Lafzon ka aangan

Lafzon ka aangan Ehsaanon se saja angan,jahan kavita rooh se likhi jaati hai �

*बंधन*बंधनों में लाख कोशिश की तुमने बाँधने की,मगर मैं कहाँ रुक पाई हूँ,तुमने भले ही सोच लिया हो,बाँध रखा है तुमने रस्सी ...
31/07/2026

*बंधन*

बंधनों में लाख कोशिश की तुमने बाँधने की,
मगर मैं कहाँ रुक पाई हूँ,
तुमने भले ही सोच लिया हो,
बाँध रखा है तुमने रस्सी से जकड़ कर,
मगर मैं स्वच्छंद आकाश में उड़ने वाली,
कभी उड़ान भरना न भूल पाई हूँ!

तुम सोचते रह जाओगे ज़िन्दगी भर,
मैं तुम्हारी सोच से परे मुझे न जान पाओगे,
मुझे बाँधना आसान नहीं,
कोई रस्सी इतनी मज़बूत बनी नहीं,
जो बाँध कर रख सके मुझे,
अपनी सोच बदलो,
बाँधना ही है मुझे गर तो,
बाँध कर रखो मगर प्रेम पाश में,
मैं आजाद परिंदा हूँ,
आसमाँ की पंछी,
न बाँध रख पाओगे मुझे!

अदिति रूसिया
वारासिवनी
३१/६/२०२६

डाले थे कुछ बीज मैंने धरती पर,बारिश की बूँदे पड़ते ही फूट गए अंकुर!रोपा था बड़े विश्वास से जिस पौधे को,बारिश की बूँदों स...
10/07/2026

डाले थे कुछ बीज मैंने धरती पर,
बारिश की बूँदे पड़ते ही फूट गए अंकुर!

रोपा था बड़े विश्वास से जिस पौधे को,
बारिश की बूँदों से पनप गए आज वो!

जहाँ विश्वास हो प्रगाढ़ तो,
पनपने से न रोक सकता कोई!

छोटा सा ये पौधा आज,
प्रेम और विश्वास से पल्लवित हो रहा है!

न जाने कितनी आँधियाँ, तूफ़ान आएँगे,
मगर फिर भी ये नन्हा सा पौधा खड़ा रहेगा अडिग!

सीखा जाएगा ये सीख जीवन की हमें,
न घबराना तुम कभी चाहे आए लाख तूफ़ान कोई!

जिंदगी में ये सीख आएगी बड़े काम,
क्योंकि जीवन है मुश्किलों से भरा कहाँ आसान जीना यहाँ!

कभी बारिश के तेज थपेड़े, कभी बवंडर हवा का,
न रोक पाएगा कोई पेड़ बनने से इसे!

अदिति रूसिया
वारासिवनी
१०/७/२०२६

बारिश की बूँदे पड़ते ही सबको,याद आती है महीनों से अंदर पड़ी छतरी!बारिश की बूँदों से सराबोर हो,ये छोटी सी छतरी हमारी रक्ष...
10/07/2026

बारिश की बूँदे पड़ते ही सबको,
याद आती है महीनों से अंदर पड़ी छतरी!

बारिश की बूँदों से सराबोर हो,
ये छोटी सी छतरी हमारी रक्षा करती!

इस छतरी के नीचे ही,
लिखी जाती हैं कई प्रेम कहानियाँ!

बच्चे बूढ़ों सबका ये होती है,
एक मात्र सहारा बचने का बारिश से!

तेज हो बारिश या हो बौछार बूँदों की,
हर पल साथ निभाती है ये छतरी!

रिमझिम बूँदे जब छतरी पर पड़कर गिरती हैं नीचे,
लगता है मानों ये बनकर आँसू ,
ख़ुशी या गम के गिरती हैं छतरी से!

बच्चे भी बेफिक्र हो उठा निकल पड़ते पकड़ छतरी,
छपाक छपाक करते खेल पानी में!

न भीगने का डर न डाँट की कोई फ़िकर,
क्योंकि छतरी के होते क्यों करें फ़िकर!

ये छोटी सी छतरी है बड़े काम की,
धूप हो तपती या हो तेज बारिश बचाती हर हाल में!

अदिति रूसिया
वारासिवनी
१०/७/२०२६

*ज़िन्दगी के ड्राफ्ट में सेव सपने*       सपनों की कोई उम्र नहीं होती सपने सजते हज़ार हैं पर, पूरे हों इसकी कोई गेरेंटी न...
09/07/2026

*ज़िन्दगी के ड्राफ्ट में सेव सपने*

सपनों की कोई उम्र नहीं होती सपने सजते हज़ार हैं पर, पूरे हों इसकी कोई गेरेंटी नहीं होती। कई ऐसे सपने होते हैं जिन्हें पूरा करना हमारे लिए शायद मुश्किल होता है और उन्हें हम पूरा नहीं कर पाते, मगर वो कहीं न कहीं हमारी *जिंदगी की ड्राफ्ट में सेव हो जाते हैं* । कभी जिम्मेदारियों के चलते कभी समय का आभाव मुख्य कारण बन जाता है।
आजकल के आधुनिक समय में मोबाइल का जमाना है, जिसमें सेव और डिलीट का ऑप्शन होता है जो डिलीट हुआ वो पूर्ण रूप से डिलीट हो जाता है, मगर हमारे जीवन में ये ऑप्शन नहीं होता इसलिए जो सपने हम देखते हैं वो हमारी जिंदगी के अंतिम क्षणों तक, अंतिम सांस तक हमारे साथ ही होते हैं और हमारे साथ ही दफन हो जाते हैं।
जिंदगी हमें हमारे सपनों को पूरा करने के बहुत मौके देती है लेकिन कुछ कारणों वश शायद हम पूरा नहीं कर पाते। हाँ धूल जरूर पद जाती हैं उन सपनों पर । हमारे दिमाग में हर पल वो बातें घूमती रहती हैं और फिर कोई ऐसा मिल जाता है जो उन्हें याद दिला जाता है और वो सपनों में पड़ी धूल झटककर हम फिर आगे बढ़ते हैं और फिर एक कसक के साथ वो सेव बटन फिर दब जाती है ये देखने ले लिए कि कितने सपने हमने सेव रखे हैं और किस सपने को पहले पूरा करना हैं और बस एक नई आशा की किरण के साथ उसे पूरा करने की लगन जाग उठती है और कदम पूरे विश्वास के साथ उस और बढ़ जाते हैं।
ऐसे ही बहुत से सपने हमारी भी जिंदगी में थे जो जिंदगी ने सेव कर रखे थे। कहते हैं न किसी भी सपने या काम को करने की कोई उम्र नहीं होती बस सालों पहले ऐसे ही कुछ सपने संजोए थे जो आज पूरे हो रहें हैं लिखना शौक था शादी बाद बंद कर दिया पर चाहत हमेशा रही पर उन्हें दुबारा हौसलों की उड़ान दी संजय जी ने और फिर भर ली हमने भी सपनों की उड़ान। पेंटिंग का शौक था बच्चों ने उस सपने को भी साकार किया जिसमें सोनाली और कावेरी की मुख्य भूमिका रही दोनों ने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया। जब जब मैंने उदासी लिखी मेरी सखा प्रीति ने तब तब मुझे डाँट लगा निराशा से आशा की ओर मोड़ दिया। सोनू ने हमेशा मुझे हर सपने साकार करने के लिए प्रोत्साहित किया। ऐसे और भी सपने हैं जिन्हें अब पूरा करना है बिना किसी हिचकिचाहट और डर के अब आगे बढ़ना है सपनों को पूरा करने । जब इतने प्यारे लोग हमारे साथ हों परिवार और दोस्त साथ हों तो *जिंदगी के ड्राफ्ट में सेव सपने* पूरे हो ही जाते हैं। वो लोग बहुत ख़ुशनसीब होते हैं जिनकी जिंदगी के ड्राफ्ट में सेव सपने पूरे हो जाते हैं। जीवन सबसे अद्भुत क्षण जब नई मुस्कान के साथ सुबह का सूरज निकलता है और जीवन का सफ़र स्वयं के सपनों को पूरा करने की शुरुआत करता है एक नई उम्मीद और आशाओं के साथ सपनों की ऊँची उड़ान हकीकत में भर आसमान की ऊँचाइयाँ छूता है।

अदिति रूसिया
वारासिवनी
९/७/२०२६

*भावनाएँ शब्दों की मोहताज नहीं होती**भावनाएँ शब्दों की मोहताज नहीं होती*कभी आँखों से ख़ुशी तो कभी ग़म बयाँ करती,जो शब्द ...
01/07/2026

*भावनाएँ शब्दों की मोहताज नहीं होती*

*भावनाएँ शब्दों की मोहताज नहीं होती*
कभी आँखों से ख़ुशी तो कभी ग़म बयाँ करती,
जो शब्द लबों तक न आ पाएँ वो सब आँखे बता देतीं,
जो ख़ुशी साझा न कर पाएँ किसी से,
अपने आप लबों की मुस्कुराहट बता जाती,
कुछ भी कहने से पहले जिस बात को,
सौ बार सोचना पड़ता है,
वहीं भावनाएँ आँखो ही आँखों से सब कह जाती हैं,
प्यार किसी शब्द का मोहताज नहीं होता,
न प्यार की बातें होतीं है मोहताज शब्दों की,
बस हृदय में हो प्रेम और समर्पण तो,
आँखों में चमक अलग दिखाई देती,
कौन अपना है कौन पराया,
इसका एहसास भी तो भावनाएँ ही दिलाती हैं,
मौन की भाषा अंतर्मन से समझी जाती,
जरूरी नहीं हर बार हर बात कहनी पड़े
या अभिव्यक्त करना पड़े शब्दों में,
आँखों ही आँखों में बहुत कुछ समझा जाता है,
प्रेम,समर्पण,ख़ुशी हो या ग़म,
सब कुछ हमारी आँखों से झलक जाते,
शबनमी रातों में प्यार शब्दों का मोहताज नहीं होता,
चाँदनी रात में अक्सर प्यार का पैग़ाम ले आती,
राधा और कृष्ण का प्रेम शब्दों में बयाँ नहीं कर सकते,
बसते थे कृष्ण राधा के हृदय और राधा श्री कृष्ण के,
सच है भावनाएँ शब्दों की मोहताज नहीं होती!

अदिति रूसिया
वारासिवनी
१/७/२०२६

*बेफिक्र/निश्चिंत**बेफिक्र* हो जी रहे हैं जिंदगी,क्योंकि अब शुरू की है हमने,जीना अपने हिसाब से अपनी जिंदगी!छोड़ दिया पीछ...
29/06/2026

*बेफिक्र/निश्चिंत*

*बेफिक्र* हो जी रहे हैं जिंदगी,
क्योंकि अब शुरू की है हमने,
जीना अपने हिसाब से अपनी जिंदगी!

छोड़ दिया पीछे सब कुछ सोचना,
सबके लिए सबके हिसाब से जीना हमने,
अब *निश्चिंत* हो जी रहे अपने हिसाब से जिंदगी!

करते रहे सारी उम्र फ़िक्र दूसरों की,
मिला ही नहीं कभी समय ख़ुद के लिए सोचने का,
अब थोड़ा समय ख़ुद के लिए जीने की सोच हमने बना ली!

दे दी है हमने जगह अपने होठों पर मुस्कान को,
जो भूल बैठे थे न जाने कब जमाने से,
अब आँखों में भी ख़ुशी झलकती है जीने की चाह देखकर!

अब मालूम हुआ कितनी खूबसूरत है ज़िन्दगी,
न जाने क्यों भूल बैठे थे ख़ुद को,
जमाने की फ़िक्र अपने सर लाद कर!

कर्तव्य सब निभाएँगे आज भी अपने,
मगर अब थोड़ा ख़ुद को भी संवारकर,
बहुत किया दूसरों के लिए अब जिएँगे थोड़ा अपने लिए!

न रसोई छूटेगी न कोई काम घर का,
हाँ अब सबसे आगे रहेंगी हमारी ख्वाहिशें,
अब समय थोड़ा अपने सपनों के लिए जीवन में होगा!

प्राथमिकता अभी भी परिवार ही होगा,
मगर अपने सपनों की उड़ान लिए मेरा जहाँ होगा,
दोनों को संभालना मुश्किल मगर नामुमकिन न होगा!

सपने भी सजेंगे साथ अपनों को लिए मेरे,
हर कदम बेफिक्र सा मेरे जीवन में होगा,
अब दूसरों से पहले ख़याल मुझे मेरी ख़ुशी का होगा!

अदिति रूसिया
वारासिवनी
२८/६/२०२६

*बेफिक्र/निश्चिंत*बड़ी *बेफिक्र* सी थी जिंदगी,जब छोटे बच्चे थे हम,न किसी बात की फ़िकर,न किसी काम का था बोझ,बस जी रहे थे ...
29/06/2026

*बेफिक्र/निश्चिंत*

बड़ी *बेफिक्र* सी थी जिंदगी,
जब छोटे बच्चे थे हम,
न किसी बात की फ़िकर,
न किसी काम का था बोझ,
बस जी रहे थे मस्ती में,
खेलते खाते पढ़ते लिखते थे हम,
न था बचपन में हमें किसी बात का ग़म,
पापा मम्मी का साथ था प्यारा,
जीने का वही थे हमारा सहारा,
*निश्चिन्त* थे हर बात से हम,
मिलता था समय पर खाना,
पहले हम खाते थे फिर माँ,
हर छोटी से छोटी बात का,
रखा जाता था ख़याल हमारे,
बड़े होते ही जिम्मेदारियों का बोझ,
अब रखना पड़ता था ख़याल सबका,
बिल्कुल माँ पापा की तरह ही हमको,
तब समझ आया क्या होती हैं जिम्मेदारियाँ,
कैसे किया होगा सब कुछ मिल माँ पापा ने,
कितने कष्ट उठाएँ होंगे उन्होंने हमें बड़ा करने में,
अब बेफिक्र होकर जीना भूल गए,
क्योंकि अब हम जिम्मेदारियों से घिर गए,
बड़े याद आते हैं वो बचपन के दिन,
माँ का घर और उनके हाथ का खाना,
अब दो दिन के लिए भी जाना चाहें तो,
पहले दिखता है अपना घर द्वार,
माँ का घर हुआ बेगाना,
अब वक़्त अपने लिए ही नहीं होता,
ख़ुद से पहले दूसरों का ख्याल होता,
अब निभाने पड़ते हैं हर धर्म,
बहू, पत्नी, माँ, सास और दादी के,
इन सबके बीच कहाँ हैं हम पता ही नहीं,
पर सच्चा सुख परिवार के साथ ही है,
भले बेफिक्र न हों हम तो क्या,
असली दौलत तो हमारे पास ही है!

अदिति रूसिया
वारासिवनी
२९/६/२०२६

*उम्मीद है तो जीवन है**उम्मीद है तो जीवन है*ये सच है,क्योंकि उम्मीद पे तो दुनिया क़ायम है!उम्मीद है तो जीवन है,ये सच है,...
24/06/2026

*उम्मीद है तो जीवन है*

*उम्मीद है तो जीवन है*
ये सच है,
क्योंकि उम्मीद पे तो दुनिया क़ायम है!

उम्मीद है तो जीवन है,
ये सच है,
सारे रिश्तों की डोर उम्मीद से ही बंधी हैं!

उम्मीद है तो जीवन है,
ये सच है,
इंसा की हर एक साँस उम्मीद से ही तो चलती है!

उम्मीद है तो जीवन है,
ये सच है,
क्योंकि हर मोड़ पर उम्मीद ही एक नया रास्ता दिखाती है!

उम्मीद है तो जीवन है,
ये सच है,
क्योंकि दरार पड़े गर रिश्तों में वही तो बचाती है!

उम्मीद है तो जीवन है,
ये सच है,
डूबते का सहारा बन यही तो तारती है!

उम्मीद है तो जीवन है,
ये सच है,
हर निराशा से यही तो उबारती है!

उम्मीद है तो जीवन है,
ये सच है,
हर गिरते हुए का यही तो हाथ थामती है!

उम्मीद है तो जीवन है,
ये सच है,
हर मुश्किल से यही तो बचाती है!

उम्मीद है तो जीवन है,
ये सच है,
हर ग़म में ख़ुशी के पल यही उम्मीद तो लाती है!

हाँ!
उम्मीद है तो जीवन है,
क्योंकि हर कदम पर,
एक उम्मीद ही है जो सहारा बन जाती है,
हर हाल में हमें जीना सिखाती है,
ग़मों में मुस्कुराना सिखाती है,
डूबते का तिनके का सहारा बन जाती है,
नाजुक रिश्तों की डोर को,
संभाल कर संजो जाती है,
कभी दोस्ती तो कभी प्रेम को बचाती है,
ये उम्मीद है जीवन की आस बन,
जिंदगी से लड़ना सिखाती है,
हारे का सहारा बन,
हाथ पकड़ हर दर्द में दवा बन जाती है,
ये उम्मीद है,
तुम्हें हर हाल में खुश रहना सिखाती है,
अपनों से बैर नहीं प्रेम सिखाती है,
उम्मीद है तो जीवन है,
ये हर पल बात याद दिलाती है,
हारना नहीं जीतना है,
हर तूफ़ान से लड़ना सिखाती है,
*उम्मीद कभी छोड़ना नहीं ये बात बतलाती है!*

अदिति रूसिया
वारासिवनी
२४/६/२०२६

*खुशियों का एटीएम*निधि अपनी ही जिंदगी में खुश अपने तरीके से जीवन जी रही थी। शाम का समय था रिमझिम बारिश की फुहारें हाथ मे...
23/06/2026

*खुशियों का एटीएम*

निधि अपनी ही जिंदगी में खुश अपने तरीके से जीवन जी रही थी। शाम का समय था रिमझिम बारिश की फुहारें हाथ में चाय की प्याली बालकनी में बैठी चाय का आनंद ले रही थी। अचानक यादों के गलियारे में चली जाती है ।
उसने कभी सोचा नहीं था कि अभिनव उसे बीच मझदार में यूँ अकेला छोड़ कर चले जाएँगे। सोच रही थी सब कुछ था भगवान का दिया हमारे पास पर उन्हें न जाने कैसा भूत सवार था उन्हें विदेश जाना था और मैं जाना नहीं चाहती थी अपनों को छोड़ कर। बच्चों और माता पिता को छोड़ वो विदेश चले गए।
कुछ सालों तक तो आना जाना लगा रहा, पर उसके बाद उन्होंने हमारी कोई खोज खबर ही नहीं ली मैंने कई बार कहा इस तरह जीने से तो बेहतर है हमें अलग हो जाना चाहिए, मगर वो मुझे तलाक भी नहीं देना चाहते थे। एक दिन मुझे अभिनव के एक दोस्त से पता चला कि वो वहीं पर किसी लड़की के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं, मेरे तो जैसे पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई।
खैर मैंने भी अब अपने बच्चों और सास ससुर के साथ जीना सीख लिया था। बच्चे अब हो चुके थे अक्सर वो अपने पिता के बारे में पूछते तो मैं हमेशा टाल जाया करती थी पर अब उन्हें भी बहुत कुछ समझ आ चुका था। बेटी आयशा कहती मेरी प्यारी माँ हम सबका कितना ख्याल रखतीं हैं ख़ुद चाहे कितनी भी दुखी हों पर हम बच्चों और दादा दादी की *ख़ुशियों का एटीएम* है हमारी माँ!
सच ही तो कहती है कभी उसके पापा भी यही कहा करते थे पर न जाने कैसे इतनी दूरी आ गई हमारे बीच! अचानक फ़ोन की घंटी बजती है और निधि की तंद्रा टूटती है। फ़ोन पर अभिनव थे! अचानक इतने सालों बाद उसके फ़ोन कॉल से निधि थोड़ा घबराए हुए फ़ोन उठाती है, उधर से आवाज़ आती है हेलो निधि…. काँपती हुई आवाज़ निधि थोड़ा सहम जाती है!
उधर से फिर आवाज़ आती है निधि, निधि आई एम रियली सॉरी निधि प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो, मैं तुम्हारे पास वापिस आना चाहता हूँ! मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई मैं पैसा कमाने की लालच में इतना अंधा हो गया था कि मैंने अपने माता-पिता, बच्चों और तुम्हारे बारे में जरा भी नहीं सोचा। निधि मैंने पैसा तो बहुत कमाया पर मेरी *खुशियों का एटीएम* तो तुम ही हो हमेशा से, मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ मैं इसी शहर में हूँ रास्ते में हूँ एक बार मुझे माफ़ कर दो मैं तुम्हारे पास आ रहा हूँ!
वो को कुछ समझ पाती कुछ बोल पाती उसके पहले ही फ़ोन कट हो जाता है निधि धड़ाम से सोफे पर गिर जाती है उसकी रोने की आवाज़ से दोनों बच्चे आयशा और नीरव दौड़ कर आते है । क्या हुआ माँ? आप रो क्यो रही हैं किसका फ़ोन था निधि कुछ बोलती उसके पहले दरवाज़े की घंटी बजती है, आयशा दौड़ कर दरवाजा खोलती है सामने अपने पिता को देख हतप्रभ रह जाती है। आप!
भैया पापा आए है! दादा दादी जल्दी आओ। दरवाजे पर उसे देख सभी हैरान थे क्योंकि अभिनव एकदम हाल बेहाल सा था उसका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था । उसकी ग़लत एकदम बत्तर थी। आकर सीधे निधि के गले लग रोने लगा बार बार माफ़ी माँग रहा था उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उसे माफ़ करे या छोड़ दे।
पीछे से साथ में उसका बचपन का यार रवि दीखी दिया उसने सारी कहानी कह सुनाई किस तरह उसे विदेश में धोखा मिला और कितनी गंभीर बीमारी से वो गुजर रहा है कुछ दिन जिंदगी के उसके पास बचे हैं। ये सारी बातें जानने के बाद घर का माहौल शांत हो गया।
अभिनव निधि को बाहों में भर कर कह रहा था अब मेरा खुशियों का एटीएम मेरे पास है मुझे कुछ नहीं होगा मुझे पता है मेरी निधि मुझे कहीं जाने नहीं देगी। माँ पापा मुझे माफ़ कर दो जो फ़र्ज़ मुझे निभाने चाहिए थे वो सारे फ़र्ज़ निधि ने निभाए।
निधि शांत बैठी सोच रही थी मैंने सदा ही सबका भला किया सबको ज़िन्दगी भर खुशियाँ बाँटी देर से ही सही मेरी झोली में मेरी ख़ुशियाँ वापिस भर दी भगवान ने। मेरा तो खजाना मेरा परिवार है उनकी ख़ुशियाँ है!

अदिति रूसिया
वारासिवनी
२३/६/२०२६

*देर-सबेर**देर-सबेर* ही सही,समझ तो आया दुनिया का फंडा,दिखावे हैं सारे रिश्ते नाते यहाँ,कोई नहीं जग में अपना,जो निभा सके ...
14/06/2026

*देर-सबेर*

*देर-सबेर* ही सही,
समझ तो आया दुनिया का फंडा,
दिखावे हैं सारे रिश्ते नाते यहाँ,
कोई नहीं जग में अपना,
जो निभा सके निःस्वार्थ रिश्ते,
यहाँ तो जुड़े हैं सारे स्वार्थ से रिश्ते,
मतलबी हुआ है आज जमाना,
लगता है सारा जग बेगाना,
सीख लिया है अब रहना अकेले,
झूठ की चादर ओढ़े घूम रहे हैं अपने,
अब नहीं लगता किसी बात का डर,
लोगों की आदत है कहना,
हमने भी सीख लिया अब सुनना,
देर से ही जागे सही पर जाग गए,
झूठे रिश्तों में बंधे रहने से अच्छा है,
जितना निभे उतना निभाना,
बोझ तले जीने से बेहतर है,
ख़ुद को हल्का कर लेना!

अदिति रूसिया
वारासिवनी
१४/६/२०२६

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