19/09/2024
सविता देवी एक शांत, पर अनुभवी गृहिणी थीं। उनके बेटे राहुल और बहू अंजली का विवाह हुए कुछ ही समय बीता था। अंजली अपने ससुराल में धीरे-धीरे खुद को ढाल रही थी, लेकिन सास-बहू के बीच कुछ छोटी-मोटी बातें थीं जो अक्सर अनबन का कारण बन जाती थीं।
एक दिन सुबह के वक्त, सविता देवी ने देखा कि अंजली कमरे में एसी चलाकर बाहर निकल गई थी। उन्होंने अंजलि को बुलाया और बोलीं, “अंजली, तुमने कमरे में एसी चलती छोड़ दी है। क्या तुम्हें पता नहीं है कि इसका कितना बिल आएगा? अगर तुम्हें खुद बिल भरना पड़ता, तो तुम ऐसा नहीं करती।”
अंजली थोड़ी असहज हो गई, लेकिन शांत रही। वह तुरंत कमरे में गई और एसी बंद कर दी। राहुल को लगा कि माँ की बातों से अंजली का मन खट्टा न हो जाए, इसलिए वह भी कमरे में गया और बोला, “अंजली, माँ की बातों का बुरा मत मानना।”
अंजली ने मुस्कुराते हुए कहा, “बुरा मानने वाली कौन सी बात है? मेरे मायके में भी मम्मी ऐसी ही बातें कहती थीं। पापा बिल भरते थे, तो हम भी लापरवाही कर लेते थे। यहाँ भी वही हुआ। माँ की चिंता जायज है, और गलती हमारी है कि हमने ध्यान नहीं दिया, अगर मैं एसी बन्द कर देती तो उनको बोलने का मौका ही नही मिलता”
राहुल को यह सुनकर खुशी हुई कि उसकी पत्नी कितनी समझदार और व्यावहारिक है। उसे लगा कि उसकी शादी सही और समझदार लड़की से हुई है।
सविता देवी ने भी बहू की बातों को सुन लिया था, और उनके दिल में कहीं न कहीं यह चिंता थी कि अंजली उनके बेटे से उनके खिलाफ कुछ कह न दे। लेकिन जब उन्होंने अंजली के विचार सुने, तो उन्हें भी संतोष हुआ कि उनकी बहू समझदार है।
कुछ दिनों बाद, एक और घटना घटी। सविता देवी फोन पर किसी रिश्तेदार से बात कर रही थीं। खाना ठंडा हो रहा था, और उन्हें दवाइयाँ भी लेनी थीं। अंजली ने यह देखा, तो उसने चुपचाप जाकर सविता देवी के हाथ से फोन ले लिया और प्यार से बोली, “मम्मी, पहले खाना खा लीजिए और दवाइयाँ ले लीजिए, फिर आराम से बात कर लेना।”
सविता देवी का चेहरा अचानक बदल गया। उन्होंने घूरते हुए कहा, “बहू हो तो बहू बनकर रहो। मेरी सास बनने की कोशिश मत करना। तुम मेरी माँ बनने की ज़रूरत नहीं। आइंदा ऐसी गलती मत करना।”
अंजली की आँखों में आँसू आ गए। वह चुपचाप रसोई में चली गई। थोड़ी देर बाद, सविता देवी को अंजली की बातें सुनाई दीं। वह अपनी माँ से फोन पर बात कर रही थी, “माँ, मैंने सासू माँ को भी आपकी तरह ही माँ माना है। मैं तो उनकी सेहत का ख्याल रखना चाहती थी। पर उन्होंने मुझे बहुत जोर से डांट दिया। माँ, मुझे समझ में आ गया है कि चाहे जितनी भी कोशिश कर लूँ, सास-ससुर शायद कभी बहू को बेटी की तरह नहीं मानते।"
उसकी बातें सुनकर सविता देवी का दिल पिघल गया। उन्होंने महसूस किया कि अंजली का कोई बुरा इरादा नहीं था। वह तो सिर्फ अपनी माँ की तरह उनका ख्याल रख रही थी। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।
सविता देवी ने धीरे-धीरे कमरे में जाकर अंजली को गले से लगा लिया और कहा, “बेटा, मैं बहुत सख्त रही हूँ, मुझसे गलती हो गई। आज से तुम ही मेरी दवाइयों का ध्यान रखा करना, और अगर मैं समय पर दवाइयाँ न लूँ, तो मुझे वैसे ही डांट लगा देना जैसे अपनी माँ को लगाती थी। इस घर की ज़िम्मेदारी अब तुम्हारे हाथों में है, और मैं हर कदम पर तुम्हारे साथ हूँ।”
अंजली की आँखों में आँसू छलक पड़े, लेकिन यह आँसू खुशी के थे।
सविता देवी ने अपनी समझदारी से रिश्ते को बिखरने से पहले ही संभाल लिया। उन्होंने यह समझ लिया कि एक मजबूत परिवार बनाने के लिए दोनों तरफ से समझदारी और प्यार की जरूरत होती है। दोनों ने एक-दूसरे को अपना लिया और उनके बीच का रिश्ता और भी गहरा हो गया।
अगर कहानी अच्छी लगी हो तो प्लीज फॉलो कर दीजियेगा और मुझे अच्छा लगेगा और भी ऐसी कहानी आपके सामने प्रस्तुत करने में
आप सभी जा बहुत बहुत धन्यवाद..