Rupam selfvoice

Rupam selfvoice Hindi kahaniyan

02/03/2025

वसीयत!!

01/03/2025

ऑर्डरवली बहु!!

25/02/2025

22/02/2025

बहू तुम्हारी सास हूं नौकरानी नहीं!!!

20/02/2025

प्यारा ससुराल

18/02/2025

अतीत!!

16/02/2025

नियति!!

15/02/2025

धोखे की सजा!!

10/02/2025

हिम्मत!! Dil Ko chhu lene wali kahani!! Hindi kahaniyan

" बहू.., मैं सोच रही हूँ कि हमें वृद्धाश्रम चले ही जाना चाहिये।तुम्हें सुकून मिल जाएगा और हमें....।" गैस पर चढ़ा कढ़ी के...
17/10/2024

" बहू.., मैं सोच रही हूँ कि हमें वृद्धाश्रम
चले ही जाना चाहिये।तुम्हें सुकून मिल
जाएगा और हमें....।" गैस पर चढ़ा
कढ़ी के भगोने में कलछी हिलाते हुए
जानकी जी ने अपनी बहू आशी से कहा
तो वह छहचकित हो गयी।चेहरे पर
भाव ऐसे आ गये जैसे किसी ने उसे
काले पानी की सज़ा सुना दी हो।
जानकी जी दो बेटे थें।उनके पति एक
कस्बे के सरकारी स्कूल में हैडमास्टर
थें।उन्होंने अपने बच्चों को शिक्षा के
साथ-साथ अच्छे संस्कार देने की भी
पूरी कोशिश की थी लेकिन शहर की
हवा कहे अथवा समय का प्रभाव....,
दोनों बेटों ने शिक्षा तो ग्रहण किया
लेकिन संस्कार...। खैर, बड़ा बेटा
आदित्य कनाडा पढ़ने गया तो फिर
लौटा नहीं।पलटकर ये भी नहीं देखा
कि उसे कनाडा तक पहुँचाने के लिये
उसके पिता ने किस-किस से ऋण लिया
और वह चुकता हुआ भी या नहीं।छोटा
आशीष ने भी ऐसा ही कुछ कहने के लिए
मुँह खोलना चाहा लेकिन जानकी जी के
पति श्रीकांत बाबू बेटे की मंशा पहले ही
भाँप गये थें, सो उन्होंने हाथ खड़े कर दिए
और कहा कि भारत में कहीं भी पढ़ लो
लेकिन विदेश के लिये मेरा बजट नहीं है।
फिर आशीष ने मुंबई से एमबीए किया
और वहीं की एक मल्टीनेशनल कंपनी में
उसे नौकरी भी मिल गई।छह महीने में
एक बार अपने माँ-बाप मिलने आ जाता
था तो उनके कलेज़े को ठंडक मिल जाती
थी।एक दिन उसने फ़ोन करके बताया
कि अपने साथ काम करने वाली आशी
नाम की लड़की के साथ वो कोर्ट मैरिज़
कर रहा है।मैं टिकट भेज रहा हूँ, आप
लोग आ जाइयेगा। पाल-पोसकर जिस
बेटे को माँ-बाप बड़ा करते हैं, उसके मुख
से ऐसे वचन सुनकर किसका कलेजा
छलनी ना होगा।शांत स्वभाव वाले श्रीकांत
बाबू भी उस दिन गुस्से-से बोल पड़े थे,"
ऐसे औलादों से तो हम बेऔलाद ही अच्छे
थें।

" बहु डिलीवरी के लिए अपनी बहन को बुला लो। मेघा तो नहीं आ पाएगी। और मुझसे अकेले होगा नहीं। आखिर मेघाभी ससुराल वाली है। उस...
30/09/2024

" बहु डिलीवरी के लिए अपनी बहन को बुला लो। मेघा तो नहीं आ पाएगी। और मुझसे अकेले होगा नहीं। आखिर मेघा
भी ससुराल वाली है। उसके ससुराल वाले भेजे तो भेजे, नहीं तो नहीं भेजें" शोभा जी अपनी बहू नमिता से बोली। " पर मम्मी जी अगले महीने तो उसकी परीक्षा है। वो परीक्षा की तैयारी करेगी या मेरी सेवा करेगी"
नमिता ने कहा। " अब बहू तू खुद देख ले। मुझसे तो होगा नहीं। या फिर तु अपने मायके चली जा" " मम्मी जी मायके में कौन करेगा? मेरी मम्मी होती तो फिर इतनी परेशानी ही क्यों होती?" नमिता ने धीरे से कहा।
" तो फिर अपनी बहन को ही बुला ले। उसे कौन सा पढ़ लिखकर बैरिस्टर बनना है। आकर कुछ दिनों के लिए संभाल जाएगी" "मम्मी जी इन्होंने कहा भी तो था कि कामवाली रख लेंगे" नमिता ने कहा। "ना बाबा ना, मैं अपने घर को कामवाली के भरोसे नहीं छोड़ सकती। और फिर उसकी निगरानी कौन करेगा। तू तो बस तेरी बहन को बुला ले" " मम्मी अगले महीने से तो तनु की परीक्षा है। वो भला यहां कैसे आएगी। और फिर उसे तैयारी भी तो करनी है" अचानक समीर ने कमरे में आते हुए कहा।
" अरे तो अपनी बहन को संभालते हुए पढ़ भी लेगी। कौन सा इतना काम करना है उसे। भला काम ही क्या है हमारे घर में" " अपना घर तो अपना घर ही होता है मम्मी। इंसान अपने घर में आराम से और बेफिक्री से पढ़ सकता है, वो किसी और के घर पर नहीं हो पाता। नहीं नहीं तनु की पढ़ाई का नुकसान होगा। मैं एक काम करता हूं। मैं मेघा दीदी के ससुराल बात कर लेता हूं। मुझे यकीन है कि उनके सास ससुर उन्हें जरूर भेज देंगे"
" रहने दे। उसके सास ससुर तो भेजने को तैयार है। पर मेघा पंद्रह दिन के लिए हिल स्टेशन पर घूमने जा रही है, इसलिए नहीं आ पाएगी" अचानक शोभा जी ने कहा तो कमरे में खामोशी सी छा गई। दोनों को इतना चुप देखकर शोभा जी ने फिर कहा,
" अरे इसमें इतनी हैरानी की क्या बात है। बड़ी मुश्किल से उसके घूमने का प्रोग्राम बना है इसलिए मैंने ही उसे आने से मना कर दिया" " पर जीजा जी ने तो पहले कहा था कि वो मेघा दीदी को नमिता की डिलीवरी के समय यहां पर भेज देंगे। फिर अचानक कैसे प्रोग्राम बना दिया"
" तेरे जीजा जी नहीं जा रहे हैं। वो तो अपनी ननद और जेठानी के परिवार के साथ जा रही है"
" पर, ऐसे कैसे?" समीर ने धीरे से कहा। " ऐसे कैसे से क्या मतलब है? मेघा के भरोसे तो डिलीवरी नहीं हो रही है ना। बड़ी मुश्किल से उसका घूमने का प्रोग्राम बना है। मैं उसे मना नहीं करूंगी। कुछ दिनों की तो बात है। बुला लो तनु को। बाद में तो मेघा आ ही जाएगी" समीर ने नमिता की तरफ देखा तो नमिता ने भी फिर तनु को बुलाने के लिए कहा, " आप तनु को ही बुला लीजिए। आखिर पंद्रह बीस दिन बाद तो मेघा दीदी आ ही जाएगी" नमिता ने उसके बाद तनु को फोन कर दिया और उसे अपने पास बुला लिया। तनु भी खुशी खुशी नमिता के पास आ गई। आखिर नमिता को पूरा टाइम चल रहा था। डिलीवरी कभी भी हो सकती थी। तनु के आने के दो दिन बाद ही नमिता ने एक बेटे को जन्म दिया।
अस्पताल में तो समीर और शोभा जी ने जैसे तैसे संभाला। लेकिन जैसे ही नमिता को घर पर लेकर आए, उसके बाद सारी जिम्मेदारी शोभा जी ने तनु पर डाल दी। घर के काम तो फिर भी ठीक थे लेकिन नवजात बच्चे और नमिता को कैसे संभाले। शोभा जी तो रात को अपने कमरे में जाकर सो जाती और तनु को नमिता की जिम्मेदारी दे देती। तनु को भी कोई चीज समझ में नहीं आती। आखिर एक कॉलेज में पढ़ने वाली लड़की कितना क्या ध्यान रख लेती। जैसे नमिता कहती वैसे वो कर देती थी। समीर ने दो दिन तक ये सब देखा। उसके बाद उसने एक काम वाली रख ही ली। कामवाली नमिता और उसके बच्चे का काम कर जाती। उनकी मालिश करना,नहलाना, उनके कपड़े धोना सारा काम कामवाली करके जाती। इस पर भी शोभा जी को समस्या थी।
" क्या जरूरत थी तुझे कामवाली रखने की‌। अगर मेघा आती तब तो कामवाली नहीं रखता। अपनी साली के लिए तो कामवाली रख ली" " मम्मी मेघा दीदी के दो बच्चे हो चुके हैं। उन्हें अच्छे से पता है कि इस समय एक औरत को क्या जरूरत होती है। और बच्चे कैसे संभाले जाते हैं‌। तनु से आप क्या उम्मीद करते हो। आपने तो सारा काम तनु पर डाल दिया। तो फिर मैं क्या करता" लेकिन शोभा जी को तो जैसे चैन ही नहीं था। वो तो तनु के पीछे हाथ धोकर पड़ चुकी थी। घर के सारे काम करने के बाद जब तनु पढ़ने बैठती तो उसे कोई ना कोई काम बता ही देती। ये सब नमिता को भी समझ में आ रहा था। पर वो अभी कुछ नहीं कर सकती थी।
तनु के हर काम से उन्हें समस्या थी। " अरे पता नहीं अपनी मम्मी के जाने के बाद घर कैसे संभालती होगी। इसे तो कुछ भी नहीं आता है। ना ही ढ़ंग का
खाना बनाना आता है, और ना ही घर के काम" कई बार तो ये सब वो तनु के मुंह पर बोल चुकी थी। पर तनु चुप ही रहती। आखिर दीदी का ससुराल था। ज्यादा कुछ कह भी नहीं सकते थे। जैसे तैसे कर बीस दिन निकले। मेघा अपने मायके आ गई। समीर ने तनु को घर छोड़कर आने के लिए कहा तो शोभा जी ने कहा," अरे दो दिन बाद तो नहावन है ही। तब इसके पापा आएंगे ही अपने नाती और बेटी के कपड़े लेकर। उस समय इसे लेते जाएंगे। क्यों बेवजह जाने का खर्चा कर रहा है"
" हां भाई, तनु दो दिन बाद चली जाएगी। वैसे मैं भी बहुत थकी हुई हूं। पहाड़ों की चढ़ाई चढ़कर हाथ पैर ही दुख रहे हैं। अभी तनु संभाल तो रही है। एक-दो दिन मुझे भी आराम मिल जाएगा। फिर तो भाभी की सेवा में ही लगना है" मेघा ने कहा। " ठीक है मम्मी, पर तनु के लिए कुछ ढंग का गिफ्ट ले आना। आखिर यहां से खाली हाथ थोड़ी ना जाएगी। या फिर बाजार जाकर उसे आप खुद ही दिलवा कर ले आओ। वो अपनी पसंद का ही कुछ ले आएगी" समीर ने कहा। " अरे उसे क्या देना है? पांच सौ रूपए दे देना और विदा कर देना" शोभा जी ने कहा। " मम्मी कैसी बातें कर रही हो? आखिर तनु नमिता की छोटी बहन है। ऊपर से उसने इतने दिन से काफी हद तक काम संभाल लिया। आखिर वो भी नेग की हकदार है" " देख समीर, अपने यहां तो रिवाज नहीं है बहू के मायके वालों को नेग देने का। तेरी इतनी ही इच्छा है तो ज्यादा से ज्यादा एक सूट और ₹500 दे देना। इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं देने दूंगी" शोभा जी तुनकते हुए बोली। " और जरा अपने ससुर जी को समझा देना कि नेग में क्या-क्या लगेगा। नहावन के दिन वो सारा सामान लेकर के आए। और कह देना कि मेरी और मेघा की साड़ी थोड़ी ढंग की लेकर आए। मैं हल्की-फुल्की साड़ी नहीं पहनूंगी और ना हीं मेरी बेटी पहनेगी"
खैर, नहावन का दिन भी आ गया। नमिता के पापा जब आए तो अपने साथ नाती और अपनी बेटी के साथ साथ घर के
सभी सदस्यों के लिए कपड़े और शगुन के लिफाफे लेकर आए थे।
जब नमिता के पापा जाने लगे तो तनु भी उनके साथ रवाना होने लगी। उसी समय शोभा जी ने एक सूट और ₹500 का
लिफाफा उसे पकड़ाते हुए कहा,
" ये हमारी तरफ से तुम्हारा नेग। आखिर तुमने इतने दिन अपनी बहन की सेवा जो की है। उसका तो ये प्रतिफल बनता ही है"
लेकिन तभी समीर वहां आ गया और उसने एक और लिफाफा तनु के हाथ में पकड़ा दिया। और कहा," ये मेरे और नमिता की तरफ से तुम्हारे लिए। तुम्हें जो खरीदना है, अपनी पसंद का खरीद लेना" ये देखकर शोभा जी गुस्सा हो गई। लेकिन उस समय उन्होंने कुछ नहीं कहा। तनु अपने पापा के साथ रवाना हो गई। उनके जाते ही शोभा जी ने कहा, " समीर यह क्या हरकत है? जब मैंने तनु को विदाई दे दी थी तो तुझे अलग लिफाफा देने की क्या जरूरत थी" " मम्मी इसमें गलत क्या है? आखिर वो भी तो नेग की हकदार है। अपनी पढ़ाई लिखाई छोड़कर वो यहां अपनी बहन की सेवा करने आ गई, वही बड़ी बात है। उसके बदले अगर हमने खुश होकर उसे थोड़ा बहुत दे दिया तो क्या हर्ज है" " पर हमारे यहां बहू की बहन को नेग देने का रिवाज नहीं है। ये क्या उल्टी गंगा बहा रहा है" अब की बार मेघा ने कहा। " क्यों दीदी? जब जरूरत थी तब बहू की छोटी बहन को बुला लो। और नेग देने के नाम पर रिवाज नहीं है। भला ये क्या बात हुई। नेग का असल हालदार तो वही होना चाहिए जो असल में काम कर रहा है। सिर्फ रिश्ते नाते से नेग के हकदार नहीं बन जाते। उसके मायके वालों से तो नेग लेने के लिए आप लोग तैयार हो गए। लेकिन जब काम की बात थी तो पीछे हट गए। मम्मी दीदी की डिलीवरी के समय तो आपने भाग भाग कर काम किया था। फिर बहू के डिलीवरी के समय क्या हो गया। बुरा मत मानना मम्मी। लेकिन अभी जो व्यवहार आप बहू के साथ करोगी, वही उसे जिंदगी भर याद रहने वाला है। क्योंकि अपने डिलीवरी के समय को कोई औरत नहीं भूलती"समीर ने कहा तो शोभा जी आगे कुछ कह नहीं पाई। आखिर बोल भी क्या सकती थी। समीर गलत तो नहीं कह रहा था। इसलिए अपने आप ही सब चुप हो गए, क्योंकि आज सही वक्त पर सही जवाब दे दिया गया था।

"क्या बताऊँ मम्मी, आजकल तो बासी कढ़ी में भी उबाल आया हुआ है| जबसे पापा जी रिटायर हुए हैं दोनों लोग फिल्मी हीरो हीरोइन की ...
13/09/2024

"क्या बताऊँ मम्मी, आजकल तो बासी कढ़ी में भी उबाल आया हुआ है| जबसे पापा जी रिटायर हुए हैं दोनों लोग फिल्मी हीरो हीरोइन की तरह दिन भर अपने बगीचे में ही झूले पर विराजमान रहते हैं| न अपने बालों की सफेदी का लिहाज है न बहू बेटे का, इस उम्र में दोनों मेरी और नवीन की बराबरी कर रहे हैं|"
तब तक चाय पीने के लिये सोनम को पूछने प्रभाजी उसके कमरे की तरफ बढ़ीं पर उदास मन से रसोई में दाखिल हुईं| उन्होंने सुन सब लिया था पर नज़रअंदाज़ करते हुए खामोशी से चाय बनाकर ले गयीं और सोनम को भी उसी के कमरे में दे दी|
उन्हें अशोक जी के लिए चाय ले जाते देख, उनकी बहू सोनम के चेहरे पर व्यंगात्मक मुस्कान तैर गयी| पर वह नज़र अंदाज़ कर सिर झुकाए निकल गईं| पति के रिटायर होने के बाद कुछ दिन से उनकी यही दिनचर्या हो गयी थी|
अशोक जी की इच्छानुसार अच्छे से तैयार होकर अपने घर के सबसे खूबसूरत हिस्से अपने पेड़ पौधों के साथ बैठना| क्योंकि सारी उम्र तो उनकी बच्चों के लिये जीने में निकल गयी थी|
तो जीवन सन्ध्या में दोनों लोग साथ समय भी गुजारते वहाँ पड़ी मेज चार कुर्सी उस भाग को और मोहक बना देतीं और दिन भर के बहुत से कार्य वहाँ आसानी ने निपट जाते|

पाण्डेय विला...दोमंजिला कोठीनुमा घर अशोक और प्रभा का जीवन भर का सपना था, बड़ा खूबसूरत लगता देखने में उस पर वातावरण भी बेहद सुरम्य |
बीस बाई बीस गज़ की कच्ची जगह भी थी उस घर में, बाहर जहाँ था प्रभा के सपनोँ का बगीचा| बेला के पौधे, हरसिंगार का घनेरा पेड़,अंगारो सा दहकता गुड़हल का पेड़ और छोटा सा टैंक जिसमें कमल के फूल खिले रहते|
जाड़े में तो रँग बिरंगे फूल डहेलिया, गुलाब, पैंजी और तमाम किचन गार्डन की सब्जियां चार चाँद लगा देतीं देखने वाले की आँखों में और रसोईघर में भी ताज़े धनिया, पोदीना मेंथी की बहार रहती|
हर मौसम में घर खुशबू और सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर रहता,उस पर वहाँ पड़ा झूला जो भी वहाँ बैठ जाता तो उठने की इच्छा ही न होती उसकी|
जाड़ों में वहीँ तसले में आग जलती और भुने आलू,शकरकन्द के मज़े लिये जाते तो बरसात में सुलगते कोयलों पर सिंकते भुट्टे स्वर्ग के आनन्द की अनुभूति करवाते|
अशोक जी ने वह जगह छुड़वाई तो प्रभा और अपने लिये कमरे के लिये | लेकिन संयोग ऐसा बना कि ज़िम्मेदारी ने उन्हें उस जगह का इस्तेमाल ही न करने दिया|
ऐसे में प्रभा ने अपने खाली समय और उस ख़ाली जगह का इस्तेमाल इस बुद्धिमत्ता से किया कि वह कोना घर की जान बन गया| उनका पूरा खाली समय वहीँ बीत जाता| अब उन्हें उस जगह कमरा न बन पाने का मलाल भी न था|
पर प्रभा को अरमान था घर में झूला हो तो अशोक जी ने उसे वहाँ ज़रूर लगवा दिया| पेड़ों से लगाव कुछ ऐसा हो गया कि फिर दोनों में से किसी की इच्छा उनके स्थान पर कमरा बनवाने की हुई ही नहीँ|

पर वह और अशोक कभी एक साथ उस जगह कम ही बैठ पाते,कभी प्रभा अनमनी होतीं तो अशोक बड़े ज़िंदादिल शब्दों में कहते, "पार्टनर रिटायरमेंट के बाद दोनों इसी झूले पर साथ बैठेंगे और खाना भी साथ में ही खायेंगे| हर शिकायत दूर कर देँगे| फ़िलहाल हमें बच्चों के लिये जीना है|
बच्चों के कैरियर पर सब कुछ बलिदान हो गया,अब बेटा भी अच्छी नौकरी में था और बेटी भी अपने घर की हो चुकी थी |
रिटायरमेंट के बाद घर में थोड़ी रौनक रहने लगी थी,अशोक जी को भी घर में रहना अच्छा लग रहा था| बड़े पद पर थे तो कभी उनके कदम घर में टिके ही नहीँ|
गाँव से आकर शहर में बसेरा बनाना आसान न था, लेकिन किसी तरह चार सौ गज़ ज़मीन कर ली| सहधर्मिणी प्रभा जी भी सहयोगी महिला थीं तो मन्ज़िल और आसान हो गयी|
अब दोनों पति पत्नी आराम के पलों को सँजो लेना चाहते थे उनके घर में ज़रूरी सब सुविधाएं भी थीँ फिर भी बहू सोनम को न जाने क्योँ वह कोना सबसे ज़्यादा खटकता था|
क्योंकि कोई भी बन्धन न होने पर भी अशोक जी के घर में रहने से उसे घर का काम बढ़ा महसूस होता| दिन भर उसके साथ लगी रहने वाली प्रभा का अब थोड़ा समय अपने पति को देना उसे अखरने लगा था|
अक्सर वह नवीन को उसके माता पिता के लिये ताने देने का कोई मौका न छोड़ती| उसने उस कोने से छुटकारा पाने के लिये नवीन को एक रास्ता सुझाते हुए कहा,"क्योँ न हम बड़ी कार खरीद लें...नवीन"|
"आईडिया तो अच्छा है पर रखेंगे कहाँ एक कार रखने की ही तो जगह है घर में",नवीन थोड़ा चिंतित स्वर में बोला|

"जगह तो है न, वो गार्डन तुम्हारा..जहाँ आजकल दोनों लव बर्ड्स बैठते हैं"सोनम थोड़े तीखे स्वर में बोली|
थोड़ा तमीज़ से बात करो,नवीन क्रोध से बोला ज़रूर पर उसने भी अशोक जी से बात करने का मन बना लिया था|
अगले दिन वह कुछ कार की तस्वीरों के साथ शाम को अपने पिता के पास गया और बोला," पापा !मैं और सोनम एक बड़ी गाड़ी खरीदना चाहते हैं| "
पर बेटा बड़ी गाड़ी तो घर में पहले ही है, फिर उसे रखेंगे भी कहाँ?अशोक जी ने प्रश्न किया|
ये जो बगीचा है यहीँ गैराज बनवा लेंगे वैसे भी सोनम से तो इनकी देखभाल होने से रही और मम्मी कब तक करेंगी? इन पेड़ों को कटवाना ही ठीक रहेगा| वैसे भी ये सब जड़े मज़बूत कर घर की दीवारें कमज़ोर कर रहें है|
प्रभा तो वहीँ कुर्सी पर सीना पकड़ कर बैठ गईं,अशोक जी ने क्रोध को काबू में करते हुए कहा, मुझे तुम्हारी माँ से भी बात करके थोड़ा सोचने का मौका दो|
क्या पापा... मम्मी से क्या पूछना ..वैसे भी इस जगह का इस्तेमाल भी क्या है नवीन थोड़ा चिड़चिड़ा कर बोला|
"आप दोनों दिन भर इस जगह बगैर कुछ सोचे समझे,चार लोगों का लिहाज किये बग़ैर साथ बैठे रहते हैं| कोई बच्चे तो हैं नहीं आप दोनों और अब घर में सोनम भी है छोटे बच्चे भी है |
पर आप दोनों ने दिन भर झूले पर साथ बैठे रहने का रिवाज बना लिया है और ये भी नहीँ सोचते कि चार लोग क्या कहेंगे|
इस उम्र में मम्मी के साथ बैठने की बजाय अपनी उम्र के लोगों में उठा बैठी करेंगे तो वो ज़्यादा अच्छा लगेगा न कि ये सब और वह दनदनाते हुए अंदर चला गया|

अंदर सोनम की बड़बड़ाहट भी ज़ारी थी,अशोक जी भी एहसास कर रहे थे प्रभा के साथ अपनी ज़्यादती का| जब कभी पत्नी ने अपने मन की कही तो उन्होंने उन्हें ही सामन्जस्य बिठाने की सीख दी|
पर आज की बात से तो उनके साथ प्रभा जी भी सन्न रह गईं,अपने बेटे के मुँह से ऐसी बातें सुनकर|
रिटायरमेंट को अभी कुछ ही समय हुआ था उनके, ज़िन्दगी तो भागमभाग में ही निकल गयी थी बच्चों के लिए सुख साधन जुटाने में|
नवीन और सोनम ने उस शाम खाना बाहर से ऑर्डर कर दिया पर प्रभा से न खाना खाया गया और न उन्हें नींद आयी| नींद तो अशोक को भी नहीँ आ रही थी और वो प्रभा की मनोस्थिति भी समझ रहे थे |
किसी ट्रैफिक सिग्नल पर खड़े सिपाही जैसी जिससे हर रिश्ता बस अपनी ही तवज्जोह चाह रहा था| पर सोचते सोचते सुबह, कुछ सोचकर उनके होंठों पर मुस्कान तैर गयी|
अगले दिन जब सोकर वह उठे तो देखा प्रभा जी सो रहीं थी पर बेचैनी चेहरे पर दिख रही थी| वह रसोई में गये और खुद चाय बनाई | कमरे में आकर पहला कप प्रभा को उठा कर पकड़ाया और दूसरा खुद पीने लगे|
आपने क्या सोचा?प्रभा ने रोआंसे लहज़े में पूछा|
मैं सब ठीक कर दूँगा बस तुम धीरज रखो,अशोक बोले|
पर हद से ज़्यादा निराश प्रभा उस दिन पौधों में पानी देने भी न निकलीं,और न ही किसी से कोई बात की|
दिन भर सब सामान्य रहा,लेकिन शाम को अपने घर के बाहर To Let का बोर्ड टँगा देख नवीन ने भौंचक्के स्वर में अशोक से प्रश्न किया,"पापा माना कि घर बड़ा है पर ये To Let का बोर्ड किसलिए"?

" अगले महीने मेरे स्टाफ के मिस्टर गुप्ता रिटायर हो रहें है,तो वो इसी घर में रहेँगे",उन्होंने शान्ति पूर्ण तरीके से उत्तर दिया| हैरान नवीन बोला,"पर कहाँ?"
"तुम्हारे पोर्शन में",अशोक जी ने सामान्य स्वर में उत्तर दिया|
नवीन का स्वर अब हकलाने लगा था,"और हम लोग "
"तुम्हे इस लायक बना दिया है दो तीन महीने में कोई फ्लैट देख लेना या कम्पनी के फ्लैट में रह लेना,अपनी उम्र के लोगों के साथ | "अशोक एक- एक शब्द चबाते हुए बोले|
हम दोनों भी अपनी उम्र के लोगों में उठे बैठेंगे,सारी उम्र तुम्हारी माँ की सबका लिहाज़ करने में निकल गयी| कभी बुजुर्ग तो कभी बच्चे| अब लिहाज़ की सीख तुम सबसे लेना बाकी रह गया था|
"पापा मेरा वो मतलब नहीँ था",नवीन सिर झुकाकर बोला|
नहीँ बेटा तुम्हारी पीढ़ी ने हमें भी प्रैक्टिकल बनने का सबक दे दिया,जब हम तुम दोनों को साथ देखकर खुश हो सकते है तो तुम लोगों को हम लोगों से दिक्कत क्योँ है| "?
इस मकान को घर तुम्हारी माँ ने बनाया, ये पेड़ और इनके फूल तुम्हारे लिए माँगी गयी न जाने कितनी मनौतियों के साक्षी हैं,तो उसका कोना मैं किसी को छीनने का अधिकार नहीं दूँगा|
पापा आप तो सीरियस हो गये, नवीन के स्वर अब नम्र हो चले थे|
न बेटा... तुम्हारी मां ने जाने कितने कष्ट सहकर, कितने त्याग कर के मेरा साथ दिया आज इसी के सहयोग से मेरे सिर पर कोई कर्ज़ नहीँ है| इसलिये सिर्फ ये कोना ही नहीं पूरा घर तुम्हारी माँ का ऋणी है| घर तुम दोनों से पहले उसका है, क्योंकि जीभ पहले आती है, न कि दाँत|

औलाद होने का हमसे लाभ उठाओ पर जब मंदिर में ईश्वर जोड़े में अच्छा लगता है तो मां बाप साथ में बुरे क्योँ लगते हैं? ज़िन्दगी हमें भी तो एक ही बार मिली है|

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