05/05/2026
बिरहा दा सुल्तान यानि शिव, नीम खाये हुए दशहरी आम के जैसा मधुर शिव, मेरे प्रिय कवि शिव बटालवी को पुण्यतिथि पर बहुत मोहब्बत।
नेरूदा अपनी एक कविता में कहते हैं- "प्रेम क्षणिक था, पर उसे भूलने में अक्सर एक लम्बा रास्ता तय करना पड़ता है।"
हम जितना भूलने की कोशिश करते हैं, उतना ही याद करने के चक्रव्यूह में फँसते जाते हैं। जब निर्जन जीवन, और बोझिल वर्तमान से ऊबने लगते हैं। जब अकेलापन असहनीय होने लगता है तो हम स्मृति के पहाड़ की तरफ दौड़ लगाना शुरू करते हैं। धीरे-धीरे पहाड़ को काट कर बीते सुखद पलों का रास्ता तैयार करते है। जीवन उतना भर ही है, जीने के बाद जो स्मृति में शेष बचा रह गया। प्रेमी अक्सर स्मृति में उल्टे पाँव यात्रा करते हैं। बिछड़ने पर, पहले मिलन की गंध की खोज तक जाते हैं। इस बीहड़ में भटकना उन्हें पसन्द है। कभी कभी पीड़ा के कांटों से चुभे हुए खुद को लहूलुहान कर लौटते हैं, तो कभी दोनों हथेलियों में सुख के गंध को हाथों में छुपाए बाहर निकलते हैं।
अमेरिकन लेखक माइक एवेरेट कहते हैं- "अगर एक लेखक तुमसे प्रेम करता है तो तुम कभी नही मर सकते।"
लेखक जीवन में मिले प्रेम के सुंगंध, सुख और दुःख की स्मृति, पीड़ा, शिकायतें, सपने, सपनों का टूट जाना। उन सभी चीजों को शब्द दे देता है जो उसने प्रेम में पाया बिना यह बताए कि वो ऐसा कर रहा है। जो आया है वो लौट जाएगा, यह आने के साथ तय रहता है पर कब और कैसे किसी रहस्य की तरह बने रहते हैं।
प्रेम जब भी आता है बिछड़ने का दुःख साथ लिए आता है। सुख के लिपटने भर के ख़्याल से दुःख आ पहुंचता है। चौखट तक जैसे कोई किसी से अभी ठीक से मिला भी नहीं और उसने कहा- मुझे जाना पड़ेगा।
जीवन में अधूरे मिलन की पीड़ा, जीवन के सफर पर कदमों में चिपकी पड़ी मिलती है। ठीक ऐसे ही अधूरे प्रेम की कहानी थी शिव बटालवी और अनुसूया की। जिनके लिए शिव ने लिखा-
"इक कुड़ी जिदा नाम मुहब्बत
गुम है, गुम है, गुम है
ओ सूरत ओस दी, परियां वर्गी
सीरत दी ओ मरियम लगदी
हस्ती है तां फूल झडदे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी"
जब प्रेम सफल नहीं होता तो वह कहानियों का रूप ले लेता है, या किसी कविता के पंक्तियों के बीच छुप जाता है। अनुसूया, पंजाब के प्रसिद्ध साहित्यकार गुरुबख्श सिंह प्रितलडी की सबसे छोटी बेटी थी। जिससे शिव को प्रेम हुआ। गुरुबख्श सिंह का परिवार रूढ़िवादी नहीं था। उन्होंने बेटी से राय जाननी चाही, पर अनुसूया ने उस वक़्त यह जबाब दिया कि मैं खुद को शिव के पत्नी के रूप में नहीं देखती। पिता ने तब उन्हें पढ़ाई पर ध्यान देने को सलाह दी और वे पढ़ाई के लिए विदेश चली गयी। अनु अपनी पढ़ाई के दौरान उसी कॉलेज के अपने सहपाठी भौतिकी के छात्र raul jesus etevez lapera से प्रेम विवाह कर लेती हैं। दोनों वेनेजुएला चले जाते है, मेरिडा यूनिवर्सिटी में अनुसूया अंग्रेजी के प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाने लगती हैं।
अपने प्रेम के विरह में शिव लिखते हैं-
माए नी माए मैं इक शिकरा यार बनाया
चूरी कुट्टाँ ताँ ओह खाओंदा नाहीं
वे असाँ दिल दा मास खवाया
इक उड़ारी ऐसी मारी
इक उड़ारी ऐसी मारी
ओह मुड़ वतनीं ना आया, ओ माये नी!
मैं इक शिकरा यार बना
(शिकरा एक पक्षी का नाम है जो दूर से अपने शिकार को देखकर सीधे उसका मांस नोंच कर ले फिर उड़ जाता है। शिव ने अपनी प्रेमिका को शिकरा कहा है)
अमृता प्रीतम ने शिव को "बिरह का सुल्तान" कहा था। शिव की कविताओं में मरने की इच्छा और निराशा प्रबल रूप से दिखती है। इसलिए उन्होंने "मैंनू विदा करो" जैसे गीत लिखें।
उपन्यासकार lawrence durrell का एक कथन है-
"एक स्त्री के साथ तीन तरीके से जिया जा सकता है,
तुम उससे प्रेम कर सकते हो, या उसके लिए यातना झेल सकते हो, या उसे किसी कहानी या कविता में बदल सकते हो।"
शिव लिवर के गम्भीर बीमारी के शिकार होते हैं और मात्र 36 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह देते हैं, पीछे छूट जाता है एक कवि का विरह में लिखे गए सबसे सुंदर गीत।
मैंनू तेरा शबाब ले बैठा/रंग गोरा गुलाब ले बैठा।
मैंनू जद वी तूसी तो याद आये/दिन दिहाड़े शराब ले बैठा।
चन्गा हुन्दा सवाल ना करदा/मैंनू तेरा जवाब ले बैठा।
शिव के मृत्यु के बाद जब अनुसूया भारत लौटती हैं तो उनके घर भी जाती है, शिव की पत्नी अरुणा से मिलती हैं। उन्होंने बताया कि एक तारा का नाम उन्होंने शिव के नाम पर रखा है, जिसे वो अक्सर देखती हैं। अनुसूया 84 साल की उम्र में जब 2020 में इस दुनिया को छोड़ती हैं तब शिव के उस गीत में वो फिर जिंदा हो उठती हैं। जिनके लिए शिव ने कभी लिखा था-
"इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत गुम है..."