11/12/2025
एक दिन फुर्सत मिली,
तो सोचने बैठा -
कितना कम सोचता हूँ अब!
जीवन की व्यस्तता में उलझा मैं,
क्या है पाने-खोने को,
कोई बात है क्या रोने को?
कितने सवाल करता आया ख़ुद से,
आज सवाल ढूंढे न मिले,
क्या ये ही मेरा मन है?
इतना सरल,
क्या ये मैं हूँ?
भाव-अभाव,
सही-ग़लत,
अर्थ-निरर्थ,
हाँ-ना,
तुम-मैं,
मेरे भीतर की द्वंदता किधर हुई?
उफ़्फ़, मन ये भी सोच ना सका!
प्रवाह के संग बहता जा रहा मैं,
मुझमें खुदको मैं भी न मिला,
मेरा बीता कल भी न मिला!
मैंने ख़ुद को बदला पाया,
शायद यही सत्य है -
बदलाव ही प्रकृति का नियम है!
फिर सोचा मैं,
चलो अच्छा है -
जो हो रहा है,
जो हुआ, जो होगा,
सब अच्छा है!
अब सोचने को कुछ न था,
मैं था वही, पर मैं न था!
मन में कोई सवाल न थे,
बस मैं था, और -
उस पल में,
वहीं,
सबकुछ था!
-काव्या अनु