J I jain intellegence

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J I jain intellegence भारतीय ज्ञान परंपरा,जैन धर्म, दर्शन की बुद्धिमत्ता को उजागर करना

24/05/2026

*"पर्वों का आधुनिकीकरण"*

*लेखक: डॉ. आशीष कुमार जैन ‘शिक्षाचार्य’, सह आचार्य एवं विभागाध्यक्ष,एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह*
9826443973

प्रस्तुत शोधपत्र में जैन परंपरा के पर्वों का शास्त्रीय विवेचन एवं उनमें आई आधुनिकता का विश्लेषण किया गया है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि श्रमण और श्रावक की तप-साधना में व्रत और पर्वों का घनिष्ठ संबंध है, क्योंकि व्रताचरण के बिना पर्व की महत्ता नहीं रहती। 'पर्व' शब्द 'पृ' धातु से बना है, जिसका अर्थ प्रसन्नता, पवित्रता, उत्सव एवं पूर्णता प्राप्ति का उद्यम है। शास्त्रों में पर्व को 'प्रोषध' भी कहा गया है, जिसमें उपवास और विषय-कषायों का त्याग होता है।

पर्व मुख्यतः दो प्रकार के हैं- *कृत्रिम* और *अकृत्रिम*। अक्षय तृतीया, रक्षाबंधन, महावीर जयंती आदि व्यक्ति या घटना विशेष से जुड़े कृत्रिम पर्व हैं, जबकि दशलक्षण, रत्नत्रय, अष्टान्हिका आदि अनादि-अनंत अकृत्रिम पर्व हैं। इनका मूल उद्देश्य वीतरागता, आत्मविशुद्धि, कर्मनिर्जरा, सम्यक्त्व की वृद्धि और धर्म-प्रभावना है। दशलक्षण पर्व आत्मा के दस गुणों का उत्सव है जो वर्ष में तीन बार मनाया जाता है। अष्टमी-चतुर्दशी पर्व प्रोषधोपवास से जुड़े हैं, जबकि दीपावली महावीर निर्वाण और रक्षाबंधन धर्म-रक्षा के प्रतीक हैं।

लेख में चिंता व्यक्त की है कि आधुनिकीकरण, वैश्वीकरण और बाजारीकरण के कारण पर्वों की मूल भावना लुप्त हो रही है। पर्वों का *ईवेण्टीकरण* हो रहा है—डी.जे., नृत्य, कोरियोग्राफर का प्रयोग बढ़ा है। *व्यापारीकरण* के कारण उपहार, ऑफर, रिटर्न गिफ्ट का चलन और *प्रदर्शनीकरण* के नाम पर कलश सजाओ, ताम्बोला जैसी प्रतियोगिताएं संयम के स्थान पर असंयम बढ़ा रही हैं। सोशल मीडिया ने फादर्स डे, वैलेंटाइन डे जैसे पाश्चात्य 'डे' को बढ़ावा देकर भारतीय पर्वों के महत्व को कम किया है। रक्षाबंधन में स्वर्ण-रजत राखी, वृक्षों पर राखी, दीपावली में पटाखे, अभक्ष्य लाडू, कार्तिक स्नान जैसी देवमूढ़ता-लोकमूढ़ता बढ़ी है। नववर्ष 1 जनवरी, गरबा नाइट्स में चारित्रिक पतन, करवा चौथ का फिल्मी प्रचार आदि भी चिंताजनक हैं।

इस लेख के माध्यम से आग्रह करते हैं कि पर्वों को शास्त्रोक्त विधि से मनाया जाए, न कि अंधानुकरण से। आधुनिकता के नाम पर होने वाले परिवर्तन सम्यक्त्व और व्रतों को दूषित कर रहे हैं, जो धर्म, संस्कृति और समाज के लिए घातक है। पर्वों का उद्देश्य आत्मकल्याण है, मनोरंजन नहीं।

*परिचय*
श्रमण और श्रावक की तप एवं साधना पद्धति में व्रतों और पर्वों का अत्यन्त अत्यन्त महत्व है। श्रमण और श्रावक
के मोक्ष पुरुषार्थ की सिद्धि में साधक होने के कारण व्रतों और पर्वों का अन्तर्सम्बन्ध है। बिना व्रत और व्रताचरण
के पर्व की महत्ता नहीं।
पर्व शब्द का अर्थ -
पृ धातु से वनिप् प्रत्यय जोड़कर पर्वन् शब्द बनता है। जिसका अर्थ ग्रन्थि, जोड़, गांठ, शरीरावयव,अंग,भाग,
अवधि,उत्सव, अवसर आदि है। 1 पृ धातु का अर्थ प्रसन्न होना, क्रियाशील होना, पवित्रता,रूचिपूर्वक कार्य में
संलग्नता भी होता है।2
शास्त्रकारों ने पर्व को प्रोषध भी कहा है। प्रोषध का अर्थ नियम पूर्वक उपवास भी होता है। आचार्य पूज्यपाद के
अनुसार प्रोषध शब्द पर्व का पर्यायवाची है।3 जिसमें विषय कषायों के साथ चार प्रकार के आहारों का त्याग उत्तम,
मध्यम और जघन्य विधि से किया जाता है,वह उपवास है । पर्व शब्द पूर्णता को प्राप्त करने का उद्यम है।
पर्व का संबन्ध लौकिक जगत् से न होकर आत्मा से है, आत्मा के स्वरुप को जानने, समझने और अनुभव करने
और उसके सामीप्यता के लिए उपवास की उपादेयता है। पर्व में व्रत अनिवार्य है परन्तु त्यौहार मेें व्रतों की
अनिवार्यता नहीें है।
पर्व समाज में विशेष अवधि और विधि के माध्यम से धर्म के उपागमों यथा- व्रत,यम -नियम, उपवास, साधना
पद्धति का परिपालन करते हुए सभ्यता और संस्कृति,जुड़ने का अवसर प्रदान करते हैं। काल मंगल को भी पर्व कहा
गया है। जैन पर्वों का प्रभाव सामान्य जन मानस पर पड़ता है, पर्व खुद से खुद को जोड़कर आन्तिरिक संसार को
तोड़कर पूर्णता प्राप्ति का उद्यम करते हैं,ये आत्मिक उत्सव सम्यक्त्व के वर्धक तथा धर्म और धर्मात्मा के मध्य
मैत्री-प्रमोद-कारूण्य-प्रीति आदि गुणों के उत्पादक होते हैं।
पर्व के भेद
मूलतः दो भेद हैं-
1. कृत्रिम और
2. अकृत्रिम ।

कृत्रिम पर्व - जो पर्व किसी व्यक्ति या घटना विशेष के कारण प्रवर्तित होते हैं,वे कृत्रिम पर्व कहलाते हैं। जैसे-
अक्षय तृतीया, श्रुत पंचमी,मोक्ष सप्तमी,रक्षाबन्धन पर्व, क्षमावाणी पर्व, विजयादशमी पर्व,धन्य त्रयोदशी पर्व, दीपावली
पर्व, महावीर जयन्ती, तीर्थंकर जन्म एवं निर्वाण पर्व, गुरु पूर्णिमा,शरद् पूर्णिमा पर्व आदि।
अकृत्रिम पर्व - जो पर्व अनादि हैं और अनन्तकाल तक प्रवर्तित रहेगें, वे पर्व अकृत्रिम कहलाते हैं। जैसे - दशलक्षण
पर्व, रत्नत्रय पर्व, आष्टान्हिक पर्व,अष्टमी-चतुर्दशी पर्व आदि ।
पर्व का अन्य विभाजन
धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय पर्व आदि ।
पर्वों और व्रतों की कथाओं का स्रोत
दिगम्बर परम्परा में पर्वों और व्रतों की पुण्यवर्धिनी तथा पापप्रणाशनी कथाओं का वर्णन उनके धार्मिक, दार्शनिक,
नैतिक आदि प्रयोजनों एवं शिक्षा तथा फल के साथ संस्कृत-प्राकृत के आगम ग्रन्थों ,पुराण, चरित तथा कथा
साहित्य में उपलब्ध होता है। यथा- पद्म पुराण, हरिवंश पुराण, आदिपुराण, उत्तरपुराण, पाण्डव पुराण, रत्नकरण्डक
श्रावकाचार, बृहत्कथा कोश, आराधना कथा कोश, पुण्याश्रवकथा कोष,आराधना कथा प्रबन्ध,श्रीपालचरित,यशस्तिलक
चम्पू, बृहत्कथा, धर्म परीक्षा, षट्खण्डागम, कषाय पाहुड,धवल टीका,भाव पाहुड,शीलपाहुड,
तिलोयपण्ण्Ÿिा,पउमचरियं,भगवती आराधना, कार्तिकेयानुपे्रक्षा, महावीरचरियं,जम्बुचरियं,समराइच्चकहा,,दो हजार वर्ष
की प्राचीन कहानियां, प्राकृत कथा साहित्य, हिन्दी जैन व्रत कथा साहित्य का समीक्षात्मक अध्ययन, जैन व्रत विधान
संग्रह आदि कृतियों में प्राप्त होता है। इनके अतिरिक्त अपभ्रंश,राजस्थानी,गुजराती आदि भाषा साहित्य में उपलब्ध
जैन व्रत एवं पर्व कथाओं का भारतीय साहित्य,सभ्यता और संस्कृति के इतिहास निरुपण करने में महनीय अवदान
रहा है। कथाओं के भेदों का वर्णन, धवल टीका, कुवलय माला,लीलावई आदि प्राकृत ग्रन्थों में प्राप्त होते हैं।
श्वेताम्बर परम्परा में पर्वों और व्रतों की कथाओं का वर्णन उपासकदशासूत्र, स्थानांगसूत्र, समवायांगसू त्र, भगवती सूत्र,
ज्ञाताधर्म कथा सूत्र,अन्तकृतसूत्र, विपाकसूत्र, उत्तराध्ययनसूत्र, महाप्रत्याख्यान,चूर्णी, प्रबन्ध चिंतामणि, तीर्थकल्प आदि में
प्राप्त होता है।4
पर्व की विशेषताएं एवं उद्देश्य -
सभी पर्वों का मूल प्रयोजन और विशेषता वीतराग परिणाम,आत्मविशुद्धि का सर्वोत्कृष्ट साधन, आत्मालोचन,
आत्मसंतुष्टि,धर्म,धर्मपालन,धर्म-प्रभावना, चारित्र दृढ़ता, सांसारिक प्रपंच -कषाय निवृत्ति, विषय मुक्ति, निःकांक्षा, मूच्छा
त्याग, पंच महापाप त्याग, अणुव्रत पालन,शुभोपयोग, तप-संयम की वृद्धि,कर्मनिर्जरा, प्रमोद, वात्सल्य, आनंद, सौहार्द,
मैत्री-भाव,विधि प्रवर्तन,नैतिक आचरण आदि प्रयोजनों की सिद्धि के साथ धर्म एवं भाषा,संस्कृति संरक्षण और
सभ्यता का विकास करना रहा है। उपरोक्त सभी विशेषताओं के मूल में सम्यग्दर्शन,सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र
का परिपालन ही है।

प्रमुख पर्व:
दशलक्षण पर्व- आत्मा मूल स्वभाव एवं धर्मों का उत्सव होने के कारण ये आत्मा के गुण धर्म की तरह शाश्वत् पर्व
दशलक्षण पर्व है। आत्मा के इस पर्व का वर्ष में तीन बार आगमन होता है। चैत्र शुक्ल,भाद्रपद शुक्ल तथा माघ
शुक्ल की पंचमी से चतुर्दशी तिथि तक मनाया जाता है। वर्तमान में जैन श्रावक भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की
पंचमी तिथि से चतुर्दशी तिथि तक पूर्ण उल्लास और महोत्सव की तरह व्रत की उत्तम-मध्यम और जघन्य विधि के
साथ आत्मशुद्धि के लिए मनाते हैं। इसे पर्युषण पर्व भी कहतेे हैंे, जिसका उल्लेख धर्म नामक कल्प और भगवती
आराधना में पज्जोसमणा कहा गया है। जिसे श्वेताम्बर भाद्र कृष्ण द्वादशी से भाद्रशुक्ल चतुर्थी तक मनाते है।
महापुराण के अनुसार धर्मरूचि नाम के राजा ने दश धर्मों का उपदेश भगवान महावीर से सुना था।
यह पर्व सृष्टि के प्रारंभ में श्रावकों के द्वारा मनाया गया । ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी से आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा तक 49
दिवसीय दुर्दिन महावृष्टि होती है, उसके उपरान्त श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से भाद्रशुक्ल चतुर्थी तक सात सप्ताह में
सुखद-सुखोत्पादक वृष्टि होती है । भाद्रपद शुक्ल पंचमी तिथि से दशलक्षण पर्व में जिनेन्द्र आरधना से सृष्टि का
शुभारम्भ होता है। आचार्य यतिवृषभ ने तिलोयपण्णत्ति ग्रन्थ में लिखा है-
सावणबहुले पाडिवरुद्दमुहुत्ते सुहोदये रविणो ।
अभिजस्स पढमजोए जुगस्स आदी इमस्स पुढं ।।5

श्रावण माह कृष्णा पडि.वा के दिन रुद्र मुहुर्त के रहते हुए सूर्य का शुभोदय होने पर अभिजित नक्षत्र के प्रथम योग
में इस युग का प्रारंभ हुआ ।

असाढ.पुण्णिमीए जुगणिप्पत्ती दु सावणे किण्हे ।
अभिजिम्मि चंदजोगे पाडिवदिवसम्मि पारंभो।6

आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन पांच वर्ष प्रमाण युग की पूर्णता और श्रावण कृष्ण प्रतिपदा के दिन अभिजित नक्षत्र
के साथ चन्द्रमा का योग होने पर उस युग का आरंभ होता हैं
तिलोयपण्णत्ति चतुर्थ महाधिकार में बतलाया गया है कि -

आउ तेजो बुद्धी,बाहुबलं तह य देह उच्छेहो ।
संति-धिदि-प्पहुदीओ, काल सहावेण वड्ढंति ।।1586 ।। पृ.454

आयु , तेज,बुद्धि,बाहु-भुजा बल, देह की उंचाई, क्षमा एवं धैर्य आदिक सब काल-स्वभाव से उत्तरोत्तर बढ़ते जाते हैं।
यहां मुख्य रूप से विचारणीय यह बात है कि - दशलक्षण पर्व क्षमा से प्रारंभ होता है और इस गाथा में भी धृति
अर्थात् धैर्य और क्षमा की बात कही जा रही है,जिससे संगति बैठती है।

भाद्रपद माह की भद्रता का उल्लेख श्री मल्लिपुराण में इस प्रकार बतलाया है-
अहोभाद्रपदाख्योऽयं मासोनेक व्रताकरः ।
धर्म हेतुः परोमध्येऽन्य मासानां नरेन्द्रवत् ।।

यह भाद्रपद का माह अनेक व्रतों की खान है, धर्म का परम साधन है और अन्य सभी माहों में सम्राट के समान है।
यह भद्रता से परिपूर्ण माह है,चातुर्मास की साधना, कषायों के मंदता, सूर्य प्रकाश की मंदता के जठराग्नि की
मंदता,व्यापारिक मंदता आदि कारणों से भाद्रपद माह के दशलक्षण मनाते है।
भाद्रपद माह के व्रत- सोलहकारण व्रत, चन्दन षष्ठी, रोहिणी व्रत, लब्धि विधान व्रत, बारहसौ चैंतीस व्रत,तिलोक तीज
व्रत, पुष्पांजलिव्रत, मुक्तावलीव्रत, शीलसप्तमी,निःशल्य अष्टमी,सुगन्ध दशमी, अनंत व्रत, रत्नत्रय व्रत आदि व्रत
भाद्रपद माह में आत्मविशुद्धि के लिए मनाते हैं।
दशलक्षण पर्व कथा ब्रह्मज्ञानसागर विरचित 36 पद्यात्मक चैपाई छन्द में 71.18 गुटका में श्री दिगम्बर जैन
पंचायती मन्दिर दिल्ली के शास्त्र भण्डार में उपलब्ध है । 7
अष्टमी-चतुर्दशी पर्व- प्रोषधोपवास नामक शिक्षाव्रत के अन्तर्गत अष्टमी और चतुर्दशी पर्व का उल्लेख आचार्य
समन्तभद्र स्वामी ने किया है-

पर्वण्यष्टम्यां च ज्ञातव्यः प्रोषधोपवासस्तु ।
चतुरभ्यवहार्याणां प्रत्याख्यानं सदच्छाभिः ।। 8

चतुर्दशी और अष्टमी के दिन सर्वदा के लिए व्रत विधान की वांछा से चार प्रकार के आहारों का त्याग करना
प्रोषधोपवास जानना चाहिए ।

पर्वदिनेषु चतुष्र्वपि मासे मासे स्वशक्ति मनिगुह्य ।
प्रोषधनियमविधायी, प्रणधिपरः प्रोषधानशनः ।। 9

जो प्रत्येक मास में चारों पर्व के दिनों अर्थात् अष्टमी-चतुर्दशी में अपनी शक्ति को न छिपाकर प्रोषध सम्बन्धी
नियम करता हुआ एकाग्रता में तत्पर रहता है। वह प्रोषधोपवास प्रतिमाधारी है।
चतुर्दशी पर्व की कथा का वर्णन रत्नकरण्डक श्रावकाचार एवं कथाकोश में अहिंसाव्रत की महिमा के अन्तर्गत मातंग
अपर नाम यमपाल चाण्डाल की कथा के माध्यम से चतुर्दशी पर्व का माहत्म्य बतलाया गया है। जो इस प्रकार है-

मातंगो धनदेवश्च,वारिषेणस्ततःपरः।
नीली जयश्च संप्राप्ताः पूजातिशयमुŸामम्् ।। 10
राज्ञोप्यग्रे नीतो देवाद्य न मारयामि चतुर्दश्यां जीवघाते ममावग्रहो स्तीति वदति। यमपालो व्रत
माहात्म्याज्ज्लदेवताभिः सिंहासने धृत्वा पूजितः ।11 राजा के आगे ले जाने पर भी कहने लगा कि महाराज आज
नहीं मारूंगा क्योंकि चतुर्दशी को हिंसा न करने का मेरा नियम है। चतुर्दशी व्रत के माहात्म्य से जल देवियों के
द्वारा सिंहासन पर बैठाकर पूजित किया गया ।
रत्नत्रय पर्व - भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तिथि तक रत्नत्रय पर्व प्रत्येक दशलक्षण में मनाया जाता है।
जिसमें रत्नत्रय की आराधना, उपासना की जाती है। रत्नत्रय पर्व की कथा ब्रह्मज्ञानसागर विरचित गुटका 79-16 में
श्री दिगम्बर जैन पंचायती मन्दिर दिल्ली के शास्त्र भण्डार में उपलब्ध है । विदेह क्षेत्रस्थित कच्छावती देश के
राजा वैश्रवण को विपुलबुद्धि नामक मुनिराज के द्वारा आत्मा के कल्याणार्थ सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और
सम्यग्चारित्र रूप रत्नत्रय व्रत धारण का उपदेश दिया। 13 वर्ष तक रत्नत्रय व्रत का पालन करने से वैराग्य धारण
किया और तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया । व्रत के प्रभाव से कुम्भपुर नगर की रानी प्रजावती के गर्भ से तीर्थंकर
श्री मल्लिनाथ के रुप में जन्म हुआ तप-ज्ञान और निर्वाण पद की प्राप्ति की।12
सोलहकारण पर्व- यह पर्व भी वर्ष में तीन बार मनाया जाता है, भाद्रकृष्ण प्रतिपदा से आश्विन कृष्ण प्रतिपदा,माघ
कृष्ण प्रतिपदा से फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा और चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से वैशाख कृष्ण प्रतिपदा में उत्तम,मध्यम और
जघन्य विधि से तीर्थंकर प्रकृति में निमित्त 16 कारण भावनाओं की आराधना की जाती है। सोलहकारण व्रत को
लगातार 16 वर्षों तक किया जाता है। षट्खण्डागम सूत्र, धवला में सोलह कारण विषयक सूत्र मिलता है-
तत्थ इमेहि सोलसेहि कारणेहि जीवा तित्थयर णामगोद कम्मं बंधन्ति । 13
इन सोलह कारणों से जीव तीर्थंकर नाम गोत्र कर्म बंध करते हैं।
सोलहकारण कथा ब्रह्मज्ञानसागर विरचित हस्त लिखित प्रति संस्कृत गुटका श्री दिगम्बर जैन नया मन्दिर धर्मपुरा
दिल्ली के शास्त्र भण्डार में उपलब्ध है । जिसमें मतिसागर मुनिराज ने 16 कारण व्रत का उपदेश महाशर्मा की
पुत्री भैरवी को उसके पूर्व भव का वृत्तान्त उसके कल्याण के लिए सुनाकर दिया।14
अष्टान्हिका पर्व - यह पर्व भी दशलक्षण भांति वर्ष में तीन बार आता है। यह नंदीश्वर विराजित अकृत्रिम पंचमेरू
और 52 जिनालयों की आराधना के साथ वर्तमान में सिद्धों की आराधना करने से इसकी और अधिक महिमा बढ़

गई है। जो कार्तिक शुक्ला, फाल्गुन शुक्ला एवं आषाढ़ शुक्ला अष्टमी तिथि से पूर्णिमा तिथि पर्यन्त तक उत्साह के
साथ जैन श्रावकों के द्वारा मनाया जाता है। पं्राकृत और संस्कृत की नंदीश्वर भक्ति में कहा गया है-
आसाढ-कŸिायफागुणमासाणं अट्ठमिमाइं काउण जाव पुण्णिमंति ।।15
आषाढकार्तिकाख्यं फाल्गुण मासे च शुक्लपक्षेष्टम्याः।
आरभ्याष्टदिनेषु च सौधर्म प्रमुख विबुधपतयो भक्त्या । 13 ।।16
नंदीश्वर व्रत पालन की कथा में अयोध्या के राजा हरिषेण को चक्रवर्ती पद की प्राप्ति होना बतलाया गया है। 17
ऽ आचार्य रविषेण कृत पद्मपुराण में राजा दशरथ ने इस पर्व की तैयारी अपने राज्य में किस प्रकार कराई ये
वर्णन प्राप्त होता है।
ऽ लक्ष्मण- रावण युद्ध में दोनों पक्षों का अष्टान्हिका पर्व में युद्ध विराम कर आराधना का वर्णन प्राप्त
होता है।
ऽ हरिवंश पुराण में अष्टान्हिका पर्व के अवसर पर नंदीश्वर का वृहद् वर्णन और पूजा का उल्लेख मिलता है।
ऽ श्रीपाल चरित में अष्टान्हिका पर्व के अवसर पर मैनासुन्दरी और श्रीपाल सहित 700 मित्रों के साथ श्री
सिद्धाष्टक अर्थात् श्री सिद्धचक्र की आराधना का उल्लेख और उसके प्रभाव से स्वयं के 700 कोढ़ियों का कुष्ठ
रोग निवारण का वर्णन मिलता है।
ऽ चतुर्दशी पर्व की कथा का वर्णन रत्नकरण्डक श्रावकाचार एवं कथाकोश में अहिंसाव्रत की महिमा के
अन्तर्गत अष्टान्हिका में मद्य,मांस,हिंसा का निषेध रहना ।
उपरोक्त सभी तथ्य अष्टान्हिका पर्व की महिमा का गान कर रहें हैं, इनके अतिरिक्त भी जैन पुराणों, चरितों के
अतिरिक्त प्राचीन पाण्डुलिपियों में भी पर्वों से जुड़ी कथाओं को खोजा जा सकता है।
दीपावली पर्व - जैन धर्म के चैबीसवे तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के कार्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रत्यूष वेला में
निर्वाण पद की प्राप्ति और उनके गणधर इन्द्रभूति गौतम स्वामी को गौ-धूलि वेला में केवलज्ञान की प्राप्ति होने की
प्रसन्नता में अमावस्या की कालिरात्रि को दीपकों के प्रकाश से ज्यातित करके श्रावकों ने दीपावली पर्व मनाया ।
हरिवंश पुराण, उत्तरपुराण, यशस्तिलक चम्पू, निर्वाण भक्ति, निर्वाण काण्ड भाषा आदि में तीर्थंकर महावीर के निर्वाण
का उल्लेख प्राप्त होता है। कहा गया है-
उज्जंते णेमिजिणो,पावाए णिव्वुदो महावीरो ।18
हरिवंश पुराण में दीपावली पर्व का वर्णन श्लोक के माध्यम से प्राप्त होता है।

ज्वलत्पदीपालिकया प्रवृद्धया, सुरासुरैः दीपितया प्रदीप्तया ।
तदास्म पावानगरी समन्ततः प्रदीपिता काशलता प्रकाशते ।
ततस्तु लोकःप्रतिवर्षमादरात् प्रसिद्ध दीपावलीकयात्र भारते ।
समुद्यतः पूजयति जिनेश्वरं जिनेन्द्र निर्वाण विभूति-भक्तिभाग्।।

रक्षाबन्धन पर्व - धर्म और धर्मात्मा की रक्षा का पर्व,वात्सल्य पवर्, सलूना पर्व,श्रमण संस्कृति रक्षा पर्व कहा जाता
है। जिसकी कथा सर्व प्रथम हरिवंश पुराण में का वर्णन रत्नकरण्डक श्रावकाचार 19-20 श्लोक, एवं कथाकोश में
सम्यग्दर्शन अंग वात्सल्य के अन्तर्गत प्राप्त होता है।19 उज्जैनी नगरी के राजा श्रीधर्म के चार मन्त्री बलि,
बृहस्पति,नमुचि और प्रह्लाद थे, 700 मुनियों के संघ नायक अकम्पनाचार्य के शिष्य मुनि श्रुतसागर से शास्त्रार्थ में
पराजित हुए और अपमान का बदला लेने के अपराध में देश से निष्काषित होकर हस्तिनापुर के राजा को प्रसन्न
करके वहां कुशलता पूर्वक मन्त्री पद को प्राप्त किया और साथ में राजा के द्वारा प्रदत्त वरदान स्वरुप सात दिनों
का राजा बनकर बलि नामक मन्त्री ने नगर में चातुर्मास कर रहे आचार्य अकम्पनाचार्य ससंघ 700 मुनियों के संहार
की योजना बनाकर नरमेध यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सम्पूर्ण मुनि संघ को लकड़ियों का बाड़ा बनाकर
महाग्नि प्रज्ज्वलित कराई, विष्णुकुमार मुनि ने विक्रया ऋद्धि के प्रभाव से 700 मुनियों की रक्षा की । इस खुशी में
मुनियों की नवधा भक्तिपूर्वक आहार चर्या हुई, धर्म और धर्मात्मा की रक्षा के उपलक्ष्य में रक्षार्थ एक दूसरे को
रक्षासूत्र बान्धे तब से यह पर्व रक्षाबन्धन पर्व के रुप में मनाया जाने लगा।
रक्षाबन्धन पूजन की जयमाल की पंक्तियों के अनुसार - 20
समकित के वात्सल्य अंग की महिमा प्रगटी इस जग में ।
रक्षाबन्धन पर्व इसी दिन से प्रारम्भ हुआ जग में ।
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का दिन था रक्षासूत्र बंधा कर में।
वात्सल्य की प्रभावना का आया अवसर घर-घर में । -
रयणोदय टीका में रक्षासूत्रों का उल्लेख मिलता है। जिसमें रक्षासूत्र बांधने के उद्देश्य और भेदों का वर्णन किया है
। यथा- धार्मिक रक्षा सूत्र के अन्तर्गत व्रत ग्रहण संकल्प -ग्रन्थाध्ययन संकल्प - देव-शास्त्र-गुरु आदि का रक्षा का
संकल्प हेतु तथा नैमित्तिक रक्षा सूत्र के अन्तर्गत- कंकण बंधन, अनुष्ठान आदि ।
पर्वों की आधुनिकता एवं आधुनिक पर्व-
आधुनिकीकरण, वैश्वीकरण, मुद्रीकरण-व्यवसायीकरण ने पर्वों की दशा और दिशा में परिवर्तन कर दिए हैं। जिसके
कारण पर्वों के मूल उद्देश्य, भावना,विधि-अनुष्ठान, मान्यता, अहिंसक एवं पारंपरिक साधन आदि में परिवर्तन आने

से पर्वों में आधुनिकता का प्रवेश हो गया है। वर्तमान में पर्वों में लोक मूढ़ता,देवमूढता, गुरू मूढता के साथ
लोकानुकरण का प्रभाव दिखाई दे रहा है। जिनके कारण सम्यग्दर्शन,सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र दूषित होते जा
रहे हैं । आचार्य कुन्दकुन्द बारसाणुवेक्खा में कहते हैं कि-
दंसणभट्टा भट्टा,दंसण भट्टस्स णत्थि णिव्वाणं ।21
जो सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट है, भ्रष्ट हैं वे निर्वाण पद की प्राप्ति नहीें कर पाते हैं । तात्पर्य यह है कि- जो सम्यक्
श्रद्धान से रहित, च्युत, पतित हैं,वे अपने मोक्ष पुरूषार्थ रूपी लक्ष्य से नितान्त दूर हैं।
भयाशा-स्नेह-लोभाच्च कुदेवागमलिंगिनाम् ।
प्रणामं विनयं चैव न कुय्र्युः शुद्ध दृष्टयः ।ं22

भय-आशा-स्नेह और लोभ के वशीभूत होकर कुदेव-कुशास्त्र-और कुगुरू को प्रणाम नमस्कार, विनय करके उनकी
आज्ञा का पालन करने लगे जाने के कारण उनकी मान्यताओं और बताई गए अनुष्ठान -विधि- पूजा और परम्पराओं
का पालन करनें लग जाते हैं। यही पर्वों में आधुनिकता के प्रवेश करने का कारण है, जो हमारे पर्वों और व्रतों के
मूल प्रयोजन ही से भटका रहा है।
जैनाचार्यों ने कहा है वे क्रियाएं करें जिनसे सम्यक्त्व पोषित हो । यथा
सर्व एव हि जैनानां प्रमाणं लौकिको विधिः ।
यत् न सम्यक्त्व हानि र्न मलं न व्रतदूषणम् ।।

लोक प्रचलित वे सभी व्यवहार जैनियों का प्रमाण रूप से मान्य हैं, जिनसे उनके सम्यक्त्व की हानि न हो और
अहिंसादि व्रतों में दूषण उत्पन्न ना हो ।
पर्वों की आधुनिकता के विचारणीय बिन्दु:
1. विधि में न्यूनता- आज पर्वों में सकलीकरण के स्थान पर उनका सरलीकरण होता जा रहा है। परिणामतः
व्रतों और पर्वों की विधि में न्यनता का प्रवेश होने से तीन बार की जगह केवल एक बार ही उत्साह पूर्वक आयोजन
होने लग गए हैं । जैन धर्म ग्रन्थों में दशलक्षण, सोलहकारण और अष्टान्हिका आदि पर्वों को विधि पूर्वक वर्ष में
तीन बार मनाने का निर्देश दिया गया है और उत्कृष्ट विधि पूर्वक मनाया जाना चाहिए ।

2. पर्वों का ईवेण्टीकरण - आज पर्वों में वास्तविक तत्वों एवं मूल भावनाओं का अभाव देखा जा रहा है, उसका
कारण है पर्वांे को ईवेण्ट की तरह मनाना, जिसमें पाश्चात्य एवं गैर परम्परागत संगीत का प्रदर्शन, नृत्य का
प्रदर्शन, डी.जे. का प्रयोग तथा इन सबके प्रबन्धन के लिए ईवेण्ट मेनेजर, कोरियोग्राफर आदि को बुलाना ।

3. पर्वों का व्यापारीकरण- पर्वों का व्यापारीकरण होने से आज हमारे भारतीय संस्कृति के समस्त पर्वों पर
विज्ञापन की भरमार देखी जाती है। जिसके अनुकरण से समाज में पर्वों के अवसर पर आॅन लाईन -आॅफ लाईन
उपहारों का आदान -प्रदान रिटर्न गिफ्ट, अनैतिक पब्लिक रिलेशन को बढ़ावा , किटी पार्टी,मेक माय ट्रिप सिंगापुर में
दीपावली मनाओ, दिवाली धमाका, होली -रक्षाबन्धन आॅफर आदि के प्रचलन में प्राचीन, अहिंसक और पर्यावरणीय
उपकरणों के स्थान पर आधुनिक उपकरणों का प्रयोग भले ही उनसे पर्यावरण की हानि हो या जीवों की हानि हो या
स्वयं के स्वास्थ्य की हानि हो ।

4. पर्वों का प्रदर्शनीकरण - धर्म प्रभावना के नाम पर बालीबुड -हालीबुड की तर्ज पर विविध प्रतियोगिताओं,
आयोजनों,कार्यक्रमों की संयोजना जो संयम के स्थान पर असंयम को उत्पन्न करातीं हैं। यथा - कलश सजाओं,
आरती सजाओ, जोड़ी कमाल की, कौन बनेगा करोड़पति, ताम्बोला आदि प्रतियोगिताएं जिनमें आत्मश्रृंगार के स्थान
पर स्व शरीर श्रृंगार शारीरिक प्रदर्शन, कामोद्दीपक वेशभूषा ,हिंसा जन्य श्रृंगार सामग्री का प्रयोग होने लग गया है।

5. सोशल मीडिया का प्रवेश - पर्वों में आधुनिकता लाने में सोशल मीडिया की अहम भूमिका है।-संस्कार
विहीन शिक्षा के कारण हमारी समाज में अनेक प्रकार के डे मनाने का चलन आपसी सौहार्द के नाम पर हो गया है।
यथा फादर्स डे,प्रपोज डे, चाॅकलेट डे, टेडी डे,प्रामिस डे,हग डे, बेलेन्टाईनडे,मदर्स डे, फे्रन्डशिप डे, बेलेंटाईन डे आदि ।

आशंका यह है कि - उपरोक्त सभी प्रकार के डेस् मनाने के जो तरीकों को लेकर है,जिनमें संस्कार हीनता निहित
होती है,युवा पीढ़ी इनमें आनन्द की अनुभूति कर रही है,जो भारतीय सभ्यता और संस्कृति के लिए घातक हैं।

आधुनिक व्यंजनीकरण -जैन संस्कृति के पर्व व्रत- उपवास और संयम पर आधारित हैं और इन पर्वों पर जों भी
आहार-भोजन-पकवान आदि का निर्माण व्रताचरण के लिए मर्यादित और शुद्धि पूर्वक अहिंसक पद्धति से बनाया
जाता है। परन्तु आज पर्वों को त्यौहार की तरह मनाया जाने लगा है फलतः आज बाजार में जैन धर्म शास्त्रों में
वर्णित अभक्ष्य पदार्थों की भरमार है। युवा पीढ़ी के स्वादु लोगों की जीवन शैली में अशुद्ध-अमर्यादित अभक्ष्य आहार
स्थान बनाता जा रहा है । जो धर्म, संस्कृति और समाजिक स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त ही हानिकारक है।

6. रक्षाबंधन पर्व - रक्षाबन्धन वात्सल्य का पर्व है । यह पर्व भी आधुनिकता की भेंट चढ़ता जा रहा है।
आधुनिकीकरण में विश्व मैत्री दिवस जिसे ग्लोबल फंे्रडशिप डे कहते हैं। ग्लोबल फंे्रडशिप डे ने रक्षाबंधन पर्व के
महत्व को कम कर दिया है। जो कि रक्षाबन्धन के कुछ ही दिन पूर्व 30 जुलाई 1935 से अमेरिका में प्रारंभ हुआ ।
जिसे अलग-अलग देश अलग-अलग तिथियों में मनाते हैं। इसे डिजिटल संचार,सोशल मीडिया, मोबाइल फोन ने
लोकप्रिय बना दिया है। इस दिन जो स्त्री-पुरुष, युवक-युवती, एक-दूसरे को अपना दोस्त मानते हैं वे आपस में
फें्रडशिप् ग्रीटिंग कार्ड, फें्रडशिप् बैल्ट या बैंड बांधते हैं, जो राखी नुमा होता है। निजी स्वार्थ के कारण रक्षा के
स्थान पर असुरक्षा , परस्पर सम्बन्ध विच्छेद,पारिवारिक विघटन, सामाजिक विघटन , धार्मिक और सांस्कृतिक
विघटन , युवा पीढ़ी का नैतिक एवं चारित्रिक पतन जैसे दूरगामी परिणाम देखने में आ रहे हैं। यह अंधानुकरण
हमारे पर्वों पर कुठाराघात है। वर्तमान में भावातिरेक में वृक्षों में रक्षासूत्र का बंधन , भगवान की वेदियों पर-
मुनिराज की पिच्छियों पर राखी बांधना, स्वर्ण और रजत की राखी बांधना आदि विकृतियां दृष्टव्य हो रही हैं।

7. अक्षय तृतीया पर्व में राजा सोम-श्रेयांस ने महामुनि ऋषभदेव जी को आहार दान दिया था। आज वर्तमान
में बच्चों के मनोविनोद के लिए दूल्हा-दुल्हिन, पुतरा-पुतरियां का गठबन्धन कराना,विवाह कराना, वट वृक्ष की
परिक्रमा करना आदि प्रचलन में आ गया है। मुझे जहां तक लगता है कि ये परंपरा शायद राजा सोम-श्रेयांस और
उनकी धर्म पत्नि के द्वारा आहार दान के उपलक्ष्य में प्रचलित हुई हो। अक्षय तृतीया पर्व पर बुन्देलखण्ड में पहले
मिट्टी के जल परिपूरित चार -पांच कलश, कच्चा हरा आम और इक्षुदण्ड आदि चैक रंगोली बनाकर उस पर रखा
जाता था । आयुर्वेद की दृष्टि से आम को अक्षय तृतीया से आषाढ़ की पूर्णिमा तक खाने का प्रावधान करता है ।
ये सभी तथ्य विचारणीय हैं परन्तु वर्तमान में उपरोक्त परम्पराओं को मिथ्या मान्यताओं से जोड़ दिया जाता है।

8. नवरात्रि पर्व - देवी -देवताओं की मूर्तियों की स्थापना,गरवा- डांडिया नाईटस्, जगराता,कन्या भोज, जल
समर्पण, नवरात्रि व्रत एवं पूजा, जाप अनुष्ठान अखाड़ा, युद्धाभ्यास, शस्त्र साधना, कुविद्याओं की साधनाएं आदि ।
संस्कार और आध्यात्मिकता की कमी और भौतिक चमक-दमक के कारण गरवा-डांडियां नाईट्स के वर्तमान में
परिणाम धर्म,संस्कार,समाज तथा परिवार के हित में नहीं है, यथा-कोरियोग्राफरर्स का गरवा-डांडियां की तैयारी कराना,
मोबाईल नम्बरर्स का एक्सचेंज होना, चारित्रिक पतन गरवा के बाद गर्भपात,एक्स फ्रंेण्स, लिव इन रिलेशन जैसी
घटनाएं सामने आ रहीं हैं। आज लोग मिथ्यात्व बचाने के नाम पर बडे़-बडे़ मिथ्यात्व आडम्बर और नई-नई
परम्पराएं बनाते जा रहे हैं, जो समाज के लिए घातक हैं।

9. विजयादशमी दशहरा- भरतेश वैभव में भरत चक्रवर्ती की दिग्विजय यात्रा दशमी की रात्रि को होने का वर्णन
प्राप्त होता है। चक्रवर्ती के चक्ररत्न की रक्षा 32000 देव करते हैं,वह स्वयं क्षायिक सम्यक्त्व का धारक है वह कैसे
मिथ्या देवी-देवताओं की पूजा करेगा यह तथ्य विचारणीय है। वर्तमान में विजयादशमी को रावण पुतला दहन, रावण
पूजा, युद्धाभ्यास, भाव हिंसा के भावों को पोषित करता है । जैन दर्शन में भाव हिंसा से सम्बन्धित आटे का मुर्गा
नामक कथानक और रावण पुतला दहन का कार्य करने पर भाव और द्रव्य हिंसा का दोष लगता है और पाप की
अनुमोदना का फल भी पाप होगा ।

10. करवा चैथ - कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को चैथ माता,चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी की पूजा पति की दीर्घायु की
कामना को लेकर बालु अथवा मिट्टी की वेदी बनाकर, चलनी में पति का दर्शन एवं चन्द्र दर्शन, रात्रि में व्रत का
खोलना आदि ये सभी अनुकरण से अधिकांश लोगों ने करना प्रारंभ कर दिया है। आधुनिक काल में महिलाएं
पतिदिवस के रूप में मनाना पसंद कर दिया । इसे प्रसिद्ध करने में फिल्म इण्डस्ट्री का बहुत बड़ा अवदान है।

11. होलिका उत्सव - जैन दर्शन में होलिका उत्सव वर्णन तीर्थंकर श्री नेमि कुमार के वैराग्य प्रसंग में उल्लेख
मिलता है, संयोगतः फाल्गुन की अष्टान्हिका पर्व का समापन पूर्णिमा तिथि को हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं।
नेमिश्वर फाग भट्टारक विद्यानन्द और जगजीवन दास द्वारा लिखित पाण्डुलिपियां अनेकान्त ज्ञान मंदिर बीना
म.प्र. में सुरक्षित हैं। इस दिवस को शुष्क अबीर और रंगों की होली खेलना प्रारंभ हो गई है और बुराई पर अच्छाई
की जीत के इस उत्सव ने वर्तमान में पर्व का स्वरुप लेता जा रहा है। अज्ञानता वश रात्रि में होलिका दहन, प्रातः
नवीन अग्नि का लाना आदि किया जाने लगा है।

12. दीपावली पर्व - दीपावली पर्व 24 वें तीर्थंकर भगवान महावीर के निर्वाण और गौतम स्वामी के केवलज्ञान
के उपल्क्ष्य में ज्ञानलक्ष्मी के स्थान पर लक्ष्मी पूजन, व्यापारिक साधनों में बहीखाता पूजन, तराजू, वाहन पूजन,
पटाखों का प्रयोग, अपवित्र -अशुद्ध द्रव्य से दीपकों का प्रज्ज्वलन, निर्वाण लाडू निर्माण में अशुद्ध रासायनिक
सामग्री का प्रयोग, नदी-समुद्रों में कार्तिक स्नान रूप लोकमूढता कार्तिक अमावश्या को मिथ्यामन्त्रों की साधना, कुदेवों
को पूजना जैसी देव मूढ़ताओं का पालन करना । जगतराय की सम्यक्त्व कौमुदी कथा में कार्तिक माह की
पूर्णिमा को राज परिवारों के द्वारा कौमुदी महोत्सव आनन्द के लिए मनाने का उल्लेख मिलता है।

13. नव वर्षोत्सव-नूतन वर्ष के विषय में भारतीय परम्परा में वीरनिर्वाण संवत् और विक्रमसंवत् जो क्रमशः
कार्तिक माह और चैत्र माह में मनाते हैं, हम उसे नूतन वर्ष का शुभारंभ मानते हैं। उसके स्थान पर जूलियन
कैलेण्डर के नये वर्ष को 1 जनवरी को मनाना प्रारंभ कर दिया है।23जिसके उपलक्ष्य में निजी जीवन की स्वतन्त्रता
के नाम पर हम 31 दिसबर नाईट, भजन सन्ध्या, आर्केस्ट्रा पार्टी आदि अनेक प्रकार के भोग और विलासिता से

परिपूरित वातावरण में शील भंग, मद्यपान, धूम्रपान, क्लबस्,पर्ययटन, अपने निजी स्वार्थ,, भोग-विलास की पूर्ति के
लिए आनंदाभास को आनन्द मानने लग गए हैं । अब धार्मिक आयोजन भी नए वर्ष पर आयोजित होने लग गए हैं
। विचारणीय बात है कि धीरे-धीरे यह हमारी संस्कृति में सम्मि

18/03/2026
एकलव्य विश्वविद्यालय के वार्षिक उत्सव में हुआ सर्वार्थसिद्धि ग्रन्थ आधारित रिसर्च बुक का विमोचनबुंदेलखंड के शैक्षणिक संस...
18/03/2026

एकलव्य विश्वविद्यालय के वार्षिक उत्सव में हुआ सर्वार्थसिद्धि ग्रन्थ आधारित रिसर्च बुक का विमोचन

बुंदेलखंड के शैक्षणिक संस्थान एकलव्य विश्वविद्यालय दमोह जो कुलाधिपति डॉ सुधा मलैया जी के द्वारा स्थापित है । जहां विविध विषयों में पी -इच .डी पाठ्यक्रम संचालित है । संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ आशीष कुमार जैन शिक्षाचार्य के के मार्गदर्शन में शोधार्थी आलोक जैन कारंजा द्वारा ''आचार्य पूज्यपाद कृत सर्वार्थसिद्धि का समीक्षात्मक अध्ययन '' विषय पर आधारित 520 पृष्ठों की phd का पुस्तक के रूप में 1000 प्रतियों के साथ प्रकाशन एकलव्य विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग के द्वारा किया गया है । जिसमें श्री महावीर ब्रह्मचर्य आश्रम जैन गुरुकुल कारंजा, जिनवाणी संवर्धन केंद्र पोन्नूर का सहयोग रहा । इस महान ग्रन्थ का विमोचन एकलव्य विश्वविद्यालय के वार्षिक उत्सव गूंज में कुलगुरु प्रोफे . पवन कुमार जैन, कुलसचिव, प्रोफेसर प्रफुल्ल शर्मा, डीन एकेडमिक प्रो. शमा खानम, अधिष्ठाता, प्रोफे आर सी जैन, प्रोफेस शैलेन्द्र जैन, सी ई ओ डॉ प्रकाश खंपरिया के कर कमलों से विश्वविद्यालय के सभी प्राध्यापकों, सह प्राध्यापकों, सहायक प्राध्यापकों, विद्यार्थियों की उपस्थिति में हुआ । यह शोध ग्रन्थ 6 अध्यायों में विभक्त है, जिसमें आचार्य पूज्यपाद कृत सर्वार्थसिद्धि ग्रन्थ की दार्शनिकता, आचारात्मकता, ध्यान, समाधि,तत्व चिंतन, शैक्षणिकता, आदि अनेक दृष्टियों से समीक्षा प्रस्तुत की गई है । जो आज वर्तमान समय की समाज के लिए बहुत ही उपादेय है । ध्यातव्य रहे इस शोध ग्रन्थ का संपादन डॉ आशीष जैन और डॉ राकेश जैन ने किया । साथ ही
डॉ अनिल पिंपलापुरे , डॉ प्रशांत सेन श्रीमती श्रद्धा जैन आदि विद्वानों के द्वारा लिखित ब्लॉक चेन टैक्नोलॉजी नामक पुस्तक भी संपादन डॉ आशीष जैन संस्कृत विभाग द्वारा किया गया इस प्रकार आपके द्वारा कुल 13 पुस्तकों का लेखन और संपादन कार्य भी किया जा चुका है । आपके द्वारा पढ़ाए गए विद्यार्थी नेट तथा जे आर एफ जैसी परीक्षाएं भी उत्तीर्ण कर चुके हैं।

तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी की जन्म भूमि बनारस में स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कर्मवाद और राष्ट्र निर्माण विषय पर संगो...
30/01/2026

तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी की जन्म भूमि बनारस में स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कर्मवाद और राष्ट्र निर्माण विषय पर संगोष्ठी । 29 से 31 जनवरी 2026 । जिसमें कुलपति bhu, कुलपति सारनाथ विश्वविद्यालय, नेपाल, uk, इंग्लैंड के विद्वानों के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा के मनीषी विद्वानों के साथ विचार विमर्श किए

21/01/2026

धैर्य का परिणाम । कुलगुरु प्रोफेसर पवन जैन, एकलव्य विश्वविद्यालय,दमोह ।

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प्रबुद्ध भवन , न्यू कृषि उपज मंडी सागर रोड दमोह मध्यप्रदेश
Damoh

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