अपने प्रेम के विरह में शिव लिखते हैं-

माए नी माए मैं इक शिकरा यार बनाया
चूरी कुट्टाँ ताँ ओह खाओंदा नाहीं
वे असाँ दिल दा मास खवाया
इक उड़ारी ऐसी मारी
इक उड़ारी ऐसी मारी
ओह मुड़ वतनीं ना आया, ओ माये नी!
मैं इक शिकरा यार बना

(शिकरा एक पक्षी का नाम है जो दूर से अपने शिकार को देखकर सीधे उसका मांस नोंच कर ले फिर उड़ जाता है। शिव ने अपनी प्रेमिका को शिकरा कहा है)

अमृता प्रीतम ने शिव को "बिरह का सुल्तान" कहा था। शिव की कविताओं में मरने की इच्छा और निराशा प्रबल रूप से दिखती है। इसलिए उन्होंने "मैंनू विदा करो" जैसे गीत लिखें।

उपन्यासकार lawrence durrell का एक कथन है-
"एक स्त्री के साथ तीन तरीके से जिया जा सकता है,
तुम उससे प्रेम कर सकते हो, या उसके लिए यातना झेल सकते हो, या उसे किसी कहानी या कविता में बदल सकते हो।"

शिव लिवर के गम्भीर बीमारी के शिकार होते हैं और मात्र 36 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह देते हैं, पीछे छूट जाता है एक कवि का विरह में लिखे गए सबसे सुंदर गीत।

मैंनू तेरा शबाब ले बैठा/रंग गोरा गुलाब ले बैठा।
मैंनू जद वी तूसी तो याद आये/दिन दिहाड़े शराब ले बैठा।
चन्गा हुन्दा सवाल ना करदा/मैंनू तेरा जवाब ले बैठा।

शिव के मृत्यु के बाद जब अनुसूया भारत लौटती हैं तो उनके घर भी जाती है, शिव की पत्नी अरुणा से मिलती हैं। उन्होंने बताया कि एक तारा का नाम उन्होंने शिव के नाम पर रखा है, जिसे वो अक्सर देखती हैं। अनुसूया 84 साल की उम्र में जब 2020 में इस दुनिया को छोड़ती हैं तब शिव के उस गीत में वो फिर जिंदा हो उठती हैं। जिनके लिए शिव ने कभी लिखा था-
"इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत गुम है..."

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