Kavi Niraj Yadav

Kavi Niraj Yadav हिंदी &भोजपुरी राइटर
(गीत,गजल, कविता, कहानी,उपन्यास एवं सिंगिंग)

30/05/2026
25/08/2025

(लघु कथा) हरितालिका तीज
--------------------- लेखक -नीरज यादव

सभी औरतें अपने अपने पति के लिए लम्बी उम्र की कामना किये जा रहीं थीं लेकिन उस वक्त ललिया की आंखों में आंसू थे। फिर भी वह अपने पति के लिए लम्बी उम्र की कामना किये जा रही थी पति तो आखिर पति ही होता है वो चाहे जैसा भी हो।

ललिया का पति एक नम्बर का सराबी था ।शराब के चलते घर की एक एक वस्तुएं बिकती चली गयीं। ललिया मेहनत मजदूरी कर के अपने एवं अपने पुत्र लखना का पेट पाल रही थी साथ ही साथ अपने पति की तलब पूर्ति का भी शिकार होती रही।

तीज पूजन के उपरान्त ललिया जब घर आई तो सामने पति को देख कर चौक पड़ी शराब के नशे में धुत आँखे एकटक उसे ही घूर रही थी। वह कड़ककर बोला-ला ये मंगलसूत्र मुझे दे दे अब तो हो गयी न तेरी पूजा कितने दिनों से झूठ बोलती रही कि मंगलसूत्र कहीं खो गया। ललिया गिड़गिड़ा पड़ी -नहीं ऐसा न कीजिये ये मंगलसूत्र मैं न दूंगी रही सही बस यही एक निशानी बची है।पर उसने एक न सुना एक झटके से मंगलसूत्र गले से खींच लिया।ललिया उसके पैर पकड़ ली। पति अपना पैर छुड़ाने के लिए भरसक कोशिश करता रहा पर कामयाब न हो सका।मजबूर हो के पति ने अपना आखिरी अस्त्र चलाया लात घूसों से उसे पीटना शुरू कर दिया। ललिया पति की मार सहते सहते बेसुध हो चली एक तो भूखा पेट आखिर सहती भी कब तक

पति मंगलसूत्र ले कर चला गया लखना अपनी मां के पास बैठा रो रहा था
ललिया का पति मंगलसूत्र बेचने के लिए दुकान की तरफ जैसे ही मुड़ा तब तक उसका पड़ोसी रमुआ बोल पड़ा क्यो भाई आज भी पीने का मूड है क्या । अरे आज तो खैर मना लेते घर पर बीबी तुम्हारा इंतजार करती होगी
क्यो आज कोई खास बात है क्या
लो--अरे भई आज तीज का दिन है हर पत्नी अपने पति की लंबी उम्र के लिए निर्जल उपवास रखती है। तभी उसकी नजर मंगलसूत्र पर चली गई
अरे ये क्या आज तूने मंगलसूत्र ही उठा लाया। कितना ठरकी है रे तू । तूने तो कभी अपनी बीबी के लिए एक वक्त पीना न छोड़ा होगा पर वो बेचारी तेरे लिए पूरी रात पूरा दिन उपवास कर के बैठी है मेहनत मजदूरी कर के कैसे कैसे अपने बेटे का और तुम्हारा भी पेट पाल रही है और एक तू है कि तुझसे एक दिन भी सब्र नहीं हो पा रहा।

जानें क्यों आज रमुआ की बात व्यंग सा नही जान पड़ा । उसे लगा जैसे मन को कुछ कचोट लिया हो उसने बन्द मुट्ठी को एक बार देखा और उसका मन ग्लानि से भर उठा बढ़ते कदम एकाएक पीछे की तरफ मुड़ पड़े । वह सोचने लगा वास्तव में मैं एक नीच इंसान ही हूँ । सात फेरों के वक्त सात वचन तो मैं कब का भूल चुका पर वो पगली आज भी उन वचनों को निभाती आ रही है कितना बड़ा नकारा हू मैं कि उसी के पैसों पर अय्यासी करता हु और उसी को पीटता भी हूँ और एक वो है कि सब कुछ सहती जा रही है।
घर के दरवाजे पर जब वह पहुचा तो अंदर से ललिया के कराहने की आवाज हल्की हल्की सी जान पड़ी । ललिया खाट पर लेटी कराह रही थी । पति दबे पांव उसके करीब खड़ा हुआ।ललिया की भीगीं पलकें उसकी ओर उठती गयीं। निशब्द पति ने अपनी मुट्ठी उसकी तरफ बढ़ाया ।बुझे मन से ललिया मुट्ठी को देखने लगी उसमे उसके मंगल सुहाग की वो निशानी चमक रही थी ललिया ने अपने पति की आंखों में देखा जहाँ से आँसू नि:शब्द गालों पे ढरकते जा रहे थे शायद पश्चाताप के आंसू।

उसने ललिया के दोनोँ हाथों को अपने हाथों में लिया और फफक कर रो पड़ा जैसे माँ के आंचल में मुह छुपा कर कोई बच्चा रो रहा हो। रोते रोते ही कहता रहा ललिया अब मैं कभी तुझे प्रताड़ित नहीं करूंगा आज से मैं खुद कमाऊंगा और तुझे भी खिलाऊंगा तुझे कही भी काम नहीं करने दूंगा मैं तुझे ये वचन देता हूं कि आज से कभी भी दारू को हाथ नहीं लगाऊंगा।

ललिया की आँख से अब खुशी के आंसू बह चले उसे लगा जैसे उसका व्रत सफल हो गया।

सन 2001 को मेरी ये प्रकाशित रचना
कवि एवं लेखक- नीरज यादव

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