GOLU SINGH

GOLU SINGH digital creator

28/12/2025
मुंबई के एक मॉल में अनाज के बोरे से बनी ड्रेस बिकने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में दिखाया ...
27/12/2025

मुंबई के एक मॉल में अनाज के बोरे से बनी ड्रेस बिकने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में दिखाया गया है कि कैसे एक साधारण बोरे को काटकर, उसमें बटन और मोती (beads) लगाकर उसे फैशनेबल ड्रेस का रूप दिया गया है, जिसकी कीमत ₹3,000 रखी गई है।

मॉल में घूम रहे एक युवक ने इस अजीबोगरीब ड्रेस को देखा और इसका वीडियो रिकॉर्ड कर लिया। अनाज ढोने वाले बोरे को महंगे फैशन आइटम के तौर पर बिकता देख इंटरनेट यूजर्स हैरान हैं और इसे लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

NH-22 सड़क चौड़ीकरण (सुल्तानगंज–देवघर) फोर लाइन 2026 श्रावणीय मेला को ध्यान में रखते हुए NH-22 सड़क के चौड़ीकरण का कार्य...
27/12/2025

NH-22 सड़क चौड़ीकरण (सुल्तानगंज–देवघर) फोर लाइन 2026 श्रावणीय मेला को ध्यान में रखते हुए NH-22 सड़क के चौड़ीकरण का कार्य प्रगति पर है। लगभग 110 किलोमीटर लंबी इस महत्त्वपूर्ण सड़क परियोजना के लिए सर्वे एवं डिजाइन का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है। तारापुर में EPC कंपनी द्वारा कैंप स्थापित कर कार्य शुरू किया गया है।

पुरानी सड़क की स्थिति:
वर्तमान में यह सड़क लगभग 12 मीटर चौड़ी है, जो अलकतरा (डामर) से निर्मित है। श्रावण मास के दौरान लाखों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण लगभग दो महीनों तक छोटे-बड़े वाहनों का आवागमन बाधित रहता है। अत्यधिक दबाव के कारण सड़क बार-बार क्षतिग्रस्त हो जाती है, जिससे यातायात बाधित होता है और यात्रियों को समय की बर्बादी का सामना करना पड़ता है।

नई सड़क की विशेषताएँ:
NH-22 के चौड़ीकरण के अंतर्गत सड़क को फोर लेन में विकसित किया जाएगा। अप एवं डाउन दोनों लेन 9-9 मीटर चौड़ी होंगी, जिससे कुल सड़क चौड़ाई 18 मीटर होगी। सड़क का निर्माण लगभग 1 फीट मोटी फुल कंक्रीट संरचना से किया जाएगा। इसके अतिरिक्त बीच में 3 मीटर चौड़ा रोड-पार्किंग होगा घनी आबादी एवं शहरी क्षेत्रों में सड़क के दोनों ओर 1 मीटर चौड़ी एवं 1.5 मीटर गहरी नालियों का निर्माण किया जाएगा। चौड़ीकरण कार्य पुराने सड़क के बिच सेंटर से दोनों ओर लगभग 15-15 मीटर तक भूमि अधिग्रहण के लिए सर्वे एवं चिन्हांकन किया जा रहा है, जिसका कार्य कंपनी द्वारा शुरू कर दिया गया है।

जल निकासी व्यवस्था:
जल निकासी की सुचारु व्यवस्था के लिए जगह-जगह पर पुल, पुलिया एवं नालियों का निर्माण किया जाएगा। संपूर्ण निर्माण कार्य पुराने सड़क मानचित्र के आधार पर किया जाएगा, किसी नए रूट मैप के अनुसार नहीं।

उपलब्धियाँ एवं अपेक्षाएँ:
NH-22 सड़क के चौड़ीकरण से सुल्तानगंज–देवघर मार्ग पर यात्रा करने वाले ‘बोल बम’ श्रद्धालुओं को आवागमन में बड़ी सुविधा मिलेगी। यात्रा समय में कमी आएगी और क्षेत्रीय व्यापार, पर्यटन एवं आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी। स्थानीय लोगों में इस परियोजना को लेकर उत्साह और संतोष का माहौल देखा जा रहा है।

Copy/जिनका जन्म 1970, 1971, 1972, 1973, 1974, 1975, 1976, 1977, 1978, 1979, 1980 में हुआ है – खास उन्हीं के लिए यह लेखयह...
26/12/2025

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जिनका जन्म 1970, 1971, 1972, 1973, 1974, 1975, 1976, 1977, 1978, 1979, 1980 में हुआ है – खास उन्हीं के लिए यह लेख

यह पीढ़ी अब 45 पार करके 65- 70 की ओर बढ़ रही है।
इस पीढ़ी की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इसने ज़िंदगी में बहुत बड़े बदलाव देखे और उन्हें आत्मसात भी किया।…

1, 2, 5, 10, 20, 25, 50 पैसे देखने वाली यह पीढ़ी बिना झिझक मेहमानों से पैसे ले लिया करती थी।
स्याही–कलम/पेंसिल/पेन से शुरुआत कर आज यह पीढ़ी स्मार्टफोन, लैपटॉप, पीसी को बखूबी चला रही है।

जिसके बचपन में साइकिल भी एक विलासिता थी, वही पीढ़ी आज बखूबी स्कूटर और कार चलाती है।
कभी चंचल तो कभी गंभीर… बहुत सहा और भोगा लेकिन संस्कारों में पली–बढ़ी यह पीढ़ी।

टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांजिस्टर – कभी बड़ी कमाई का प्रतीक थे।

मार्कशीट और टीवी के आने से जिनका बचपन बरबाद नहीं हुआ, वही आखिरी पीढ़ी है।

कुकर की रिंग्स, टायर लेकर बचपन में “गाड़ी–गाड़ी खेलना” इन्हें कभी छोटा नहीं लगता

“कैरी (कच्चे आम) तोड़ना” इनके लिए चोरी नहीं था।

किसी भी वक्त किसी के भी घर की कुंडी खटखटाना गलत नहीं माना जाता था।

“दोस्त की माँ ने खाना खिला दिया” – इसमें कोई उपकार का भाव नहीं, और
“उसके पिताजी ने डांटा” – इसमें कोई ईर्ष्या भी नहीं… यही आखिरी पीढ़ी थी।

कक्षा में या स्कूल में अपनी बहन से भी मज़ाक में उल्टा–सीधा बोल देने वाली पीढ़ी।

दो दिन अगर कोई दोस्त स्कूल न आया तो स्कूल छूटते ही बस्ता लेकर उसके घर पहुँच जाने वाली पीढ़ी।

किसी भी दोस्त के पिताजी स्कूल में आ जाएँ तो –
मित्र कहीं भी खेल रहा हो, दौड़ते हुए जाकर खबर देना:
“तेरे पापा आ गए हैं, चल जल्दी” – यही उस समय की ब्रेकिंग न्यूज़ थी।

लेकिन मोहल्ले में किसी भी घर में कोई कार्यक्रम हो तो बिना संकोच, बिना विधिनिषेध काम करने वाली पीढ़ी।

कपिल, सुनील गावस्कर, वेंकट, प्रसन्ना की गेंदबाज़ी देखी,
पीट सम्प्रस, भूपति, स्टेफी ग्राफ, अगासी का टेनिस देखा,
राज, दिलीप, धर्मेंद्र, जितेंद्र, अमिताभ, राजेश खन्ना, आमिर, सलमान, शाहरुख, माधुरी – इन सब पर फिदा रहने वाली यही पीढ़ी।

पैसे मिलाकर भाड़े पर VCR लाकर 4–5 फिल्में एक साथ देखने वाली पीढ़ी।

खिलखिलाकर हँसने वाली,
नाना, ओम पुरी, शबाना, स्मिता पाटिल, गोविंदा, जग्गू दादा, सोनाली जैसे कलाकारों को देखने वाली पीढ़ी।

“शिक्षक से पिटना” – इसमें कोई बुराई नहीं थी, बस डर यह रहता था कि घरवालों को न पता चले, वरना वहाँ भी पिटाई होगी।

चाहे जितना भी पिटाई हुई । आज भी कहीं रिटायर्ड शिक्षक दिख जाएँ तो निसंकोच झुककर प्रणाम करने वाली पीढ़ी।

कॉलेज में छुट्टी हो तो यादों में सपने बुनने वाली पीढ़ी…

न मोबाइल, न SMS, न व्हाट्सऐप…
सिर्फ मिलने की आतुर प्रतीक्षा करने वाली पीढ़ी।

पंकज उधास की ग़ज़ल “तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुड़ाया” सुनकर आँखें पोंछने वाली।

दीवाली की पाँच दिन की कहानी जानने वाली।....

लिव–इन तो छोड़िए, लव मैरिज भी बहुत बड़ा “डेरिंग” समझने वाली पीढ़ी.....
स्कूल–कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लड़के और लड़कियां एडवांस कहलाते थे।.....

गुज़रे दिन तो नहीं आते, लेकिन यादें हमेशा साथ रहती हैं।
और यह समझने वाली समझदार पीढ़ी थी कि –
आज के दिन भी कल की सुनहरी यादें बनेंगे।

हमारा भी एक ज़माना था…

तब (प्ले स्कूल) जैसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था।( जो आजकल मैं चला रही हूँ)
6–7 साल पूरे होने के बाद ही सीधे स्कूल भेजा जाता था।
आजकल 2 साल में ही भेज देते हैं ...
स्कूल न भी जाएँ तो किसी को फर्क नहीं पड़ता।😄😄

साइकिल में कैंची का भी एक हिस्सा होता था।
सरकारी बस से बच्चों के साथ सफर।
बच्चे अकेले स्कूल जाएँ, कुछ अनहोनी होगी
ऐसा डर माता–पिता को कभी नहीं हुआ।

पास/फेल यही सब चलता था।
प्रतिशत (%) से हमारा कोई वास्ता नहीं था।

ट्यूशन लगाना शर्मनाक माना जाता था।

किताब में पत्तियाँ और मोरपंख रखकर पढ़ाई में तेज हो जाएँगे –
यह हमारा दृढ़ विश्वास था।

और हाँ कॉमिक्स जो rent पर मिलती थी उसको दोस्तों के साथ share कर के एक ही दिन में 2 या 3 पढ़ लेते थे।

कपड़े की थैली में किताबें रखना,
बाद में टिन के बक्से में किताबें सजाना –
यह हमारा क्रिएटिव स्किल था।

हर साल नई कक्षा के लिए किताब–कॉपी पर कवर चढ़ाना –
यह तो मानो वार्षिक उत्सव होता था।

साल के अंत में पुरानी किताबें बेचना और नई खरीदना –
हमें इसमें कभी शर्म नहीं आई।

दोस्त की साइकिल के डंडे पर एक बैठता, कैरियर पर दूसरा –
और सड़क–सड़क घूमना… यही हमारी मस्ती थी।

स्कूल में सर से पिटाई खाना,
क्लास में मुर्गा बनाना teacher का faviroute था
पैरों के अंगूठे पकड़कर खड़ा होना,
कान मरोड़कर लाल कर देना –
फिर भी हमारा “ईगो” आड़े नहीं आता था।
असल में हमें “ईगो” का मतलब ही नहीं पता था।

मार खाना तो रोज़मर्रा का हिस्सा था।
मम्मी से भी और मैडम से भी 😊😊
मारने वाला और खाने वाला – दोनों ही खुश रहते थे।
खाने वाला इसलिए कि “चलो, आज कल से कम पड़ा।”
मारने वाला इसलिए कि “आज फिर मौका मिला।”

नंगे पाँव, लकड़ी की बैट और किसी भी बॉल से
गली–गली क्रिकेट खेलना – वही असली सुख था।
और हाँ हर साल दोस्तो के साथ रावन बनाना 😍

हमने कभी पॉकेट मनी नहीं माँगा,
और न माता–पिता ने दिया।
हमारी ज़रूरतें बहुत छोटी थीं,
जो परिवार पूरा कर देता था।

दिवाली में लवंगी फुलझड़ी की लड़ी खोलकर
एक–एक पटाखा फोड़ना – हमें बिल्कुल भी छोटा नहीं लगता था।
कोई और पटाखे फोड़ रहा हो तो उसके पीछे–पीछे भागना –
यही हमारी मौज थी।

हमने कभी अपने माता–पिता से यह नहीं कहा कि
“हम आपसे बहुत प्यार करते हैं” –
क्योंकि हमें “I Love You” कहना आता ही नहीं था।

आज हम जीवन में संघर्ष करते हुए
दुनिया का हिस्सा बने हैं।
कुछ ने वह पाया जो चाहा था,
कुछ अब भी सोचते हैं – “क्या पता…”

स्कूल के बाहर हाफ पैंट वाले गोलियों के ठेले पर
दोस्तों की मेहरबानी से जो मिलता –
वो कहाँ चला गया?

हम दुनिया के किसी भी कोने में रहें,
लेकिन सच यह है कि –
हमने हकीकत में जीया और हकीकत में बड़े हुए।

कपड़ों में सिलवटें न आएँ,
रिश्तों में औपचारिकता रहे –
यह हमें कभी नहीं आया।

रोटी–सब्ज़ी के बिना डिब्बा हो सकता है –
यह हमें मालूम ही नहीं था।

हमने कभी अपनी किस्मत को दोष नहीं दिया।
आज भी हम सपनों में जीते हैं,
शायद वही सपने हमें जीने की ताक़त देते हैं।

हमारा जीवन वर्तमान से कभी तुलना नहीं कर सकता।

हम अच्छे हों या बुरे –
लेकिन हमारा भी एक “ज़माना” था…!

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