19/07/2026
ऐसे लौटा हूॅं मैं उसकी चौखट से ।
जैसे कोई प्यासा लौटे पनघट से।
सच कैसा दिखता है, ये उनसे पूछो,
लोग अभी जो लौट के आए मरघट से।
चाॅंद जटाओं में जो खोंसे बैठे हैं,
गंगा जी निकली हैं उनकी ही लट से।
उम्मीदों की मतपेटी खुलने को है,
ऊॅंट न जाने बैठेगा किस करवट से।
साथ में रहने की ख़्वाहिश भी जागेगी
आजिज़ आ जायेंगे जब वो खटपट से।
अब उन पर दस्तक देना बेमानी है,
जो दरवाज़े खुल जाते थे आहट से।
© अभिषेक अग्निहोत्री