01/06/2026
*स्वानुभूति*
पूनम की रात,
चाँदनी चारों ओर बिखरी हुई,
चित्त शांत और एकाग्र मन,
दुनिया के कोलाहल से दूर,
न कोई बाधा,
न कोई अड़चने,
बस मैं और सिर्फ़ मैं,
स्वयं की खोज में,
चल पड़ी,
बैठ अकेली चाँद के नीचे,
अपने मन में उठते,
बहुत से सवालों के जवाब ढूँढने,
आत्मावलोकन किया,
ख़ुद ही ख़ुद से बातें की,
गहन ध्यान में बैठ,
ख़ुद को खोजने का प्रयास,
अपनी गलतियों का एहसास हुआ,
मन से पूछा सच में ग़लत थी क्या मैं,
पर जाना ग़लत न होते हुए भी,
कुछ तो कमिया थी मुझमें,
जिसकी वजह से अक्सर परेशान सी रहती थी,
क्योंकि कभी उन्हें,
स्वीकारने की हिम्मत ही नहीं थी मुझमें,
पर आज मुझे *स्वानुभूति* हुई,
मैंने ख़ुद को जाना पहचाना,
स्वीकार करने की हिम्मत पाई,
अब डर नहीं लगता स्वीकारने से,
अब डर नहीं लगता किसी बात से,
क्योंकि पाया है आज मैंने स्वयं से स्वयं को,
बहुत सी अनुभूतियाँ हुई,
जाने कितने ही सवालों के जवाब मिले,
जिन्हें न जाने मैं कब से तलाश रही थी,
आज बहुत सुखद अनुभूति हुई,
आज अंतर्मन आत्मिक शांति मिली,
डर को पीछे छोड़,
सच का सामना करने की हिम्मत मिली,
ख़ुद पर यकीन गहरा हुआ,
जिसे मैं बाहर तलाश रही थी,
वो तो मेरे अंदर ही था,
मैंने कभी अपने अंदर उसे,
ढूँढने की कोशिश ही नहीं की,
आज मेरी तलाश ख़त्म नहीं हुई यहाँ से,
यहाँ से मेरे जीवन की,
एक नई शुरुआत हुई,
तलाश जारी रहेगी,
अभी तो बहुत कुछ पाना है जीवन में,
ख़ुद को अभी और जानना है,
पहचाना है,
संवारना है अभी और ख़ुद को,
पहले से बेहतर बनना है मुझे,
ख़ुद को खोकर पाना है ख़ुद को मुझे!
अदिति रूसिया
वारासिवनी
१/६/२०२६