28/06/2026
नित जीवन के संघर्षों से,
जब टूट चुका हो अन्तर्मन;
तब सुख के मिले
समन्दर का,
*रह जाता कोई अर्थ नहीं।*
जब फसल सूख कर
जल के बिन,
तिनका-तिनका बन
गिर जाये;
फिर होने वाली वर्षा का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
सम्बन्ध कोई भी हो लेकिन,
यदि दुःख में साथ न दें अपना;
फिर सुख में उन सम्बन्धों का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
छोटी-छोटी खुशियों के क्षण,
निकले जाते हैं रोज़ जहाँ;
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
मन कटुवाणी से आहत हो,
भीतर तक छलनी हो जाये;
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
सुख-साधन चाहे जितने हों,
पर काया रोगों का घर हो;
फिर उन अगनित सुविधाओं का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
रामधारी सिंह *"दिनकर"*