04/07/2020
ये बात कुछ खास पुरानी नहीं है। शायद कुछ महीने ही हुए है इस बात को या फिर एक साल। कौन जाने लेकिन मुझे मालूम है तो बस इतना की अब गुजरा मुमकिन नहीं उनके बिना। कल शाम की ही बात है अभी, मैं यू है बैठा कुछ सोच रहा था की अचानक फोन की घंटी सुनाई पड़ी। उठाकर देखा तो उन्हीं का एक संदेश आया था। कह रहे थे की कुछ बात करनी है। मैंने सोचा भला ऐसा भी क्या है जो विशेष तौर पर संदेश भेजा गया है कि बात करनी है। मैंने अभी जवाब दिया है था कि उनका एक और संदेश आता है। कहते है,
"तुम्हे मुझमें ऐसा क्या दिखाई पड़ा कि तुम मुझे लेकर इतने पागल से हो?" अब इस बात का कोई सीधा जवाब तो था नहीं, तो मैंने उनसे एक बात कही,
"की खो चुके है हम नज़रों में आपकी कुछ इस तरह से, मुमकिन नहीं अब किसी और से मुनासिब होना।"
बहुत हैरान थे वो मेरा जवाब पड़ने के पश्चात लेकिन अभी भी बहुत से अल्फ़ाज़ थे जो मेरे सीने में घर करी बैठे थे। मुझे अब भी बहुत कुछ कहना है उनसे। बस कमी है तो सिर्फ वक़्त की। कमबख्त ये वक़्त भी बड़ी खराब चीज़ है। ना चैन से जीने देगा ना चैन से मरने। जब इच्छा हो की वक़्त और चाहिए तो इसकी कमी खलती है और जब वक़्त की भरमार हो तो इच्छाएं कही दूूर निकल जाती हैं।
मेरी एक दिली इच्छा है उनसे मिलने की। ना जाने कब पूरी हो! हर रोज़ सोने से पहले दुआ करता हूं कि शायद अब उनसे मुलाक़ात होगी, शायद अब होगी। पर ना जाने उस रब्ब को क्या दुश्मनी है मुझसे, एक ही इच्छा है और वोह भी पूरी नहीं करता। आज जब रात को में छत पर सोने के लिए आया ही था, तो मैंने देखा आसमान में एक तारा टूटा और वही कही क्षितिज में गायब हो दिया। मैंने दुआ मांगी या यूं कहें कि मैंने उसे मांगा। हर पहर का इंतजार अब बर्दाश्त नहीं होता। बहुत दिन हो गए है, शायद कुछ महीने या फिर एक साल। पर चलिए अभी इस किस्से को यही चोड़ दिया जाएगा। जल्द ही हम यहां से आगे बढ़ेंगे। तब तक के लिए दुआ कीजिए, की रब्ब मेरी भी दुआ कबूल करे।
आपका शुभचिंतक-
अर्जुन कश्यप