Ayush Shows

Ayush Shows आप सभी दोस्तों को मेरा प्रोफाइल चेक करने की लिए धन्यवाद�

25/11/2025

ध्वज🚩 पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा॥
सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई॥

🚩सियावर रामचन्द्र की जय।🚩

23/11/2025

Recharge ka paisa vasool💥😛😋😛😋😛💥

20/05/2025

The art of cooking is the most ancient of all the arts, for Adam was born hungry
Pork Chops Katsu

23/09/2024
Super Star Singer Avirbhav👑
23/09/2024

Super Star Singer Avirbhav👑

19/09/2024

पूरे दो महीने बाद तनख्वाह मिला था।सोहन को पिछला महीना बहुत तंगी से निकला फिर भी घर में किसी को भनक तक नही लगने दी सबकी जरूरत का सामान समय पर ला कर दे दिया था।

अब जब तनख़्वाह मिली है तो माँ के एक साड़ी खरीद लेता हूँ, बच्चों के लिए मिठाई और सीमा को कुछ पैसे ही दे दूँगा,, ओ भी अपने मन का कर लेगी।यही सोचते हुए ऑफिस से निकला रास्ते मे बाजार से सामान लेकर घर को चल पड़ा ठंडी का मौसम समय से पहले ही शाम गहराने लगी थी।

घर के बाहर ही पुरानी शॉल ओढ़े माँ बैठी थी। अरे इतनी अंधेरे में येसे बाहर अकेली क्यूँ, बैठी हो ? कहते हुए मोटर साइकिल के बैग से सामान निकालने लगा। अंदर चलो माँ मै आपके लिए कुछ लाया हूँ। जो कुछ भी लाया है जा, जाकर दे अपनी जोरू को मुझे दो वक्त की रोटी दे रहा है वही बहूत है।

माँ एसी क्यूँ बोल रही हो कुछ हुआ है क्या फिर से तुम दोनों के बीच.. ना बेटा कुछ ना हुआ.... मै बोझ बन गई हूँ किसी काम की नही रही ना इसलिए!!!! मै तो लोक लिहाज के डर से इतना बर्दाश्त करती हूँ नही तो आज ही अपने रसोई अलग कर लूँ।

पर दुनियाँ क्या कहेगी यही कि इकलौते बेटे बहू का सुख भी बुढ़िया से देखी नही जा रही,,.. कहते कहते बुढ़िया रोने लगी..... अरे!!! माँ येसा क्या करती हो माँ सुनो तो आप समझने की कोशिश!!!!! हां अब तु भी मुझे ही समझाएगा तेरी जोरू तो बहुत समझदार हैं एक मै ही गवांर हूँ बुढ़िया और जादा बड़बड़ाने लगी।


बेचारे सोहन जो रास्ते भर सबको खुश देखने के लिए कल्पना की बड़ी बड़ी मीनारे बनाया था पल भर में ही धराशायी हो गया....... ।

जैसे ही सोहन कमरे मे आया, पत्नी भी क्यूँ पीछे रहती... देखो जी अभी के अभी फैसला करो कि आपको किसके साथ रहना है मै अब और तुम्हारी माँ की ज्यादती बर्दाश्त नही कर सकती,.... अरे सीमा ये क्या कह रही हो माँ हमारे साथ नही रहेगी तो कहाँ जाएगी? हां तुम्हारी माँ कहाँ जाएगी..!!! मैं ही पराए घर से आई हूँ मुझे ही जाना पड़ेगा मै हूँ ही कौन??सीमा का गुस्सा सातवें आसमान पर था।

अरे मैंने येसा तो नही कहा,.. सोहन हताश होकर बोला। जब परिवार संभालने की हिम्मत नहीं थी तो शादी ही क्यूँ की???बने रहते श्रवण कुमार....

हां मुझसे गलती हो गयी मेरी माँ!! कहकर हाथ जोड़ते हुए सोहन कमरे से बाहर निकल कर... घर की छत पर टहलने लगा...... सोचने लगा ये औरते भी कमाल होती है।. माँ अपने बच्चे के लिए, और पत्नी अपने पति के लिए कितना, भूख प्यास बर्दाश्त करती है।व्रत, उपवास दुनियाँ भर के नियम धीयम पालती हैं अपने पति और बच्चों के लिए मंदिर मंदिर देव पूजती है, बड़ा से बड़ा कष्ट सह लेती है, ये कैसा अनोखा प्यार है इन दोनों का!!!!!
पर बस दो बातें बर्दाश्त नही कर सकती, सास अपनी बहू का और बहू अपनी सास की बात बर्दाश्त कर ले बस फ़िर तो, घर में ख़ुशहाली आने से कोई नही रोक सकता,.... महिलाएँ देश की आधी आबादी हैं थोड़ी सहन शक्ति आ जाए तो घर, समाज और देश की शक्ल ही बदल जाए.. सोहन अपने आप ही बड़बड़ा पड़ता है..... हमेशा औरतें ही बेचारी नही होती......... माँ और पत्नी के बीच सामंजस्य ना बैठा पाने वाला मुझ जैसा पुरुष भी "बेचारा" होता है।

19/09/2024

*निवाला*

बड़ी बेचैनी से रात कटी। बमुश्किल सुबह थोड़ा दाल चावल खाकर, घर से अपने शोरूम के लिए निकला। आज किसी के पेट पर पहली बार लात मारने जा रहा हूँ। ये बात अंदर ही अंदर कचोट रही है।

ज़िंदगी में यही फ़लसफ़ा रहा मेरा कि, अपने आस पास किसी को, रोटी के लिए तरसना ना पड़े। पर इस विकट काल मे अपने पेट पर ही आन पड़ी है।

दो साल पहले ही अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर कपड़े का शोरूम खोला था। मगर दुकान के सामान की बिक्री, अब आधी हो गई है। अपने कपड़े के शोरूम में, दो लड़के और दो लड़कियों को रखा है मैंने। ग्राहकों को कपड़े दिखाने के लिए। लेडीज डिपार्टमेंट की दोनों लड़कियों को निकाल नहीं सकता। एक तो कपड़ो की बिक्री उन्हीं की ज्यादा है।

दूसरे वो दोनों बहुत गरीब हैं। दो लड़कों में से एक पुराना है, और वो घर में इकलौता कमाने वाला है। जो नया वाला लड़का है दीपक, मैंने विचार उसी पर किया है। शायद उसका एक भाई भी है, जो अच्छी जगह नौकरी करता है। और वो खुद, तेजतर्रार और हँसमुख भी है। उसे कहीं और भी काम मिल सकता है। इन सात महीनों में, मैं बिलकुल टूट चुका हूँ। स्थिति को देखते हुए एक वर्कर कम करना मेरी मजबूरी है। यही सब सोचता दुकान पर पहुंचा।

चारो आ चुके थे। मैंने चारो को बुलाया और बड़ी उदास हो बोल पड़ा..
"देखो, दुकान की अभी की स्थिति तुम सब को पता है, मैं तुम सब को काम पर नहीं रख सकता"

उन चारों के माथे पर चिंता की लकीरें, मेरी बातों के साथ गहरी होती चली गईं। मैंने बोतल के पानी से अपने गले को तर किया
"किसी एक का..हिसाब आज.. कर देता हूँ!दीपक तुम्हें कहीं और काम ढूंढना होगा"
"जी अंकल" उसे पहली बार इतना उदास देखा। बाकियों के चेहरे पर भी कोई खास प्रसन्नता नहीं थी। एक लड़की जो शायद उसी के मोहल्ले से आती है, कुछ कहते कहते रुक गई।

"क्या बात है, बेटी? तुम कुछ कह रही थी?

"अंकल जी, इसके भाई का..भी काम कुछ एक महीने पहले छूट गया है, इसकी मम्मी बीमार रहती है"

नज़र दीपक के चेहरे पर गई। आँखों में ज़िम्मेदारी के आँसू थे। जो वो अपने हँसमुख चेहरे से छुपा रहा था। मैं कुछ बोलता कि तभी एक और दूसरी लड़की बोल पड़ी,

"अंकल! बुरा ना माने तो एक बात बोलूं?"

"हाँ..हाँ बोलो ना!"

"किसी को निकालने से अच्छा है, हमारे पैसे कम कर दो..बारह हजार की जगह नौ हजार कर दो आप"

मैंने बाकियों की तरफ देखा
"हाँ साहब! हम इतने से ही काम चला लेंगे"
बच्चों ने मेरी परेशानी को, आपस में बांटने का सोच, मेरे मन के बोझ को कम जरूर कर दिया था।

"पर तुम लोगों को ये कम तो नहीं पड़ेगा न?"
"नहीं साहब! कोई साथी भूखा रहे..इससे अच्छा है, हम सब अपना निवाला थोड़ा कम कर दें"

मेरी आँखों में आंसू छोड़,ये बच्चे अपने काम पर लग गए, मेरी नज़रों में, मुझसे कहीं ज्यादा बड़े बनकर..!
🌷🌷

अपनी मां से कहो कि प्रॉपर्टी मेरे नाम कर दे...रात के दो बज रहे हैं पर मुझे नींद नहीं आ रही है। मन बहुत उदास है। एक बार प...
19/09/2024

अपनी मां से कहो कि प्रॉपर्टी मेरे नाम कर दे...

रात के दो बज रहे हैं पर मुझे नींद नहीं आ रही है। मन बहुत उदास है। एक बार पलट कर पति वीरेन की तरफ देखा तो वो बड़ी ही सुकून भरी नींद में सो रहे थे। एक बार तो देख कर मन घृणा से भर गया। पिछले कुछ दिनों में जो कुछ भी घटा है मेरे साथ, उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है। मेरा तो कोई अस्तित्व ही नहीं है। जिसने जैसा चाहा वैसा चलाया। और अब जैसा चाह रहे हैं वैसे ही सांचे में ढालने की कोशिश कर रहे हैं। और उसमें मेरे पति का योगदान सबसे ज्यादा है।

मेरा नाम रिया वर्मा है। मैं अपने ससुराल में छोटी बहू हूं। मेरे ससुराल में मेरी सास सरला जी, मेरे पति वीरेन और मैं और हमारा एक बेटा है।

अब आते हैं असल मुद्दे पर। दरअसल अभी एक महीने पहले मेरे पिता का आकस्मिक निधन हो गया। घर में मां के अलावा कोई नहीं बचा। मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान हूं। मम्मी पापा बताते थे कि मेरे जन्म के दो साल बाद एक बेटा हुआ था पर वह दो दिन से ज्यादा जी नहीं पाया। इसे अपनी नियति मानकर उन्होने मेरी परवरिश पर ही ध्यान दिया और दूसरे बच्चे की आस छोड़ दी।

खैर, पिताजी की मृत्यु के बाद अब कई फैसले लेने थे। सबसे बड़ा फैसला की मां कहां रहेगी? क्योंकि मां अब बिल्कुल अकेली हो चुकी थी इसलिए मैं उन्हें अकेला छोड़ना नहीं चाहती थी, लेकिन ससुराल में मां को लाने को भी तैयार नहीं थी। कारण, जब मेरे बेटे ने जन्म लिया था उस समय मेरी मां यहां एक महीने के लिए आई थी। मेरी सास और मेरे पति ने तो उन्हें नौकरानी ही समझ लिया था। बेचारी मेरी मां सुबह से रात तक काम ही लगी रहती थी। पर मजाल है कि दोनों मां-बेटे में से कोई उनकी मदद तो करा दे।

लेकिन इस बारे में वीरेन को कोई चिंता नहीं थी, बल्कि वह तो दिन-रात यही बातें करता था कि प्रॉपर्टी का क्या करना है? क्योंकि उसे अच्छे से पता था कि मां ने पूरा फैसला मेरे ऊपर डाल दिया है। लेकिन मैं तो यह देख कर हैरान थी कि ससुराल में तो मुझे कभी निर्णय लेने नहीं दिया जाता था। आज मेरे मायके में भी मुझे फैसले लेने का हक नहीं था। वीरेन मुझे अपने हिसाब से चलाने की कोशिश कर रहे थे।

इस एक महीने में मुझसे कई बार कह चुके हैं कि अपनी मां से कहो कि प्रॉपर्टी मेरे नाम कर दे तो मैं उनकी जिम्मेदारी उठाने को तैयार हूं। वैसे भी अब वह अकेली क्या कर लेंगी? किसी ना किसी सहारे की जरूरत तो पड़ेगी ही ना।

पर मेरा मन नहीं मानता। जो इंसान अपनी बीवी के हाथ में खर्चे देने से पहले दस बार सवाल जवाब करता है। दस बातें सुनाता है, वो उसकी मां की खर्चा उठा ले ऐसा हो नहीं सकता।

और दूसरी और जरूरी बात, उनके माँ ने कौन सी अपनी प्रॉपर्टी उनके नाम कर दी, पर फिर भी खुशी-खुशी उनका खर्चा तो उठा रहे हैं ना। तुम्हारे भैया भाभी तो बाहर रहते हैं। साल में दो-तीन बार आते हैं सारा खर्चा विरेन ही तो उठाते हैं। तो ये इंसान मेरी मां से सौदेबाजी क्यों करना चाहता है। बस यही बात मेरे दिल को चुभ रही है।

कल रात जब सासू मां से इस बारे में बात की तो उन्होंने मुझे ही डांट दिया,
"क्या गलत कह रहा है वो? मेरा बेटा तुम्हारी मां के खर्चे क्यों उठाएगा? बेचारे को कोल्हू का बैल समझ रखा है क्या?"

" पर माँजी जैसे आप हमारी जिम्मेदारी हो, वैसे ही मेरी मां भी तो हमारी जिम्मेदारी है ना"

" तू मेरी बराबरी अपनी मां से कर रही है? मैंने अपने बेटे को जन्म दिया है, पाल पोस कर बड़ा किया है। बदले में वह मेरी सेवा कर रहा है तो तुझे देखकर जलन हो रही है। इतना ही सेवा करवाने का शौक था तो एक बेटा और पैदा कर लेती तेरी मां। और वैसे भी औरत को क्या पता कि किस तरह से फैसले लेने है। तेरे पापा तो रहे नहीं अब तो निर्णय वीरेन ही लेगा ना"

इसके आगे मैं कुछ कह ना सकी। गलत तो कुछ कह नहीं रही थी वो। मैं बेटी हूं, बेटा नहीं, यह मेरी सास ने बता दिया था। पर बेटा मजबूत हो और बेटी कमजोर, ऐसा हो नहीं सकता। अब मेरे दिमाग में एक ही बात है। मैं निर्णय ले चुकी हूं कि मुझे क्या करना है। बस वह निर्णय लेकर मैं सो गई।

सुबह जब उठी तो आज की सुबह कुछ अलग ही लगी। मैं जल्दी जल्दी घर के काम कर रही थी। मुझे देखकर मेरी सासू मां वीरेन से बोली,

" आज बहू को कहीं जाना है क्या? बड़ी जल्दी जल्दी काम निपटा रही है"
मुझे देखकर वीरेन ने कहा,

" कहीं जा रही हो क्या तुम?"
" हां, मां के पास जा रही हूँ"
" क्यों? तुमने तो मुझसे पूछा भी नहीं "
" सोच रही हूँ कि वहां का घर बेच दूँ "

बात सुनकर वीरेन के चेहरे पर चमक आ गई। इससे पहले की वीरेन कुछ कहता, मैंने कहा,

" सोच रही हूँ कि वहां की प्रॉपर्टी बेचकर यहां मां के नाम से एक छोटा सा मकान ले लूँ और बाकी पैसे मां के नाम से अकाउंट में ट्रांसफर कर दूं। माँ के खर्चों में काम आएंगे। माँ पास में रहेगी तो मैं भी उन्हें आसानी से दिन में जाकर संभाल लूंगी"

" तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम मेरे फैसले के ऊपर जाओ। देख रहा हूं बहुत ज्यादा बोलने लगी हो आजकल"

"मैं आपके फैसले के ऊपर कहाँ जा रही हूँ? मैंने कभी ससुराल में बीच में नहीं बोला। कभी किसी निर्णय में आपने मुझे साथ में नहीं लिया। पर अब तो मेरे मायके से संबंधित फैसला लेना है और वह मैं ले सकती हूं। मेरी मां है, उन्होंने मुझे जन्म दिया है, तो उनके बारे में सोचने की जिम्मेदारी मेरी है ना। अगर मैं नहीं सोचूंगी तो लोग सौदेबाजी करने को तैयार हो जाएंगे। और वो मुझे मंजूर नहीं"

" बहु अपनी मां के लिए तू हम से लड़ने को तैयार है"
अबकी बार बीच में मेरी सास बोली।

"देखिए माँजी, कल आप ही ने मुझे यह रास्ता बताया था। आपने कहा था ना कि मेरा बेटा है वह तुम्हारी मां की जिम्मेदारी क्यों उठाएगा? इसी तरह मैं अपनी मां की बेटी हूं, अगर मुझे रोका तो मैं आपकी जिम्मेदारी नहीं उठाऊंगी। आप अच्छी तरह से याद रखिएगा आपका बेटा सिर्फ कमाता है पर इस मकान को घर मैं बनाती हूं"

मेरी बात सुनकर दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। जानती हूं नाराज है, तो नाराज रहने दो। इनकी नाराजगी के चलते मेरी मां को मुझे मोहताज थोड़ी ना करना है। बस फटाफट अपना काम निपटा कर मैं चल पड़ी थी अपने फैसले को अमल करने।

सविता देवी एक शांत, पर अनुभवी गृहिणी थीं। उनके बेटे राहुल और बहू अंजली का विवाह हुए कुछ ही समय बीता था। अंजली अपने ससुरा...
19/09/2024

सविता देवी एक शांत, पर अनुभवी गृहिणी थीं। उनके बेटे राहुल और बहू अंजली का विवाह हुए कुछ ही समय बीता था। अंजली अपने ससुराल में धीरे-धीरे खुद को ढाल रही थी, लेकिन सास-बहू के बीच कुछ छोटी-मोटी बातें थीं जो अक्सर अनबन का कारण बन जाती थीं।

एक दिन सुबह के वक्त, सविता देवी ने देखा कि अंजली कमरे में एसी चलाकर बाहर निकल गई थी। उन्होंने अंजलि को बुलाया और बोलीं, “अंजली, तुमने कमरे में एसी चलती छोड़ दी है। क्या तुम्हें पता नहीं है कि इसका कितना बिल आएगा? अगर तुम्हें खुद बिल भरना पड़ता, तो तुम ऐसा नहीं करती।”

अंजली थोड़ी असहज हो गई, लेकिन शांत रही। वह तुरंत कमरे में गई और एसी बंद कर दी। राहुल को लगा कि माँ की बातों से अंजली का मन खट्टा न हो जाए, इसलिए वह भी कमरे में गया और बोला, “अंजली, माँ की बातों का बुरा मत मानना।”

अंजली ने मुस्कुराते हुए कहा, “बुरा मानने वाली कौन सी बात है? मेरे मायके में भी मम्मी ऐसी ही बातें कहती थीं। पापा बिल भरते थे, तो हम भी लापरवाही कर लेते थे। यहाँ भी वही हुआ। माँ की चिंता जायज है, और गलती हमारी है कि हमने ध्यान नहीं दिया, अगर मैं एसी बन्द कर देती तो उनको बोलने का मौका ही नही मिलता”

राहुल को यह सुनकर खुशी हुई कि उसकी पत्नी कितनी समझदार और व्यावहारिक है। उसे लगा कि उसकी शादी सही और समझदार लड़की से हुई है।

सविता देवी ने भी बहू की बातों को सुन लिया था, और उनके दिल में कहीं न कहीं यह चिंता थी कि अंजली उनके बेटे से उनके खिलाफ कुछ कह न दे। लेकिन जब उन्होंने अंजली के विचार सुने, तो उन्हें भी संतोष हुआ कि उनकी बहू समझदार है।

कुछ दिनों बाद, एक और घटना घटी। सविता देवी फोन पर किसी रिश्तेदार से बात कर रही थीं। खाना ठंडा हो रहा था, और उन्हें दवाइयाँ भी लेनी थीं। अंजली ने यह देखा, तो उसने चुपचाप जाकर सविता देवी के हाथ से फोन ले लिया और प्यार से बोली, “मम्मी, पहले खाना खा लीजिए और दवाइयाँ ले लीजिए, फिर आराम से बात कर लेना।”

सविता देवी का चेहरा अचानक बदल गया। उन्होंने घूरते हुए कहा, “बहू हो तो बहू बनकर रहो। मेरी सास बनने की कोशिश मत करना। तुम मेरी माँ बनने की ज़रूरत नहीं। आइंदा ऐसी गलती मत करना।”

अंजली की आँखों में आँसू आ गए। वह चुपचाप रसोई में चली गई। थोड़ी देर बाद, सविता देवी को अंजली की बातें सुनाई दीं। वह अपनी माँ से फोन पर बात कर रही थी, “माँ, मैंने सासू माँ को भी आपकी तरह ही माँ माना है। मैं तो उनकी सेहत का ख्याल रखना चाहती थी। पर उन्होंने मुझे बहुत जोर से डांट दिया। माँ, मुझे समझ में आ गया है कि चाहे जितनी भी कोशिश कर लूँ, सास-ससुर शायद कभी बहू को बेटी की तरह नहीं मानते।"

उसकी बातें सुनकर सविता देवी का दिल पिघल गया। उन्होंने महसूस किया कि अंजली का कोई बुरा इरादा नहीं था। वह तो सिर्फ अपनी माँ की तरह उनका ख्याल रख रही थी। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।

सविता देवी ने धीरे-धीरे कमरे में जाकर अंजली को गले से लगा लिया और कहा, “बेटा, मैं बहुत सख्त रही हूँ, मुझसे गलती हो गई। आज से तुम ही मेरी दवाइयों का ध्यान रखा करना, और अगर मैं समय पर दवाइयाँ न लूँ, तो मुझे वैसे ही डांट लगा देना जैसे अपनी माँ को लगाती थी। इस घर की ज़िम्मेदारी अब तुम्हारे हाथों में है, और मैं हर कदम पर तुम्हारे साथ हूँ।”

अंजली की आँखों में आँसू छलक पड़े, लेकिन यह आँसू खुशी के थे।

सविता देवी ने अपनी समझदारी से रिश्ते को बिखरने से पहले ही संभाल लिया। उन्होंने यह समझ लिया कि एक मजबूत परिवार बनाने के लिए दोनों तरफ से समझदारी और प्यार की जरूरत होती है। दोनों ने एक-दूसरे को अपना लिया और उनके बीच का रिश्ता और भी गहरा हो गया।
अगर कहानी अच्छी लगी हो तो प्लीज फॉलो कर दीजियेगा और मुझे अच्छा लगेगा और भी ऐसी कहानी आपके सामने प्रस्तुत करने में
आप सभी जा बहुत बहुत धन्यवाद..

29/08/2024

कुशल आज बहुत खुश था। क्योंकि कल से उसकी छुट्ट्यिां लग रहीं थीं और उसके पापा ने पहले ही कह दिया था। कि छुट्ट्यिों में हम अम्मा से मिलने जायेंगे।

बुलंदशहर के छोटे से कस्बे से निकल कर दिल्ली के फ्लेट का सफर रवि जी ने बहुत मुश्किल से तय किया था। दिल्ली की आई टी कंपनी में काम करते करते कब वे अपने घर से दूर हो गये पता ही नहीं चला। रंजना से शादी फिर कुशल का होना। इस सबकी जिम्मेदारी में वे अपने माता पिता से दूर हो गये थे।

रवि जी की मां जिसे पूरा कस्बा अम्मा के नाम से जानता था। इसलिये रवि भी मां को अम्मा कहते थे। पापा के मरने के बाद रवि ने बहुत कोशिश की कि अम्मा को दिल्ली ले आयें। लेकिन अम्मा केवल एक बाद दिल्ली आई थीं। दो दिन बाद ही वो बोलीं – ‘‘पता नहीं तुम लोग कैसे इस डिब्बे में रह लेते हो। बेटा मुझे तो तू गांव ही छोड़ आ। जब तक चार लोगों के सुख-दुःख में हिस्सेदारी न हो कैसा जीवन। यहां तो कोई एक-दूसरे से बात तक नहीं करता।’’

रवि ने बहुत समझाने की कोशिश की – ‘‘अम्मा वहां तुम्हारी देखभाल कौन करेगा?’’

यह सुनकर अम्मा ने कहा – ‘‘पूरा मौहल्ला खड़ा हो जाता है। मेरी खांसी सुनकर। मौहल्ले की सारी बहुंए अपनी सास से ज्यादा मेरा ध्यान रखती हैं।’’

अम्मा वापस अपने घर आ गईं। इस बात से गुस्सा होकर रवि ने कई महीनों तक अम्मा को फोन भी नहीं किया। अम्मा फोन पर हाल चाल पूछती तो बस हां हूं करके बात टाल देते थे।

आज कई महीनों बाद रवि, रंजना और कुशल को लेकर जा रहे थे अम्मा से मिलने। दो दिन रुक कर, रंजना और कुशल को छोड़ कर आने का प्लान था।

कुशल सुबह जल्दी ही अपने आप उठ गया। रवि और रंजना यह देख कर हैरान थे कि स्कूल के लिये तो कभी उठता नहीं था। लेकिन अम्मा से मिलने के लिये सुबह ही उठ कर तैयार हो गया।

कुशल के कुछ खिलौने, कपड़े और जरूरी सामान रंजना ने पैक कर दिया था।

रवि, रंजना और कुशल तीनों अपनी गाड़ी से घर पहुंच गये। अम्मा को सरप्राईज देना चाहते थे, क्योंकि अम्मा भी ज्यादा बात नहीं करती थीं। रवि के व्यवहार से गुस्सा थीं।

कार जैसे ही घर के पास पहुंची कुशल झट से उतर कर भागा और घर में घुस गया। रंजना सामान निकाल रहीं थीं और रवि ने गाड़ी पार्क कर रहे थे।

कुशल, अम्माजी अम्माजी चिल्लाता हुआ घर में गया। अम्मा जी घर के बड़े से आंगन में बैठ कर मसाला पीस रहीं थीं। कुशल को देख कर बोली – ‘‘मेरा राजा बेटा आज कैसे अम्मा की याद आ गई। रुक अभी हाथ धोकर आती हूं।’’

यह कहकर वे सिल से समेटने लगीं। फिर सिल, बट्टे को धोने लगीं। तभी रवि और रंजना आंगन में आ चुके थे।

रंजना ने अम्मा के पैर छुए। अम्मा ने बहु को गले से लगा लिया। रवि भी आगे बढ़े अम्मा के पैर छुने तो वो बोली – ‘‘जा मैं तेरे से नहीं बोलती, बड़ी नाक उंची करके घूम रहा है।’’

रवि ने कान पकड़ते हुए कहा – ‘‘छोड़ो अम्मा अब माफ भी कर दो। कितना मन था तुम्हारे साथ रहने का।’’

अम्मा ने कहा – ‘‘अरे उसे डिब्बे में तो मैं घुट के मर जाती।’’

यह देख कर कुशल बोला – ‘‘अम्मा जी पापा को मुर्गा बनाओ हमारे स्कूल में पनिश्मेंट में मुर्गा बनाते हैं।’’

यह सुनकर सभी हसने लगे। रवि बोले – ‘‘रुक अभी तुझे मुर्गा बनाता हूं।’’

यह सुनकर अम्मा ने कुशल को गोद में उठा लिया – ‘‘खबरदार जो मेरे पोते को कुछ कहा।’’

रंजना रसोई में सबके लिये चाय बनाने चली गई। अम्मा जी कुशल के साथ बातें करने लगीं। रवि आंगन में पड़ी चारपाई पर लेट गये।

इसी तरह मिलते जुलते दो दिन कब बीत गये। रवि वापस दिल्ली आ गये। आठ दिन के लिये रंजना और कुशल को अम्मा जी के पास छोड़ दिया।

अम्मा जी शाम को कुशल को लेकर निकल जाती पूरे मौहल्लें में हर छोटा बड़ा उन्हें झुक कर प्रणाम करता, बहुएं पैर छूतीं। अम्मा जी पूरे मौहल्ले का हाल-चाल पूछती।

यही रोज का काम होता था। घर पर भी सुबह से शाम तक कोई न कोई अपनी परेशानी लेकर अम्मा जी के पास आता रहता था। अम्मा जी हर किसी की बातें सुनकर उसे सुझाव देती थीं। किसी किसी को डाट भी देती थीं। लेकिन कोई उनकी बात का बुरा नहीं मानता था। हस कर सब उनकी डाट खा लेेते थे, जानते थे उनकी डाट में कितना प्यार छुपा हुआ है।

एक दिन कुशल ने अम्मा जी से पूछा – ‘‘अम्मा यहां कितने मेहमान आते हैं। हमारे दिल्ली में तो कोई नहीं आता।’’

अम्मा जी बोलीं – ‘‘तेरा बाप तो पैसे के पीछे भाग रहा है। यहां सब कम कमाते हैं उसमें खुश रहते हैं। एक दूसरे के सुख-दुःख में खड़े रहते हैं।’’

कुशल बोला – ‘‘अम्मा क्या हम हमेशा यहां नहीं रह सकते?’’

यह सुनकर अम्मा के चेहरे पर एक उदास सी छा गई। फिर वो बोलीं – ‘‘बेटा ये घर तुम्हारा ही है। लेकिन तेरे बाप को कौन समझाये कल मैं मर गई तो वो तो इसे भी बेच देगा।’’

यह सुनकर रंजना ने कहा – ‘‘अरे अम्मा जी कैसी बात करती हों अभी तो आपको कुशल के लिये बहु भी लानी है।’’

कुशल बोला – ‘‘अम्मा जी बताओ न कब लाओंगी मेरे लिये बहु?

अम्मा जी और रंजना दोंनो हस पड़े फिर अम्मा जी ने कहा – ‘‘चल शाम को ही तेरी बहु लाती हूं। नहीं तो तू भी अपने बाप की तरह शहर में कोई ढूंढ लेगा।’’

यह सुनकर कुशल बहुत खुश हुआ चलो शाम को बहु तो मिल जायेगी। न शादी का मतलब पता, न बहु का बस बहु चाहिये थी।

दस दिन बाद रवि दोंनो को लेने के लिये आये। अम्मा जी के चेहरे पर उदासी छा गई थी। अम्मा जी बोली – ‘‘अब कब आयेगा?’’

रवि ने कहा – ‘‘अम्मा छुट्ट्यिों में आते रहेंगे।’’

यह सुनकर अम्मा की आंखों नम हो गईं बोली -‘‘मेरे छुट्टी पर जाने से पहले आ जाना।’’

यह सुनकर रवि बोले – ‘‘अम्मा ऐसी बातें क्यों करती हों?’’

उसके बाद तीनों वापस चले आये। अगले दिन से सब अपने काम में व्यस्त हो गये।

करीब तीन महीने बाद एक दिन रवि ने कुशल को रात को जगाया – ‘‘बेटा जल्दी से तैयार हो जा अम्मा जी के पास चलना है।’’

कुशल को कुछ समझ नहीं आ रहा था, न छुट्टी है न कोई त्यौहार फिर अचानक अम्मा के पास कैसे जा रहे हैं।

रवि, रंजना और कुशल तीनों घर पहुंच जाते हैं। गली के बाहर से ही भीड़ लगी थी।

कुशल ने देखा आंगन में अम्मा जी चादर ओढ़े लेटी हैं पास में दीपक जल रहा है। रवि और रंजना दोंनो रो रहे थे। कुशल अब समझ चुका था कि अम्मा जी नहीं रहीं। रवि की गोद में बैठा वह एकटक अम्मा जी को देख रहा था। फिर वह उठा और अम्मा जी के पास बैठ कर कहने लगा – ‘‘अम्मा जी चलो न मेरे लिये बहु देखने।’’

यह सुनकर रंजना जोर जोर से रोने लगी। रवि ने कुशल को उठा कर गोदी में बिठाया।

देर रात तक कुशल अम्मा जी को निहारता रहा। सुबह जब उसकी आंख खुली तो वह घर के एक कमरे में था। वह उठ कर भागता हुआ बाहर आया। अम्मा जी वहां नहीं थीं। कुछ औरतों के साथ रंजना बैठी रो रही थीं।

कुशल ने रंजना को झकझोरते हुए कहा – ‘‘अम्मा जी कहां चली गईं? कौन ले गया उन्हें?

रंजना ने कुशल को संभालते हुए कहा – ‘‘बेटा वो भगवान के घर चली गईं।’’

अंतिम संस्कार करके जब रवि वापस आये तो कुशल उनसे लिपट कर पूछने लगा – ‘‘अम्मा जी को वापस ले आओ पापा।’’

रवि ने कुशल को गोद में लेकर बहुत प्यार से समझाया कि अम्मा जी भगवान के पास चली गईं हैं।

तेरहवीं के बाद जब शहर जाने के लिये सब गाड़ी में बैठ गये – रवि ने घर को ताला लगा दिया। गाड़ी में बैठते ही कुशल ने कहा – ‘‘पापा अम्मा जी कह रहीं थीं मेरे मरने के बाद तुम ये मकान बेच दोगे। क्या ये सच है?’’

रवि ने कुशल को गले से लगा लिया – ‘‘नहीं बेटा हम ये मकान कभी नहीं बेचेंगे। बल्कि वहां से सब बेच कर यहां आ जायेंगे। काश मैं अम्मा का कहना मान कर उनके साथ रहता, तो अंतिम समय में अम्मा के पास होता।’’

29/08/2024

*जन्मदिन नहीं बर्थडे*
दरवाजे की घंटी की आवाज सुनकर बिटिया प्रमिला जो कि शहर में अपनी सहेलियों के साथ कन्या छात्रावास में रहती थी, ने दरवाजा खोला और अपनी मां को यूं दरवाजे में देखकर चौक गई। खुशी के बजाय उसकी आंखों से क्रोध की चिंगारियां बरसने लगी। "क्या मां? बिना बताए कोई आता है क्या ??दरवाजे से अंदर भी आने को नहीं कहा प्रमिला ने, और पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई ।चूंकि गर्ल्स होस्टल था ,तो पिता तो रूम में दाखिल नहीं हो पाए, पर मन मार कर मां अंदर दाखिल हुई। अपने साथ लाए हुए अपने बैग में से बिटिया के जन्मदिन का सामान निकालने का सोचने लगी कि निकालूं या नहीं? इससे पहले ही आसपास की लड़कियां उसे घूरने लगी तभी किसी ने पूछा "पैम कौन आया है??मेरी मॉम है!! प्रमिला ने कहा ""पैम ??मैंने पूछा तो बिटिया ने दांत किटकिटाते हुए कहा ,"मां यहां मुझे कोई प्रमिला नहीं कहता। यह गांव का नाम है यहां सब मुझे पैम कहते हैं ।आप भी मुझे इसी नाम से पुकारो ।" "और इस बैग में क्या लाई हो ?"कल तुम्हारा जन्मदिन है ना !!कुछ लड्डू ,मिठाईयां नमकीन वगैरा बना कर लाई हूं।एक डिब्बे में खीर भी है इसे बाहर निकाल दो।" कहती हुई ममता बैग में से डिब्बे मिठाइयों के बैग निकालने के लिए जैसे ही आगे बढ़ने को हुई प्रमिला ने लपक कर अपनी मां का हाथ पकड़ लिया ।लगभग फुसफुसाते हुए बोली,' मां क्या तमाशा कर रही हो ?? यह सब देहाती पना मत करो !!यह शहर है यहां बर्थडे पार्टी मनाई जाती है। केक काटा जाता है मोमबत्तियां बुझाई जाती है " "यह सब मैं कब और कहां खाऊंगी ??" "मेरा बर्थडे मेरे फ्रेंड्स मना रहे हैं!"आप तो लगता है मेरी पूरी शाम ही बर्बाद कर दोगी।" बिना बताए क्यों चली आई ??अब मैं अपनी सहेलियों को क्या मुंह दिखाऊंगी ? प्रमिला लगभग हांफ रही थी।"मेरी सहेलियां सब बड़े घर की हाई प्रोफाइल लड़कियां है। उनके मम्मी पापा इंग्लिश में बात करते हैं ??"और आपको तो मां ठीक से हिंदी बोलने भी नही आता ??"आपको और पिताजी को मैं होटल में ले जा कर अपने फ्रेंड्स से कैसे इंट्रोड्यूस करवाउंगी??'आप लोग मेरेे साथ अनफिट हो मां !""मैं आप लोंगो के साथ बर्थडे नही मना सकती ।" "प्लीज मां आप लोग घर चले जाओ जो सामान लाए हो ना ! वो तो मैं बाद में अकेले में खा लूंगी। बच जाएगा तो मैं किसी को दे दूंगी ।पर मैं पार्टी में आप लोगों को अपने साथ नहीं ले जा सकती।" बेटी प्रमिला जाने और क्या- क्या कहते चली जा रही थी, और ममता चुपचाप हतप्रभ अपनी बेटी को ही देखे जा रही थी ।बेटी के हॉस्टल में आकर उसके साथ जन्मदिन मनाने का उसके पापा का सपना 1 महीने पहले से था। उसके पिता किसान थे, पर बेटी को उन्होंने शहर में पढ़ने के लिए इसलिए भेजा था ताकि बेटी जमाने से कदम के साथ कदम मिलाकर चल सके ।उन्हीं की इच्छा से आज दोनों पति-पत्नी अपनी बेटी के जन्मदिन मनाने के लिए शहर आए थे । शहर आने के लिए कई दिनों से मंसूबे बांधी थी ममता।पर यहाँ आकर सब ,""""!डबडबाई आंखों से ममता वापस अपनी बेटी के हॉस्टल से सीढ़ियां उतरते हुए सोच रही थी ,अब बाहर जाकर अपने पति को क्या बताएगी?? गेट के बाहर खड़े हुए टहलते हुए उसके पति ने पूछा "कहां रह गई थी तुम?? और प्रमिला कहां है?? "प्रमिला ??ममता ने व्यंग्य से कहा प्रमिला नहीं "पैम बोलो वो अपना *जन्मदिन* इस वर्ष नहीं मना रही है ।"क्यों ? तो ममता ने बहाने बनाते हुए कहा, हमारी बेटी जन्मदिन नहीं बर्थडे मना रही है। वो अब पैम है। खीर पूरी नहीं खाती ,पिज़्ज़ा बर्गर खाती है। हमारी मिठाईयां उसे अब नहीं भाती ।शहर के शक्कर हमारी गुड़ पर भारी पड़ गए हैं जी "! "चलिए चलते हैं । "तुमने अपना आशिर्वाद तो दे दिया न??" ममता ने गहरी सांस लेकर कहा, नहीं उसका भी यहां रिवाज नही।" और ममता अपनी ममता को दबाकर पति को लेकर आगे बढ़ गई!

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